Balarishta Yog (बालारिष्ट योग) | आयु निर्णय | Balarishta Dosham
बालारिष्ट योगारिष्टमल्यं मध्यंच दीर्घकम्। दिव्यं चैवामितं चैवं सप्तधायुः प्रकीर्तितम्।।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मृत्यु के सात प्रकार बताए गए हैं—बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य और अमित। मृत्यु का ज्ञान अत्यंत दुर्लभ माना गया है, फिर भी इन सात प्रकारों के आधार पर आयु का विचार किया जाता है। बच्चे तथा उसके माता-पिता के पूर्व जन्म के दुष्कृत्यों से उत्पन्न जन्मकालीन क्रूर ग्रह स्थितियों को रिष्ट या अरिष्ट कहा जाता है। शब्दकोश में रिष्ट का अर्थ शुभ-अशुभ दोनों है, किंतु आयु निर्णय में इसका अर्थ अशुभ योग ही लिया जाता है। ये अरिष्ट योग कभी केवल शिशु, कभी माता, कभी पिता, कभी माता-पिता दोनों या पूरे परिवार के लिए कष्टकारक माने गए हैं। अभुक्त मूल, भद्रा, यमघंट, दग्ध, मृत्यु योग, व्यतिपात, वैधृति, वज्रयोग, ग्रहणकाल, सूर्य संक्रांति, अमावस्या, कृष्ण चतुर्दशी, विष घटी, चंद्र-लग्न मृत्यु अंश आदि अनेक अशुभ काल भी रिष्ट की श्रेणी में आते हैं। इसके अतिरिक्त वज्रपात, भूकंप, उल्कापात, धूमकेतु आदि अपशकुन भी अरिष्ट माने गए हैं। किसी भी अरिष्ट योग का फलादेश करने से पहले उसके अरिष्ट भंग (परिहार) का विचार अवश्य करना चाहिए।
आचार्य केशव के अनुसार शिशु के जीवन के प्रारंभिक वर्ष अत्यंत संवेदनशील होते हैं और पहले तीन वर्ष विशेष रूप से संकटपूर्ण होते हैं। वैद्यनाथ के अनुसार पहले चार वर्ष माता के कर्मों से, अगले चार वर्ष पिता के कर्मों से और उसके बाद बालक अपने कर्मों से प्रभावित होता है। बारह वर्ष तक माता-पिता की देखभाल और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, अन्यथा अनिष्ट संभव है।
ज्योतिष ग्रंथों में अनेक अरिष्ट योग बताए गए हैं, जैसे लग्न व सप्तम में पाप ग्रह, निर्बल चंद्रमा, शुभ दृष्टि का अभाव आदि शीघ्र मृत्यु के संकेत देते हैं। उदाहरणस्वरूप, पापयुक्त चंद्रमा पर शुभ दृष्टि न हो तो शीघ्र मृत्यु संभव है। सारावली के अनुसार यदि चंद्रमा सप्तम भाव में सूर्य और मंगल के साथ हो तो आयु एक सप्ताह तक हो सकती है। कुछ योगों में आयु एक माह से भी कम बताई गई है, जैसे मंगल विशेष भावों में हो और सूर्य-शनि एक राशि में हों। अन्य स्थितियों में 11 दिन, 20 दिन या 6 माह तक की आयु भी बताई गई है।
Balarishta Yoga in Kundali (अल्पायु योग) क्या है?
ज्योतिष शास्त्र में आयु को तीन भागों में बांटा गया है—अल्पायु (0–12 वर्ष), मध्यम आयु और पूर्ण आयु। बालारिष्ट योग वह स्थिति है जिसमें जन्म कुंडली में ऐसे ग्रह योग बनते हैं जो बाल्यावस्था में कष्ट, रोग या अल्प आयु का संकेत देते हैं। यह योग तब बनता है जब चंद्रमा निर्बल हो, लग्न या लग्नेश कमजोर हो, पाप ग्रह प्रभावी हों और शुभ ग्रहों का सहयोग न मिले।
1 से 12 वर्ष तक आयु देने वाले प्रमुख बालारिष्ट योग (संक्षेप)
1–2 वर्ष: लग्न में चंद्रमा और केंद्र में पाप ग्रह, वक्री शनि पर मंगल दृष्टि।
3 वर्ष: गुरु 12वें या अष्टम में पाप दृष्ट, लग्नेश पाप ग्रह से युक्त।
4 वर्ष: निर्बल चंद्रमा दुस्थान में, बुध पर पाप दृष्टि।
5 वर्ष: सूर्य-चंद्र-मंगल-गुरु युति, अष्टमेश-लग्नेश संबंध।
6 वर्ष: लग्नेश पाप ग्रह से युक्त और शनि दृष्ट।
7–8 वर्ष: लग्न में पाप ग्रह, निर्बल चंद्र सप्तम में।
8 वर्ष: पंचम-नवम में पाप ग्रह, शुभ दृष्टि का अभाव।
9 वर्ष: सूर्य-चंद्र-मंगल पंचम में, निर्बल चंद्र पाप दृष्ट।
10 वर्ष: राहु सप्तम में, शुभ दृष्टि का अभाव।
11 वर्ष: सूर्य-गुरु युति विशेष स्थिति में।
12 वर्ष: राहु सप्तम में पाप दृष्ट, लग्नेश-चंद्र 6/8/12 में।
बालारिष्ट योग बनने के मुख्य कारण
Weak Moon in Kundali, Malefic planets in Kendra, Afflicted Lagna and Lagnesh, Rahu-Ketu influence, Lack of benefic aspect.
महत्वपूर्ण नोट
केवल बालारिष्ट योग होने से निश्चित रूप से अल्पायु नहीं होती। कई बार कुंडली में अरिष्ट भंग योग भी बनते हैं जो इन दोषों को समाप्त कर देते हैं, इसलिए अंतिम निर्णय संपूर्ण कुंडली के विश्लेषण से ही किया जाना चाहिए।
Balarishta Dosham (English Explanation)
Baalarishta dosham refers to planetary combinations that can cause serious health issues or threaten the life of a child up to 12 years of age. The first 12 years are divided into three phases: 0–4 years (mother’s karma), 5–8 years (father’s karma), and 9–12 years (child’s own karma). To reduce its effects, the child’s horoscope should be analyzed immediately after birth. If the dosha is present, appropriate graha shanti remedies should be performed regularly until 12 years. If not, normal rituals like naming ceremony and annaprasana can be done without concern.