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पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

ये शायद मेरा सबसे महत्वकांक्षी लेख है। हम लोगों ने कई बार रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कहानियों में योद्धाओं के ओहदे के बारे में पढ़ा है। सबसे आम शब्द जो इन पुस्तकों में आता है वह है "महारथी" और ये शब्द इतना आम बना  दिया गया है कि किसी भी योध्या के लिए हम महारथी शब्द का प्रयोग कर लेते है जबकि यह एक बहुत बड़ी पदवी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर तक पहुच पाते थे। क्या आपको पता है कि इन श्रेणिओं को पाने के लिए भी कुछ योग्यता जरुरी होती थी? अगर नहीं तो आज हम पौराणिक काल के योद्धाओं के स्तर के बारे में जानेंगे।

यहाँ मैं विशेष रूप से अनुरोध करना चाहूंगा कि कृपया रामायण और महाभारत के योद्धाओं की आपस में तुलना न करें। उनका बल उनके काल में उनके समकक्ष योद्धाओं के लिहाज से देखें। अन्यथा रामायण काल के सामान्य योद्धा भी महाभारत काल के महारथी से अधिक शक्तिशाली थे। उसी प्रकार किसी देवता की तुलना साधारण मनुष्य से ना करें। उनका बल भी उनके समक्ष देवताओं अथवा दानवों के सन्दर्भ में है। ये भी ध्यान रखें कि किसी भी योद्धा को केवल उसके शारीरिक बल से नहीं अपितु उसके द्वारा प्राप्त दिव्यास्त्रों के आधार पर भी प्रमाणित किया जाता था।

1. अर्धरथी: 

अर्धरथी एक प्रशिक्षित योद्धा होता था जो एक से अधिक अस्त्र अथवा शास्त्रों का प्रयोग जनता हो तथा वो युद्ध में एक साथ २५०० सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो। रामायण और महाभारत की बात करें तो इन युद्धों में असंख्य अर्धरथियों ने हिस्सा लिया था। उल्लेखनीय है कि महाभारत युद्ध में योद्धओं के बल का वर्णण करते हुए पितामह भीष्म ने कर्ण की गिनती एक अर्धरथी के रूप में की थी और इस अपमान के कारण कर्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक भीष्म पितामह जीवित रहेंगे वो महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लेगा।

2. रथी: 

एक ऐसा योद्धा जो दो अर्धरथियों या ५००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सके। इसके अतिरिक्त उसकी योग्यता एवं निपुणता कम से कम दो अस्त्र एवं दो शस्त्र चलाने में हो। महाभारतकाल में दुर्योधन एवं दुःशासन को छोड़ कर सारे कौरव रथी थे। इसके अलावा द्रौपदी के पांचो पुत्र (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक एवं श्रुतसेन), जयद्रथ, शकुनि एवं उसका पुत्र उलूक, युयुत्सु, सुदक्षिण, विराट के पुत्र राजकुमार उत्तर, शंख, शतानीक एवं श्वेत, अर्जुन का पुत्र इरावान, वृषसेन को छोड़ कर्ण के सभी पुत्र, दुर्योधन एवं दुःशाशन के सभी पुत्र, सुशर्मा, उत्तमौजा, युधामन्यु, जरासंध पुत्र सहदेव, बाह्लीक पुत्र सोमदत्त, कंस आदि की गिनती रथी के रूप में होती थी। रामायण में असंख्य रथियों ने हिस्सा लिया जिनका विस्तृत वर्णण नहीं मिलता है। राक्षसों में खर और दूषण, वातापि आदि रथी थे। वानरों में गंधमादन, मैन्द एवं द्विविन्द, हनुमान के पुत्र मकरध्वज, शरभ एवं सुषेण को रथी माना जाता था। 

3. अतिरथी: 

एक ऐसा योद्धा जो अनेक अस्त्र एवं शस्त्रों को चलने में माहिर हो तथा युद्ध में १२ रथियों या ६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सकता हो। महाभारत काल में युधिष्टिर, नकुल, सहदेव, घटोत्कच, दुःशाशन, विराट, द्रुपद, धृष्टधुम्न, शिखंडी, कर्ण का पुत्र वृषसेन, मद्रराज शल्य, कृतवर्मा, भूरिश्रवा, कृपाचार्य, शिशुपाल एवं उसका पुत्र धृष्टकेतु, रुक्मी, शिखंडी, सात्यिकी, भीष्म के चाचा बाह्लीक, नरकासुर, राक्षस अलम्बुष, प्रद्युम्न, कीचक एवं अलायुध आदि अतिरथी थे। रामायण काल में अंगद, नल, नील, प्रहस्त, अकम्पन, शत्रुघ्न, भरत पुत्र पुष्कल, विभीषण, हनुमान के पिता केसरी, ताड़का एवं उसका पुत्र मारीच आदि की गिनती अतिरथी में होती थी।

4. महारथी:

ये संभवतः सबसे प्रसिद्ध पदवी थी और जो भी योद्धा इस पदवी को प्राप्त करते थे वे पुरे विश्व में सम्मानित और प्रसिद्ध होते थे। महारथी एक ऐसा योद्धा होता था जो सभी ज्ञात अस्त्र शस्त्रों को चलने में माहिर होता था और इसके अतिरिक्त उनके पास सामान्य अस्त्रों से ऊपर कुछ दिव्यास्त्रों का ज्ञान होता था। युद्ध में महारथी १२ अतिरथियों अथवा ७२०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। इसके अतिरिक्त जिस भी योद्धा के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान होता था (जो गिने चुने ही थे) वो सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे। साधारणतयः अधिकतर बड़े योद्धाओं को महारथी कह के बुलाया जाता है लेकिन असल में गिनती के कुछ योद्धा होते थे जो महारथी की पदवी हासिल करते थे। महाभारत में दुर्योधन, अश्वत्थामा, भगदत्त, जरासंध, अभिमन्यु, बर्बरीक आदि को महारथी के श्रेणी में रखा जाता है। भीम को १८ अतिरथियों के बराबर, बलराम, गुरु द्रोण, अर्जुन एवं कर्ण को दो-दो महारथियों के समान तथा पितामह भीष्म को तीन महारथियों के समकक्ष माना जाता है। रामायण काल में भरत, ऋक्षराज जामवंत, सुग्रीव, लव, कुश, अतिकाय आदि महारथी की श्रेणी में आते हैं। कुम्भकर्ण को तीन, रावण को चार तथा बालि एवं कर्त्यवीर्य अर्जुन को छः महारथियों के समान माना जाता है। अन्य योद्धाओं में लक्ष्मण, हनुमान एवं परशुराम के विषय में थोड़ा मतभेद है। अधिकतर जगह इन्हे अतिमहारथी की श्रेणी मिली है तो कुछ जगह इन्हे ९ महारथियों के बराबर माना जाता है।

5. अतिमहारथी: 

इस श्रेणी के योद्धा दुर्लभ होते थे। अतिमहारथी उसे कहा जाता था जो १२ महारथी श्रेणी के योद्धाओं अर्थात ८६४०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो साथ ही सभी प्रकार के दैवीय शक्तियों का ज्ञाता हो। महाभारत में अतिमहारथी योद्धाओं का कोई प्रामाणिक सन्दर्भ नहीं मिलता है पर कुछ ग्रन्थ में भीष्म को (प्रस्वपास्त्र के ज्ञान और परशुराम को परास्त करने के कारण) और अर्जुन को (पाशुपतास्त्र के ज्ञान के कारण) अतिमहारथी श्रेणी में रखने का तर्क दिया जाता है। कर्ण (ब्रम्हास्त्र के अतिरिक्त भार्गवास्त्र का ज्ञान पर कई श्राप), द्रोण और बलराम के बारे में भी कोई सटीक जानकारी नहीं मिलती। केवल रामायण काल में मेघनाद की गिनती निर्विवाद रूप से अतिमहारथी में की जाती है क्यूंकि ऐसा कोई भी दिव्यास्त्र नहीं था जिसका ज्ञान उसे ना था विशेषकर वो तीनों महास्त्र - ब्रम्हास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र का ज्ञाता था। केवल पाशुपतास्त्र को छोड़ कर लक्ष्मण को भी समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था अतः उसे भी  इस श्रेणी में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के अवतार विशेषकर वाराह, नृसिंह, राम, कृष्ण एवं कहीं-कहीं परशुराम को भी अतिमहारथी की श्रेणी में रखा जाता है। देवताओं में कार्तिकेय, गणेश तथा वैदिक युग में इंद्र, सूर्य, यम, अग्नि एवं वरुण को भी अतिमहारथी माना जाता है। आदिशक्ति की दस महाविद्याओं और रुद्रावतार विशेषकर वीरभद्र और हनुमान को भी अतिमहारथी कहा जाता है।

6. महामहारथी: 

ये किसी भी प्रकार के योद्धा का उच्चतम स्तर माना जाता है। महामहारथी उसे कहा जाता है जो २४ अतिमहारथियों अर्थात २०७३६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता हो। इसके साथ ही समस्त प्रकार की दैवीय एवं महाशक्तियाँ उसके अधीन हो। आजतक पृथ्वी पर कोई भी योद्धा अथवा कोई अवतार इस स्तर का नहीं हुआ है। इसका एक कारण ये भी है कि अभी तक २४ अतिमहारथी एक काल में तो क्या पूरे कल्प में भी नहीं हुए हैं। केवल त्रिदेवों (ब्रम्हा, विष्णु एवं रूद्र) एवं आदिशक्ति को ही इतना शक्तिशाली समझा जाता है।

रावण द्वारा नवग्रह को बंदी बनाना (Navgraha Bandhan by Ravana)

रावण द्वारा नवग्रह को बंदी बनाना (Navgraha Bandhan by Ravana)

रावण ब्राह्मण वंश में पैदा हुआ था उसके पिता ऋषि विश्रवा और पितामह पुलत्स्य ऋषि महान तपस्वी एवं धर्मज्ञ थे किन्तु माता के असुर कुल की होने की वजह से उसमे आसुरी संस्कार आ गए थे |
ऋषि विश्रवा की दो पत्नियाँ थी एक का नाम इडविडा था जो ब्राह्मण कुल से थी तथा जिनकी संतान कुबेर थे दूसरी पत्नी का नाम कैकसी था जो असुर कुल से थी इनकीरावणकुम्भकर्णसूपर्णखा आदि संताने थी कुबेर इन सब मे सबसे बड़े थे |


रावणविभीषण आदि जब बाल्यावस्था में थे तभी कुबेर धनाध्यक्ष की पदवी प्राप्त कर चुके थे कुबेर की पद-प्रतिष्ठा से रावण की माँ इर्ष्या करती थी और रावण को कोसा करती थी |
एक दिन रावण के मन में ठेस लगी और अपने भाइयों (कुम्भकर्ण और विभीषण) को साथ में लेकर तपस्या करने चला गया रावण का भ्रात्र प्रेम अप्रतिम था इन तीनो भाइयों की तपस्या सफल हुई और तीनो भाइयों ने ब्रह्मा जी से स्वेच्छा से वरदान प्राप्त किया |

रावण इतना अधिक बलशाली था कि सभी देवतायक्षगन्धर्वकिन्नरविद्याधर तथा ग्रह-नक्षत्र उससे घबराते थे ग्रंथों में ऐसा लिखा है कि रावण ने लंका में दसों दिक्पालों को पहरे पर नियुक्त किया हुआ था |
रावण की पत्नी मंदोदरी जब माँ बनने वाली थी (मेघनाद के जन्म के समय) तब रावण ने समस्त ग्रह-मंडल को एक निश्चित स्थिति में रहने के लिए सावधान कर दिया था जिससे उत्पन्न होने वाला पुत्र अत्यंत तेजस्वीशौर्यपराक्रम से युक्त हो |

 उसें ऐसा समय साध लिया था जिस समय में यदि किसी का जन्म हो तो वो अजेय एवं अमितायु (अत्यंत दीर्घायु) से संपन्न होगा लेकिन जब मेघनाद का जन्म हुआ तो बाकि सरे ग्रहों ने आज्ञा का पालन किया किन्तु ठीक उसी समय दैवीय प्रेरणा से शनि ग्रह ने अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लिया जिस स्थिति में शनि के होने की वजह से रावण का पुत्र दीर्घायु होतास्थिति परिवर्तन से वही पुत्र अब अल्पायु हो गया रावण इससे अत्यंत क्रोधित हो गया इस भयंकर क्रोध में उसने शनि के ऊपर गदा का प्रहार किया जिससे शनि के पैर में चोट लग गयी और वो पैर से कुछ लाचार हो गए अर्थात लंगड़े हो गए |

इन सब वजहों से रावण-पुत्र मेघनादप्रचंड पराक्रमीतेजस्वी और शौर्यवान तो था लेकिन अल्पायु था और शेषनाग जी के अंश लक्ष्मण जी के द्वारा मारा गया आज हममे से बहुत से ऐसे लोग मिल जायेंगे (जो ज्योतिष विद्या में विश्वास रखते हैं) जो पत्नी के गर्भ में पल रहे अपनी होने वाली संतान कोआने वाले विशिष्ट योग में ही जन्म लेने के लिए योग्य चिकित्सको की सहायता या शल्य क्रिया आदि की सहायता लेते हैं लेकिन इस धरती पर कभी कोई ऐसा भी जन्मा था जिसने अपनी संतान जन्म के समय पर ग्रह-नक्षत्रो को ही बाध्य कर दिया था विशिष्ट मुहूर्त के लिए !

अपनी मृत्यु का कारण जानने के बाद उसने उसे बदलने का निश्चय किया। वो महान योद्धा था। नारायणास्त्र को छोड़कर विश्व के सभी दिव्यास्त्र उसके पास थे (हालाँकि पाशुपतास्त्र उसके लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ)। उसके बल का ऐसा प्रताप था कि युद्ध में उसने यमराज को भी पराजित किया और स्वयं नारायण के सुदर्शन चक्र को पीछे हटने पर विवश कर दिया। ब्रह्मा के वरदान से उसकी नाभि में अमृत था जिसके सूखने पर ही उसकी मृत्यु हो सकती थी। रूद्र के वरदान से उसका शीश चाहे कितनी बार भी काटोउससे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी। किन्तु इतना सब होने के बाद भी वो अजेय और अवध्य नहीं था। उसने निश्चय किया कि वो अपने पुत्रजो अभी मंदोदरी के गर्भ में थाउसे अविजित और अवध्य बनाएगा।

भगवान शंकर से जो उसे ज्ञान और वरदान प्राप्त हुआ थाउससे उसने सभी नवग्रहों और ज्योतिष विज्ञान का गहन अध्यन किया। उसे ज्ञात हुआ कि अगर नवग्रह उसके अनुसार अपनी स्थिति बदल सकें तो वो मृत्यु को भी पीछे छोड़ सकता है। इसी कारण उसने इंद्र पर आक्रमण किया और अपनी अतुल शक्तिवरदानविद्या और पांडित्य के बल पर उसने नवग्रहों को अपने अधीन कर लिया। इस बीच मंदोदरी के प्रसव की घडी भी नजदीक आ गयी। जब रावण के पुत्र का जन्म होने ही वाला थाउसने सभी नवग्रहों को ये आदेश दिया कि वो उसके पुत्र की कुंडली के ११वें घर पर स्थित हो जाएँ। व्यक्ति की कुंडली का ११वां घर शुभता का प्रतीक होता है। यदि ऐसा हो जाता तो उसके होने वाले पुत्र की मृत्यु असंभव हो जाती।

रावण की आज्ञा अनुसार सभी ग्रह उसके होने वाले पुत्र की कुंडली के ११वें घर में स्थित हो गए। रावण निश्चिंत था कि अब इस मुहूर्त में उत्पन्न होने वाला उसका पुत्र अजेय होगा। किन्तु अंतिम क्षणों मेंजब उसका पुत्र पैदा होने ही वाला थाशनिदेव उसकी कुंडली के ११वें घर से उठ कर १२वें घर में स्थित हो गए। प्राणी की कुंडली का १२वां घर अशुभ लक्षणों का प्रतीक है। ठीक उसी समय रावण के पुत्र का जन्म हुआ जिसे देख कर बादल घिर आये और बिजली चमकने लगी। इसी कारण रावण ने उसका नाम 'मेघनादरखा। अंत समय में शनिदेव के १२वें घर में स्थित होने के कारण मेघनाद महाशक्तिशाली तो हुआ किन्तु अल्पायु और वध्य रह गया।

रावण हर तरह से निश्चिंत था किन्तु जब उसने अपने राजपुरोहित से अपने पुत्र की कुंडली बनाने को कहा तब उसे पता चला कि शनिदेव ने उसकी आज्ञा का उलंघन किया है। उसे अपार दुःख हुआ और उसने ब्रह्मदण्ड की सहायता से शनि को परास्त कर बंदी बना लिया। कहा जाता है कि रावण के दरबार में नवग्रह सदैव उपस्थित रहते थे किन्तु शनिदेव से विशेष द्वेष के कारण उन्हें रावण सदैव अपने चरण पादुकाओं के स्थान पर रखता था। बाद में लंका दहन के समय महाबली हनुमान ने शनिदेव को मुक्त करवाया। खैर वो कथा बाद में।

रावण ने सब ग्रहों को अपने पैर के नीचे दबाकर रखा था जिससे कि वह मुक्त न हो सकें। उधर देवताओं ने ग्रहों की मुक्ति की एक योजना बनाई। इस योजना के अनुसार नारद ने रावण के पास जाकर पहले उसका यशगान किया। फिर उससे कहा कि ग्रहों को जीतकर उसने बहुत अच्छा किया। पर जिसे जीता जाएपैर उसकी कमर पर नहींउसकी छाती पर रखना चाहिए। रावण को यह सुझाव अच्छा लगा। उसने अपना पैर थोड़ा सा उठाकर ग्रहों को पलटने का आदेश दिया। ज्यों ही ग्रह पलटेशनि ने तुरन्त रावण पर अपनी दृष्टि डाल दी। उसी समय से रावण की शनि दशा आरम्भ हो गई।

जब रावण की समझ में आया कि नारद क्या खेल खेल गएतो उसे बहुत क्रोध आया। उसने शनि को एक शिवलिंग के ऊपर इस प्रकार बाँध दिया कि वह बिना शिवलिंग पर पैर रखे भाग नहीं सकता था। वह जानता था कि शनि शिव का भक्त और उनका शिष्य होने का कारण कभी भी शिवलिंग पर पैर नहीं रखेगा। पर उसकी शनि दशा आरम्भ हो चुकी थी। हनुमान सीता को खोजते हुए लंका पहुँच गए।

शनि ने हनुमान से प्रार्थना की कि वह देवताओं के हित के लिए अपना सिर शिवलिंग और उसके पैर के बीच कर दें जिससे वह उनके सिर पर पैर रखकर उतर भागे। हनुमान ने पूछा ऐसा करने से उन पर शनि का क्या दुष्प्रभाव होगा। शनि ने बताया कि उनका घर परिवार उनसे बिछड़ जाएगा।

हनुमान मान गए क्योंकि उनका कोई घर परिवार था ही नहीं। इस उपकार के बदले शनि ने हनुमान से कोई वर माँगने के लिए कहा। हनुमान ने वर माँगा कि शनिदेव कभी उनके किसी भक्त का अहित न करें।

अब स्वयं के सामान रावण ने मेघनाद को भी रूद्र का कृपापात्र बनाया। उसका पराक्रम देख कर स्वयं भगवान शंकर ने उसे रावण से भी महान योद्धा बताया। वही एक योद्धा था जिसके पास तीनों महास्त्र (ब्रह्मास्त्रनारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र) सहित संसार के समस्त दिव्यास्त्र थे। इसी कारण वही आज तक का एक मात्र योद्धा बना जिसे 'अतिमहारथीहोने का गौरव प्राप्त हुआ। उसी बल पर उसने देवराज इंद्र को परास्त किया और इंद्रजीत कहलाया। उसे कुछ विशेष वरदान भी प्राप्त हुए जिससे वो एक प्रकार से अवध्य हो गया किन्तु उन वरदानों को लक्ष्मण ने संतुष्ट किया और आखिरकार उसका वध किया।  

जब रावण अपने पुत्र को मनचाहा भविष्य ना दे सका तो वो ये समझ गया कि परमपिता ब्रह्मा के विधि के विधान को कोई बदल नहीं सकता। तब उसने ये निश्चय किया कि वो राक्षस जाति के लिए कुछ ऐसे विधान और उपायों का निर्माण करेगा जिससे उनके समस्त दुःख दूर हो जाएँ। इसी लिए उसने जो भी विद्या प्राप्त की थी उनकी रचना अचूक उपायों के साथ एक ग्रन्थ के रूप में की। उसके बाद ये ज्ञान लोप ना हो जाये इसी कारण उसने इन उपायों को स्वयं मेधनाद द्वारा लिपिबद्ध करवाया ताकि ये ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी राक्षस जाति को मिलता रहे। यही लिपिबद्ध पुस्तक 'रावण संहिताके नाम से प्रसिद्ध हुई। 

ये भी कहा जाता है कि जब अंत समय में लक्ष्मण रावण के पास शिक्षा लेने गए तो रावण ने उन्हें इस ग्रन्थ के उपायों की भी शिक्षा दी। जब तक रावण जीवित रहा ये महान ग्रन्थ केवल राक्षस जाति तक सीमित रहा किन्तु विभीषण के राजा बनने के पश्चात श्रीराम की आज्ञा से उसने मानवमात्र के कल्याण के लिए उस रहस्यमयी और दुर्लभ ज्ञान को मनुष्यों को प्रदान किया। ऐसा भी वर्णन है कि रावण ने रावण संहिता का जो ज्ञान लक्ष्मण को दिया थाउन्होंने ही उसे अनुवाद कर अयोध्या में रख लिया जहाँ से इसका बाद में प्रचार प्रसार हुआ।
  
तो अगर संक्षेप में समझा जाये तो रावण संहिता एक ऐसी पुस्तक है जिसमे मनुष्यों के कर्म फल के अनुसार होने वाले दुखों और उससे मुक्ति का उपाय है। कुछ उपाय बहुत सरल हैं (जैसे सौभाग्य के लिए गौमाता को भोजन कराने का उपाय) किन्तु कुछ उपाय अत्यंत कठिन हैं जिसे साधक अत्यंत कठिन साधना के बाद ही सिद्ध कर सकता है। कहा जाता है कि नागा साधु बनने की प्रक्रिया भी रावण संहिता से ही प्रेरित है। यही नहींमहर्षि भृगु द्वारा रचित भृगु संहिताजिसे आज कल 'लाल किताबकहते हैंवो भी रावण संहिता से प्रेरित और मिलती जुलती है। इसी कारण दोनों पुस्तकों में कई उपाय हैं जो समान हैं।

कहते हैं कि समय के साथ-साथ विद्वानों ने रावण संहिता के सर्वाधिक चमत्कारी उपायों को जान बूझ कर मिटा दिया गया अन्यथा कलियुग में मानव उसका दुरुपयोग करता। कहा जाता है कि अगर वो लुप्त विद्या और तंत्र साधना के उपाय आज किसी को मिल जाएँ तो वो उनकी शक्ति से भविष्य को भी पलट सकता है। यही कारण है कि आज कल प्रकाशित होने वाली रावण संहिता में आपको उन गुप्त रहस्यों के विषय में कोई जानकारी नहीं मिलेगी क्यूंकि वो किसी को भी ज्ञात नहीं है। हालाँकि इस पुस्तक में लिखे उपायों से मनुष्य अपने कष्टों को मिटा सकता है किन्तु उन उपायों को किसी योग्य गुरु की छत्र-छाया में ही सिद्ध करना चाहिए अन्यथा विपरीत परिणाम मिल सकते हैं। साथ ही रावण संहिता को घर में रखने की भी मनाही की गयी है। खैरबात चाहे जो भी होइसमें कोई शंका नहीं है कि रावण ने हमें रावण संहिता के रूप में अमूल्य ज्ञान का खजाना दिया है जिसे हमें मानव कल्याण के लिए उपयोग करना चाहिए।


क्यों मेघनाद अतिरथी था फिर भी मेधनाद का वध केवल लक्षमण ही कर सकते थे?

लंका के युद्ध के कुछ वर्षों बाद एक बार अगस्त्य मुनि अयोध्या आए। श्रीराम ने उनकी अभ्यर्थना की और आसन दिया। राजसभा में श्रीराम अपने भ्राता भरतशत्रुघ्न और देवी सीता के साथ उपस्थित थे। बात करते-करते लंका युद्ध का प्रसंग आया। भरत ने बताया कि उनके भ्राता श्रीराम ने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा। अगस्त्य मुनि बोले - "हे भरत! रावण और कुंभकर्ण निःसंदेह प्रचंड वीर थेकिन्तु इन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाद ही था। उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और उन्हें पराजित कर लंका ले आया था। तब स्वयं ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब जाकर इंद्र मुक्त हुए थे। लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए। और ये भी सत्य है कि इस पूरे संसार में मेघनाद को लक्ष्मण के अतिरिक्त कोई और मार भी नहीं सकता थायहाँ तक कि स्वयं श्रीराम भी नहीं।"

भरत को बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे। उन्होंने श्रीराम से पूछ कि क्या ये बात सत्य है और जब राम ने इसकी पुष्टि की तो भी भरत के मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल थाउन्होंने पूछा "हे महर्षि! अगर आप और भैया ऐसा कह रहे हैं तो ये बात अवश्य ही सत्य होगी और मुझे इस बात की प्रसन्नता भी है कि मेरा भाई विश्व का सर्वश्रेष्ठ योद्धा है किन्तु फिर भी मैं जानना चाहता हूँ कि आखिर ऐसा क्या रहस्य है कि मेघनाद को लक्षमण के अतिरिक्त कोई और नहीं मार सकता था?"

अगस्त्य मुनि ने कहा - "हे भरत! मेघनाद ही विश्व का एकलौता ऐसा योद्धा था जिसके पास विश्व के समस्त दिव्यास्त्र थे। उसके पास तीनों महास्त्र - ब्रम्हा का ब्रम्हास्त्रनारायण का नारायणास्त्र एवं महादेव का पाशुपतास्त्र भी था और उसे ये वरदान था कि उसके रथ पर रहते हुए कोई उसे परास्त नहीं कर सकता था इसी कारण वो अजेय था। उस समय संसार में केवल वही एक योद्धा था जिसने अतिमहारथी योद्धा का स्तर प्राप्त किया था। ये सत्य है कि उसके सामान योद्धा वास्तव में कोई और नहीं था। उसने स्वयं भगवान रूद्र से युद्ध की शिक्षा ली और समस्त दिव्यास्त्र प्राप्त किये। भगवान रूद्र ने स्वयं ही उसे रावण से भी महान योद्धा बताया था और उसकी शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात कहा था कि वो एक सम्पूर्ण योद्धा बन चुका है और इस संसार में तो उसे कोई और परास्त नहीं कर सकता। उन्होंने यहाँ तक कहा कि उन्हें संदेह है कि स्वयं वीरभद्र भी मेघनाद को परास्त कर सके। इसके अतिरिक्त उसकी परम पवित्र पत्नी सुलोचना का सतीत्व भी उसकी रक्षा करता था।"

इसपर भरत ने कहा "हे महर्षि! आपके मुख से मेघनाद की शक्ति का ऐसा वर्णन सुनकर विश्वास हो गया कि वो वास्तव में महान योद्धा था किन्तु बात अगर केवल दिव्यास्त्र की है तो श्रीराम के पास भी सारे दिव्यास्त्र थे। उन्होंने भी त्रिदेवों के महास्त्र प्राप्त किये। साथ ही साथ महाबली हनुमान को भी ये वरदान था कि उनपर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव नहीं होगा और उनके बल और पराक्रम का कहना ही क्यालक्ष्मण निःसंदेह महा-प्रचंड योद्धा थे और उनके पास भी विश्व के सारे दिव्यास्त्र थे किन्तु उसे पाशुपतास्त्र का ज्ञान नहीं था जिसका ज्ञान मेघनाद को था। फिर भी लक्षमण किस प्रकार मेघनाद का वध करने में सफल हुए। और आप ऐसा क्यों कह रहे हैं कि केवल लक्ष्मण ही उसका वध कर सकते थे?"

इसपर अगस्त्य मुनि ने कहा "आपका कथन सत्य है। जितने दिव्यास्त्र मेघनाद के पास थे उतने लक्ष्मण के पास नहीं थे किन्तु इंद्रजीत को ये वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जिसने:

चौदह वर्षों तक ब्रम्हचर्य का पालन किया हो।

चौदह वर्षों तक जो सोया ना हो।

चौदह वर्षों तक जिसने भोजन ना किया हो।

चौदह वर्षों तक किसी स्त्री का मुख ना देखा हो।

पूरे विश्व में केवल लक्ष्मण ही ऐसे थे जिन्होंने मेघनाद के वरदान की इन शर्तों को पूरा किया था इसी कारण केवल वही मेघनाद का वध कर सकते थे।"


तब श्रीराम बोले "हे गुरुदेव! मेघनाद और लक्ष्मण दोनों के बल और पराक्रम से मैं अवगत हूँ। अगर शक्ति की बात की जाये तो निःसंदेह इन दोनों की कोई तुलना नहीं थी। लक्ष्मण के ब्रम्हचारी होने की बात मैं समझ सकता हूँ किन्तु मैं वनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल उसे देता रहा। मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था और बगल की कुटी में लक्ष्मण थे। मैंसीता और लक्ष्मण अधिकतर समय साथ ही रहते थे फिर भी उसने सीता का मुख भी न देखा होभोजन ना किया हो और चौदह वर्षों तक सोए न होंऐसा कैसे संभव है?" अगस्त्य मुनि सारी बात समझ कर मुस्कुराए। वे समझ गए कि श्रीराम क्या चाहते हैं। दरअसल सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन वे चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो तभी ऐसा पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा कि "क्यों ना स्वयं लक्ष्मण से इस विषय में पूछा जाये।" लक्ष्मण को बुलाया गया। सभा में आने पर उन्होंने सबको प्रणाम किया फिर श्रीराम ने कहा "प्रिय भाई! तुमसे जो भी पूछा जाये उसका सत्य उत्तर दो। हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखाफल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहेऔर १४ वर्ष तक कैसे सोए नहीं?

लक्ष्मण ने कहा "भैया! जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखा कर पहचानने को कहा तो आपको स्मरण होगा कि मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया थाक्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं था। मैं तो भाभी को केवल उनके चरणों से पहचानता हूँ। उनके अतिरिक्त मैंने वनवास के समय शूर्पणखा एवं बालि की भार्या देवी तारा को ही देखा था किन्तु एक तो वे अनायास ही मेरे समक्ष आ गयी थी और दूसरे वे दोनों पूर्ण मनुष्य नहीं थी। शूर्पणखा राक्षसी थी और तारा वानर जाति की।"

"रही बात निद्रा की तो जब आप और माता एक कुटिया में सोते थेमैं रात भर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था। निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने का प्रयास किया तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था। तब निद्रा देवी ने हार कर स्वीकार करते हुए मुझे वचन दिया कि वह चौदह वर्ष तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी किन्तु जब आपका अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा तब वो मुझे घेरेगी। आपको याद होगाराज्याभिषेक के समय जब मैं आपके पीछे छत्र लेकर खड़ा था तब निद्रा के कारण मेरे हाथ से छत्र गिर गया था। निद्रा देवी को दिया वचन के कारण ही मैं आपका राजतिलक भी नहीं देख सका था क्यूंकि मैं सो गया था।" लक्ष्मण के ना सोने का एक रहस्य उर्मिला की "उर्मिला-निद्रा" भी है। इस कथा के अनुसार लक्ष्मण की जगह उर्मिला १४ वर्षों तक सोती रही थी। इसके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

अब निराहारी रहने की बात भी सुनिए। मैं जो फल-फूल लाता थामाता उसके तीन भाग करती थीं। आप सदैव एक भाग मुझे देकर कहते थे लक्ष्मण फल रख लो। आपने कभी फल खाने को नहीं कहा फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसेमैंने उन्हें संभाल कर रख दिया। सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे। गुरु विश्वामित्र से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था - बिना आहार किए जीने की विद्या। उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका।"

श्रीराम ने आश्चर्य में पड़ते हुए कहा तो क्या सारे वनवास काल के फल वही हैं?" तब लक्ष्मण ने कहा "नहीं भैयाउनमे सात दिन के फल कम होंगे।" तब श्रीराम ने कहा "इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?" इसपर लक्ष्मण ने कहा "भैया सात दिन के फल कम इस कारण है क्योंकि उन सात दिनों में फल आए ही नहीं।"

जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिलीहम निराहारी रहें।

जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता?

जिस दिन समुद्र की साधना कर आप निराहारी रह उससे राह मांग रहे थे।

जिस दिन हम इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे।

जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता का शीश काटा था और हम शोक में रहें।

जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी और मैं पूरा दिन मरणासन्न रहा।

जिस दिन आपने रावण-वध किया उस दिन हमें भोजन की सुध कहां थी।


लक्ष्मण के जीवन का ऐसा त्याग और सत्चरित्र देख कर वहाँ उपस्थित सभी लोग साधु-साधु कह उठे। भरत ने भरे कंठ से कहा "तुम धन्य हो लक्ष्मण। वास्तव में ऐसा कठिन तप केवल तुम्ही कर सकते थे और केवल तुम्ही इंद्रजीत का वध करने के योग्य थे। कदाचित इसी कारण मुझे या शत्रुघ्न को भैया के साथ वन जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ क्यूंकि ऐसा संयम केवल तुम्हारे लिए ही संभव है।" श्रीराम ने गदगद होकर लक्ष्मण को अपने गले से लगा लिया और कहा "प्रिय लक्ष्मण। वास्तव में तुम जैसा भाई मिलना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव है। तुम्हारा ये आत्म-नियंत्रण किसी तपस्या से कम नहीं। तुम्हारे इसी तपस्या के कारण हम रावण को पराजित करने में सफल हो पाए। वास्तव में तुम्ही इस विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धा हो। जब तक ये विश्व रहेगातुम्हारी सत्चरित्रता सबका मार्गदर्शन करती रहेगी।"









रावण द्वारा रामेश्वरम् की स्थापना

रावण द्वारा रामेश्वरम् की स्थापना

रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी| बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की ‘इरामावतारम्’ में यह कथा है|

भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए रावण को निमंत्रित किया था| रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना| रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है| वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था|
रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था उसे भविष्य का पता था, वह जानता था कि राम से जीत पाना उसके लिए असंभव था, जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया, जामवन्त जी दीर्घाकार थे । 

आकार में वे कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे । इस बार राम ने बुद्ध-प्रबुद्ध, भयानक और वृहद आकार जामवन्त को भेजा है । पहले हनुमान, फिर अंगद और अब जामवन्त । यह भयानक समाचार विद्युत वेग की भाँति पूरे नगर में फैल गया । इस घबराहट से सबके हृदय की धड़कनें लगभग बैठ सी गई । निश्चित रूप से जामवन्त देखने में हनुमान और अंगद से अधिक ही भयावह थे । सागर सेतु लंका मार्ग प्रायः सुनसान मिला । कहीं-कहीं कोई मिले भी तो वे डर के बिना पूछे राजपथ की ओर संकेत कर देते थे। बोलने का किसी में साहस नहीं था । प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे । इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा ।

यह समाचार द्वारपाल ने लगभग दौड़कर रावण तक पहुँचाया । स्वयं रावण उन्हें राजद्वार तक लेने आए । रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ । मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ । उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है । रावण ने सविनय कहा – आप हमारे पितामह के भाई हैं । इस नाते आप हमारे पूज्य हैं । आप कृपया आसन ग्रहण करें । यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा । जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की । उन्होंने आसन ग्रहण किया । रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया । तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने तुम्हें प्रणाम कहा है । वे सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं । इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्ठा प्रकट की है । मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ ।

प्रणाम प्रतिक्रिया अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जारहा है ? बिल्कुल ठीक । श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है ।

प्रहस्त आँख तरेरते हुए गुर्राया – अत्यंत धृष्टता, नितांत निर्लज्जता । लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे ।

मातुल ! तुम्हें किसने मध्यस्थताकरने को कहा ? लंकेश ने कठोर स्वर में फटकार दिया । जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है । क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया । लेकिन हाँ । यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं ।

जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं । यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ? जामवंत खुलकर हँसे । मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझ किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता । ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहेहैं । जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं । उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त ! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा । इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें ।

उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए । प्रहस्थ का शरीर पसीने से लथपथ हो गया । लंकेश तक काँप उठे । पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते । अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो । जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते । उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं । रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें । यजमान उचित अधिकारी है । उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है । राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए । अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है । यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है । तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं । विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना । ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी । अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना । स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य । यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया । स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया ।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा । आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा । जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे । सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । सुग्रीव ही नहीं विभीषण को भी उसने उपेक्षा कर दी । जैसे वे वहाँ हों ही नहीं ।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें । श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं । अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं । यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था । इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है । इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ? कोई उपाय आचार्य ? आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं । स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं । श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया ।

श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे । अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान । आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया । गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा लिंग विग्रह ? यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं । अभी तक लौटे नहीं हैं । आते ही होंगे । आचार्य ने आदेश दे दिया विलम्ब नहीं किया जा सकता । उत्तम मुहूर्त उपस्थित है । इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले । जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की । यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया । श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया । आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया ।
अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की……राम ने पूछा आपकी दक्षिणा? पुनः एक बार सभी को चौंकाया आचार्य के शब्दों ने । घबराओ नहीं यजमान । स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती । आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है ।

आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे । आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी । ऐसा ही होगा आचार्य । यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी । “रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।” यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए । सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।


वो 06 श्राप जो रावण के विनाश का कारण बने

रावण के बारे में कौन नहीं जनता। उसकी वीरता सर्व-विख्यात थी। उसे सप्तसिंघुपति कहा जाता था क्यूंकि उसने सातों महाद्वीपों पर विजय पायी यही। उसे परमपिता ब्रम्हा का वरदान प्राप्त था और उसपर महारुद्र की विशेष कृपा थी। यही कारण था कि उससे युद्ध करने का कोई साहस नहीं करता था। यही नहीं, उसने समस्त देवताओं पर विजय पायी थी और नवग्रह उसके वश में थे। सभी गृह उसकी इच्छा से चलते थे इसीलिए वो अपनी मृत्यु का योग बदल सकता था। शनि को उसने अपने दरबार में अपने पैरों के नीचे रखता था। इतने प्रतापी और वीर असुर की मृत्यु अवश्य ही अत्यंत कठिन थी इसी कारण प्रकृति ने उसके लिए कोई और उपाय सोचा। रावण को अपने जीवन में कई ऐसे श्राप मिले जो आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण बनें, किन्तु ६ श्रापों का विशेष रूप से जिक्र है:
इक्षवाकु कुल में एक श्रीराम के एक पूर्वज अनरण्य हुए। उस समय रावण युवा था और विश्व विजय के अभियान पर निकला था। उसी दौरान उसका सामना अनरण्य से हुआ। उन्होंने रावण को रोकने की बड़ी कोशिश की किन्तु अंततः रावण से पराजित हुए। रावण ने उनका वध कर दिया किन्तु मरते-मरते उन्होंने रावण को श्राप दिया कि उनके ही वंश में जन्मा एक व्यक्ति उसका वध करेगा। उनका श्राप सत्य हुआ और आगे चल कर श्रीराम ने रावण का वध किया। 
एक बार रावण महादेव से मिलने कैलाश गया। उस समय महादेव समाधि में लीन थे इसीलिए नंदी ने रावण को आगे जाने से रोक दिया। इसपर उसने नंदी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें वानर के समान मुख वाला कहा। तब नंदी ने रावण को श्राप दिया कि वानरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा। आगे चलकर सुग्रीव की वानर सेना ने श्रीराम की सहायता की जिससे रावण का सर्वनाश हुआ। 
वैजयंतपुर के सम्राट दैत्यराज शंभर माया के पति थे। माया मय दानव की पुत्री और रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। एक बार रावण वैजयंतपुर दैत्यराज शंभर के यहां गया। वहाँ वो माया के रूप पर मोहित हो गया और माया भी रावण के रूप पर मोहित हो गयी और दोनों के बीच सम्बन्ध बन गए। जब शंभर को इसकी सूचना मिली तो उसने रावण को को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया और उस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे  रोकना चाहा पर माया ने उसे श्राप दिया कि तुमने वासनायुक्त मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई। अत: तुम भी स्त्री की वासना के कारण मारे जाओगे।
एक बार भ्रमण करते हुए रावण की दृष्टि वेदवती नाम की एक स्त्री पर पड़ी जो भगवान विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए तप कर रही थी। रावण ने उससे प्रणय याचना की किन्तु वेदवती ने खुले तौर पर मना कर दिया। इसपर रावण ने उसके केश पकडे और घसीटे हुए बलपूर्वक अपने साथ ले जाने लगा। इसपर उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। कहा जाता है वेदवती ही अगले जन्म में सीता के रूप में जन्मी थी जिस कारण रावण का सर्वनाश हुआ। 
रावण ने इंद्र पर आक्रमण किया और स्वर्गलोक पहुँचा। वहाँ उसे रम्भा नमक अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें क्यूँकि मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं अतः मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं किन्तु रावण नहीं माना और उसने रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो रावण का मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएंगे। यही कारण था कि सीता का अपहरण करने के बाद भी रावण ने उसे स्पर्श नहीं किया। 
रावण की बहन सूर्पनखा ने रावण की इच्छा के विरूद्ध एक दैत्य विद्युत्जिह्व से विवाह कर लिया। वो कालकेय दैत्यों का सम्राट था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ और उस युद्ध में रावण ने विद्युत्जिह्व का वध कर दिया। जब सूर्पनखा उसके साथ सती होने तो रावण ने उसे रोक दिया और बलपूर्वक लंका ले आया। बाद में उसे समझा-बुझा कर खर-दूषण के साथ दंडकारण्य का राज्य दे दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा। कहा जाता है कि सूर्पनखा दंडकारण्य में जान-बूझ कर राम-लक्षमण से उलझी ताकि रावण का सर्वनाश हो सके। 


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