अगर आपके जीवन में कोई परेशानी है, जैसे: बिगड़ा हुआ दांपत्य जीवन , घर के कलेश, पति या पत्नी का किसी और से सम्बन्ध, निसंतान माता पिता, दुश्मन, आदि, तो अभी सम्पर्क करे. +91-8602947815
Showing posts with label षोडश वर्ग Shodash varga. Show all posts
Showing posts with label षोडश वर्ग Shodash varga. Show all posts

द्वादशांश वर्ग Dwadashansha varga

द्वादशांश वर्ग Dwadashansha varga

द्वादशांश को D-12 कुण्डली भी कहा जाता है. द्वादशांश कुण्डली द्वारा माता-पिता के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है. इस कुण्डली का अध्ययन करने से माता पिता के जीवन के उतार चढावों के बारे में जानकारी मिलती है. इसके साथ ही साथ इससे हमें आयु के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है. 

द्वादशांश कुण्डली बनाने के लिए 30 अंश के 12 बराबर भाग किए जाते हैं. इसका प्रत्येक भाग 2 अंश 30 मिनट का होता है. इस प्रत्येक भाग द्वारा फल कथन करना आसान होता है और व्यक्ति के चरित्र एवं उसके अनेक पहलुओं पर विचार किया जाता है.
द्वादशांश कुंडली :- इस कुंडली के द्वारा माता पिता के सहयोग के साथ साथ पैत्रक संपत्ति पर भी विचार करते है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश यदि शुभ गृह हो तो जातक के माता पिता शुभ आचरण युक्त और यदि पाप गृह युक्त और पाप गृह हो तो पाप युक्त अचर्ना करने वाले होते है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश यदि पुरुष गृह सवा ग्रही मित्र क्षेत्रीय उच्च का हो तथा केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक को अपने माता पिता से पूर्ण सहयोग अच्छी पत्रक संपत्ति मिलती है साथ ही जातक की सुख सुविधा में कमी नहीं रहती है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश 6 8 12 वे भाव में तो जातक को अपने माता पिता का सुख व सहयोग नहीं मिलता है 


लग्नगत द्वादशांश राशि फल 
जन्म लग्न से जो द्वादशांश की राशि है उसके फल का विवेचन निम्नानुसार है।

मेष के द्वादशांश मे जातक* दुष्टात्मा, चोर, अधर्मी, पापी होता है। वृषभ के द्वादशांश मे जातक स्त्रीवान, धनवान एवं रोगी होता है। मिथुन के द्वादशांश मे जातक जुआरी लेकिन सुशील होता है। कर्क के द्वादशांश मे जातक दुराचारी, दुष्ट, खराब व्यवहार करने वाला होता है। सिंह के द्वादशांश मे जातक तपस्वी, राजकाज करने  वाला, शूरवीर होता है। कन्या के द्वादशांश मे जातक जुआरी, स्त्री मे रत या वैश्यागामी होता है। 

तुला के द्वादशांश मे जातक व्यापारी, धनवान होता है। वृश्चिक के द्वादशांश मे जातक वध करने मे रुचिवान, वैश्या को रखने वाला (वीट) चोरो मे प्रधान होता है। धनु के द्वादशांश मे जातक माता-पिता व देवताओ का भक्त होता है। मकर के द्वादशांश मे जातक धन-धान्य की प्रचुरता वाला होता है। कुम्भ के द्वादशांश मे जातक अनेक सेवक युक्त, दुष्ट होता है। मीन के द्वादशांश मे जातक धनवान, विद्वान होता है। 


समस्त ग्रहो का लग्नगत फल 

सूर्य के द्वादशांश मे जातक नीच (मलिन) चंचल, क्रूर, अल्पायु, निष्ठुर, निर्धन, आलसी, कामी, अधर्मी होता है। 

अन्यच्च : सूर्य  के द्वादशांश मे जातक अभिमानी, लोभी, धनवान, धर्महीन, अविवाहित, उग्र, चंचल होता है।   


चंद्र के द्वादशांश मे जातक रत्नो से युक्त, अनेक प्रकार से अर्थ लाभ प्राप्त करने वाला, सुशील, कुल प्रधान, बहु मित्र वाला, कलात्मक रुचिवान, दस्तकारी निपुण होता है।
अन्यच्च : चंद्र  के द्वादशांश मे जातक बंधुओ को आश्रय देने वाला, बुद्धिमान, धनवान, प्रिय दर्शन, शिल्पज्ञ, अनेक प्रकार के धर्मो को मानाने वाला होता है।

मगल के द्वादशांश मे जातक पर निंदक, तीव्र काम (भोग) लिप्सा वाला, चगुलखोर, मुर्ख, पापी, स्रियो से प्रेम करने वाला, अधर्मी, नीच होता है।
अन्यच्च : मंगल के द्वादशांश मे जातक रक्त रोगी, चर्म रोगी, व्यसनी, दुराचारी, झगड़ालू , रण भीरु होता है।

बुध के द्वादशांश मे जातक सदाचारी, सुशील, सुभग, सौभाग्यशाली, विद्यानुरागी, देव-गुरु भक्त, शराबी होता है।
अन्यच्च : बुध के द्वादशांश मे जातक इन्द्रिय सुख को महत्व देने वाला, स्वादिष्ट भोजन का शौकीन होता है।

गुरु के द्वादशांश मे जातक पवित्र, शास्त्रार्थ मे कुशल, विविध विषय का ज्ञाता, सुखी, दीर्घायु, शत्रुओ का स्वामी, बंधु-बांधव व मित्रो को आश्रय देने वाला होता है।
अन्यच्च : गुरु के द्वादशांश मे जातक अनेक शास्त्रो का ज्ञाता, सुख-वैभव सम्पन्न, गीत युक्त (गायक या लेखक)  अधिक मित्र वाला, रण चतुर।

 शुक्र के द्वादशांश मे जातक शूरवीर, अधिक धन का हिस्सेदार, नृत्य-गीत प्रिय, पवित्र, दानी, क्षमावान होता है।
अन्यच्च : शुक्र के द्वादशांश मे जातक सुभग, रूपवान, राज से सम्मानित, प्रतिष्ठित, उदार, मानी-धनी होता है।

शनि के द्वादशांश मे जातक चंचल, चालक, ,चुगलखोर, निंदक, धूर्त, पर धन लोभी, नीच, मलिन, धर्म हीन निंदनीय कार्यकारी होता है।  
अन्यच : शनि के द्वादशांश मे जातक युद्ध (वैर, विरोध, झगड़ा) प्रेमी, रोगी, दुरा चारी, बंधुहीन, शोकाकुल, पर धर्मी (दूसरो के धर्म को मान ने वाला) होता है।

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे सूर्य फल 
सूर्य के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक तीक्ष्ण, डरपोक, महा गुस्से वाला, धन व साहस हीन, पर धन हरने मे निपुण, बुद्धिहीन होता है। 

चंद्र के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक सौम्य, विनीत, विद्वान्, धन-सम्पदा युक्त, शुभकर्मी, विद्याविनित, सुखी, प्रसन्नचित्त, वैभवशाली होता है। 

मंगल के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक प्रियजन व प्रिया (स्त्री) से विमुक्त, कैदी, पापी, सत्य से विमुक्त यानि झूठ बोलने वाला, कुतर्कशील होता है। 

बुध के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक सत्यवादी, सर्व सुख सम्पन्न, अथिति प्रिय, विद्वानो का सम्मान करने वाला, सनाथ (दीर्घकाल तक माता-पिता की छत्र-छाया मे रहने वाला) होता है। 

गुरु के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक स्त्री प्रिय, गीत कला मे दक्ष, भोगी, वस्त्राभूषण एवं  सुगन्धित द्रव्यो से युक्त, विनय प्रधान होता है। 

शुक्र के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक कुशल शिल्पी, वश में करने वाला, आत्मसयमी, सहनशील, शूरवीर, राज सम्मानी, धर्मरत होता है। 

शनि के द्वादशांश मे सूर्य फल - जातक दुर्बल, कायर, पापी, डरपोक, कृतघ्न, दरिद्र, नपुंसक, मलिन वस्त्र धारण करने वाला, अनेक दुखो से युक्त होता है।


समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे चंद्र फल


सूर्य द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक भयभीत, प्रमादी, दुखी, लापरवाह, मित्र विहीन, आलसी कृतघ्न होता है।

चंद्र द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक धनवान कुशल वक्ता, अल्प शत्रु वाला, सुन्दर पुत्रवान, वाहन युक्त होता है। 

मंगल द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक सुखी, बुद्धिमान, भोगी, सुन्दर वेश-भुषा वाला, स्व धर्म रत होता है।

बुध द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक सौम्य, शिल्पज्ञ, अद्भुत कर्म करने वाला, अथिति प्रिय, प्रसिद्ध  होता है। 
गुरु द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक सुवेशी, राजा का कृपा पात्र, सुन्दर वाहन युक्त. अनेक मित्र वाला होता है। शुक्र द्वादशांश मे चंद्र फल -  विनीत, राजा का कृपापात्र, प्रचुर समृद्धि (हाथी-घोड़े, धन-धान्यादि) वाला होता है।
शनि द्वादशांश मे चंद्र फल - जातक चंचल, कंगाल, सत्यवक्ता, सत्यनिष्ठ, स्वजनो से उपेक्षित  होता है।

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे मंगल फल
सूर्य के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक रति प्रिय, कुशिल्पी, कूटनीतिज्ञ, चंचल, व्रण या बंधन युक्त (धाव, फोड़े या कैद) ध्वंसकारी, विनाशकारी, कार्यो मे सलग्न, धूर्त होता है।
चंद्र के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक सुन्दर कांतिवान, उदार, बहुमुखी, बुद्धिमान, बहु भाइयो वाला होता है।
मंगल के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक स्त्री से अभागा, नौकर (स्वतंत्र नौकरी करने वाला) स्त्री तुल्य रूप और आकृति वाला, धार्मिक कृत्य युक्त, कोमल शरीर वाला व्यसनी होता है।
बुध के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक उद्योगी, स्थूल स्त्री व वस्त्राभूषण से युक्त, प्रसिद्ध, राजा से पीड़ित होता है।
गुरु के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक प्रख्यात बुद्धिवाला, सुखी स्वतंत्र, कवि, वाद विवाद मे विजयी, धनवान, सुभग (मनोहर स्वभाव) होता है।
शुक्र के द्वादशांश मे मंगल फल - जातक स्त्रियो द्वारा चाहा जाने वाला, मधुर, विनीत, दण्ड देने वाला, आदर पाने वाला, शत्रु पक्ष से मिला हुआ होता है।
शनि के द्वादशांश मे मंगल फल - भाई से द्वेषीला, विवादशील, बहुप्रलापी, चंचल, दुराचारी, कलह युक्त होता है।

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे बुध फल
सूर्य के द्वादशांश मे बुध फल - जातक पापमति वाला, सुखहीन, बुरे मित्रो वाला, अधिक शत्रु वाला, यश का विनाश, पुत्रहीन या पुत्र से दुखी होता है।
चंद्र के द्वादशांश मे बुध फल - जातक प्रतापी, रतिसुख युक्त, धनवान, विशिष्ट व्यवहार करने वाला होता है।
मंगल के द्वादशांश मे बुध फल - जातक धूर्त, दुराचारी, धनहीन, बंधुओ से दुर्व्यवहार करने वाला, रोगी होता है।
बुध के द्वादशांश मे बुध फल - जातक शास्त्राभ्यासी, कला निपुण, शत्रु से झुकने वाला, जितेन्द्रिय होता है।
गुरु के द्वादशांश मे बुध फल - जातक सुशील, धनवान, समृद्धि युक्त, धार्मिक, आस्तिक, अथिति प्रिय होता है।
शुक्र के द्वादशांश मे बुध फल - जातक प्रचुर अन्नकोश वाला, राजा का प्रिय, सज्जन, साधुओ मे अनुरक्त, सद्धर्मी, पुण्य और सुख प्राप्त करने वाला होता है।
शनि के द्वादशांश मे बुध फल - जातक दीन, कपटी, हीन, दरिद्री, मायावी, कंजूस, खर्चीला, बली, निष्ठुर होता है।

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे गुरु फल  

सूर्य के द्वादशांश मे गुरु फल - जातक निर्धन, कुरूप, अपयशी, अनेक शत्रु, मित्र रहित, दुराचारी, दुःखी होता है। 

चंद्र के द्वादशांश मे गुरु फल - जातक धनवान, अथिति प्रिय, सुखी, राजा से सम्मानित, सबका प्रेमपत्र होता है।

मंगल के द्वादशांश मे गुरु फल - जातक दुष्ट, अधर्मी, दुराचारी, जेल भोगने वाला, व्यसनी, रोगी होता है।

बुध के द्वादशांश मे बुध फल - जातक संसार प्रसिद्ध, सर्वगुण संपन्न, सत्यवादी, प्रभुप्रिय, बंधुओ प्रिय होता है।

गुरु के द्वादशांश मे गुरु फल - जातक सर्व समृद्धिवान, बलवान, शत्रुहंता, भय और रोग मुक्त, सुशील होता है। 

शुक्र  के द्वादशांश मे गुरु फल - जातक प्रचुर धनादि से युक्त, अथिति प्रिय, कामुक, शत्रुओ से लापरवाह होता है। 

शनि के द्वादशांश मे गुरु  फल - जातक मलिन वेशभूषा वाला, दीन, कुरूप, दस्यु,-दुष्ट -सरकार से पीड़ित होता है। 

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे शुक्र फल  

सूर्य के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक कुबुद्धि, नीचो का संग करने वाला, क्रोधी, वाचाल, हत्यारा होता है। 
चंद्र के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक श्रेष्ठ वाहन युक्त, राजा का प्रिय, भोगी, धनवान, जल बिहारी होता है।
मंगल के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक विदेश जाने वाला, कृतघ्न, नासमझ, जुआरी, पर स्त्री रत होता है।
बुध के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक सुभग, सुंदर, पदवान,  प्रसिद्ध, विद्या अर्जन में तत्पर, अल्प दोषी होता है।
गुरु के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक सुबुद्धि, सम्मानित, विचित्र भोग भोगने वाला, मित्र युक्त, धनी होता है।
शुक्र के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक विचित्र भाषी, रति कुशल, गीत रत, धर्मी, कामी, मंत्री या सचिव होता है।
शनि के द्वादशांश मे शुक्र फल - जातक सुख एवं भाग्यहीन, पापी, प्रवासी, रोगी, शत्रु द्वारा त्यक्त्य होता है।

समस्त ग्रहो के द्वादशांश मे शनि फल  
सूर्य के द्वादशांश मे शनि फल - जातक बुद्धि और धर्म हीन, निष्ठुर, निर्दयी, वाचाल, दुष्ट, नीच, प्रभावहीन होता है।चंद्र के द्वादशांश मे शनि फल - जातक सुमति, लाभयुक्त, राजा से सम्मानित, लज्जान्वित,  न्यायी होता है।
मंगल के द्वादशांश मे शनि फल - जातक टेड़े स्वभाव वाला, कुटिल, आलसी, भीरु, निन्दित, दोषी होता है।
बुध  के द्वादशांश मे शनि फल - जातक प्रतिभावान, धनवान, सलज्ज, धर्मरत, कृतिवान, सम्मानी होता है।
गुरु के द्वादशांश मे शनि फल - जातक धनवान, पुत्रवान, सलज्ज, सत्य व  न्याय का पक्षधर होता है।
शुक्र के द्वादशांश मे शनि फल - जातक प्रचुर अन्न व वस्त्राभूषण युक्त, विशिष्ठ भार्या वाला, भाग्यवान होता है।
शनि के द्वादशांश मे शनि फल - जातक स्थिर बुद्धि, व्रती उपवासी, कुल प्रधान, बुरे आचरण करने वाला होता है।

द्वादशांश फल विशेष : 
द्वादशांश कुंडली से जातक के माता-पिता का सुख उनकी आयु का विचार किया जाता है। यहा जन्मांग से द्वादशांशेश का विचार किया गया है। 
यदि द्वादशांश कुंडली का स्वामी (द्वादशांशेश) जन्म लग्न मे हो, तो जातक माता-पिता के बराबर धनी-गुणी, मान-प्रतिष्ठा और द्रव्य वाला होता है। यदि द्वादशांशेश धन स्थान अर्थात द्वितीय स्थान मे हो, तो जातक पिता से अधिक धनी और गुणी होता है। यदि द्वादशांशेश तृतीय अर्थात पराक्रम स्थान मे हो, तो जातक पिता से अधिक यशस्वी होता है।
यदि द्वादशांशेश चतुर्थ अर्थात सुख स्थान मे हो, तो जातक भाग्यशाली, सुखी होता है। यदि द्वादशांशेश पंचम अर्थात विद्या संतान स्थान मे हो, तो जातक बुद्धिमान, पिता को सुख देने वाला होता है।  यदि द्वादशांशेश षष्ठ अर्थात रोग-ऋण-रिपु स्थान मे हो, जातक अधिक शत्रु वाला, अल्प लाभी होता है।
यदि द्वादशांशेश सप्तम अर्थात कलत्र स्थान मे हो, तो सुख, लाभ मिलता है। यदि द्वादशांशेश अष्टम अर्थात मारक स्थान मे हो, तो शस्त्र या शत्रु या विषैले जीव से या आत्महत्या से अपमृत्य होती है। यदि द्वादशांशेश नवम अर्थात भाग्य स्थान मे हो, तो जातक का पिता धार्मिक वृत्ति वाला, तीर्थसेवी होता है।
यदि द्वादशांशेश दशम अर्थात धर्म स्थान मे हो, तो जातक पिता से अधिक सुख-समृद्धी युक्त होता है। यदि द्वादशांशेश एकादश अर्थात लाभ स्थान मे हो, तो जातक को पिता से गुप्त धन (अघोषित) तथा आकस्मिक सट्टा लाटरी आदि से भी धन प्राप्त होता है।  यदि द्वादशांशेश (द्वादशांश का स्वामी) द्वादश अर्थात व्यय स्थान मे हो, तो वृथा धननाश, माता-पिता से सुख और लाभ हीन, दुष्टो का संग, निंदनीय होता है।

द्वादशांश लग्नेश जन्म कुंडली मे लग्नस्थ हो, तो पिता के सरीखा धन, वैभव, मान व प्रतिष्ठा पाता है। यदि द्वादशांशेश जन्म कुंडली मे त्रिक  6, 8, 12 भाव मे हो, तो माता-पिता से सामान्य धन और सुख, जीवन सामान्य संघर्षपूर्ण होता है।    
द्वादशांश लग्नेश जन्म कुंडली मे स्वगृही या उच्च का हो, तो जातक तथा जातक के माता-पिता भाग्यशाली होते है। द्वादशांशेश नीचस्थ या पापदृष्ट या पापयुक्त या अस्त हो, तो जातक रोगी, शत्रु, अनेक प्रकार की चिंताओ से परेशान होता है।
द्वाशशपति पुरुष ग्रह मित्रराशि या उच्चराशि मे होकर केंद्र या त्रिकोण मे हो, तो पिता का पूर्ण सुख मिलता है। यदि वही नीच या पापग्रह की राशि मे होकर त्रिक 6, 8, 12 भाव मे हो, तो पिता का सुख अल्प ही मिलता है या पिता कष्ट मे रहता है।
 द्वादशांशेश स्त्री ग्रह उच्चराशि या स्वराशि या मित्रराशि या शुभ ग्रह होकर केंद्र या त्रिकोण में बैठा हो, तो जातक को माता का पूर्ण सुख मिलता है। यदि वही स्त्री ग्रह पापयुक्त या पापदृष्ट होकर त्रिक स्थान मे स्थित हो, तो माता का सुख कम या नही मिलता है और माता अस्वस्थ रहती है।
द्वादशांश मे सप्तम भाव का स्वामी या द्वादशांश लग्नेश शुभ ग्रह हो या शुभयुक्त या शुभदृष्ट या उच्चस्थ या स्वगृही हो, तो जातक की पत्नी सुशील, सुन्दर पुत्र युक्त होती है। जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी श्रेष्ठ होता है तथा पारवारिक सुख रहता है।

द्वादशांश मे सप्तम भाव का स्वामी (सप्तमेश) या द्वादशांश लग्नेश पापग्रह हो या पापदृष्ट या पापयुक्त या नीचस्थ या अस्तगत हो, तो स्त्री से दुःख, समान्य दाम्पत्य, विचार विषमता, वैमनस्य, क्लेश होता है। (यह विचार  द्वादशांश की अपेक्षा जन्म कुंडली से करना चाहिये) 
 यदि द्वादशांश लग्न का स्वामी शुभ ग्रह हो, तो माता पिता का आचरण शुभ होता है और यदि अशुभ ग्रह हो, तो माता पिता का आचरण व्यभिचार पूर्ण होता है।

मानसागरी अनुसार  द्वादशांश फल
द्वादशांश मे जो ग्रह मित्र या उच्च राशि मे हो, तो जातक बहुत स्त्रियो का मालिक, अनेक प्रकार के धन और रत्नादि से पूर्ण होता है।
द्वादशांश मे बारह राशियो मे जातक की आयु का प्रमाण इस प्रकार होता है।  मेष 80 वर्ष, वृषभ 84 वर्ष, मिथुन 86 वर्ष, कर्क 87 वर्ष, कन्या 60 वर्ष, तुला 56 वर्ष या अधिक, वृश्चिक 70 वर्ष, धनु 90 वर्ष, मकर 66 वर्ष, कुम्भ 56 वर्ष या अधिक,  मीन 100 वर्ष है। अनुमानित आयु मे ग्रहो के अनुसार घट-बढ़ हो सकती है। आयु मान द्वादशांश लग्न मे जो राशि हो उस अनुसार है।

उपरोक्त उम्र के पूर्व भी मृत्यु हो सकती है। प्रथम द्वादशांश मे 18 वर्ष जल से; द्वितीय  द्वादशांश मे 9 वर्ष मे सर्प दंश से; तृतीय  द्वादशांश मे 10 वर्ष मे ज्वर आदि से; चतुर्थ  द्वादशांश मे 32 वर्ष की आयु मे क्षय या अन्य रोग रोग से; पंचम द्वादशांश मे 20 वर्ष मे रक्त विकार से; षष्ठ द्वादशांश मे 32 वर्ष मे अग्नि से मरण हो सकता है।

सप्तम द्वादशांश मे 28 वर्ष मे जलोदर या अन्य पेट के रोगो से; अष्टम द्वादशांश मे 30  वर्ष मे व्याघ्र या अन्य हिंसक पशु या राज्यादेश से; नवम द्वादशांश मे 12 या 32 वर्ष मे बाण या अन्य अस्त्र-शस्त्र से;  दशम द्वादशांश मे 30 वर्ष मे जल मे डूबने या वात विकार से; ग्यारहवे द्वादशांश मे स्त्री या कन्या की मृत्यु जल मे डूबने से; बारहवे  द्वादशांश मे वाहन या वाहन के पहिये के नीचे दबने से मृत्यु हो सकती है। ये असामयिक मृत्यु योग है अन्य कारणो से भी असामायिक मृत्यु हो सकती है। 


गणेश द्वादशांश | Ganesha Dwadshansha

0से 2डिग्री 30 मिनट का पहला द्वादशांश होता है , 10 डिग्री से 12 डिग्री 30 मिनट तक का पांचवां द्वादशांश और 20 डिग्री से 22 डिग्री 30 मिनट तक नौवां द्वादशांश होता है. पहला, पांचवां और नौंवा द्वादशांश गणेश द्वादशांश कहलाता है. जिस प्रकार भगवान गणेश को विघ्नविनाशक माना जाता है, उसी प्रकार यह द्वादशांश भी जीवन में आने वाले अनेक कष्टों एवं परेशानियों को दूर करने में सहायक बनता है.

लग्न या लग्नेश 1,5 और 9 द्वादशांश से संबंध बनाता है तो व्यक्ति को माता पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होता है. जातक के जीवन में माता पिता का पूरा सहयोग रहता है. जातक के माता पिता समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानिय स्थान प्राप्त करने वाले हो सकते हैं. ऎसा जातक भी जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सम्मान को पाने में सक्षमता दिखाता है. वह साहस से पूर्ण जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला होता है. क्योंकि यह गुण वह अपने माता पिता द्वारा ही तो ग्रहण करता है.

अश्विनी द्वादशांश | Ashwini Dwadshansha

2 डिग्री से 30 मिनट से 5 डिग्री दूसरा द्वादशांश, 12 डिग्री 30 मिनट से 15 डिग्री तक छठा द्वादशांश और 22 डिग्री 30 मिनट से 25 डिग्री तक दसवां द्वादशांश होता है. दूसरा, छठा और दसवां द्वादशांश अश्विनी कुमार द्वादशांश कहलाता है. यह द्वादशांश अश्विनी कुमारों का प्रतिनिधित्व करता है. जिस प्रकार अश्विनी कुमारों को देवों के वैद्य का पद प्राप्त हो उसी प्रकार यह द्वादशांश भी इसी गुण को प्रकट करने वाला होता है.

यदि लग्न या लग्नेश का संबंध अश्विनी द्वादशांश से बने तो जातक के भीतर इससे संबंधी गुणों को देखा जा सकता है. 2,6 और 10 द्वादशांश से प्रभावित होने पर माता पिता में चिकित्सक के गुण देखे जा सकते हैं. या वह एक अच्छे विद्वान और सलाहकार हो सकते हैं. इससे प्रभावित व्यक्ति चिकित्सक के गुणों को अपनाने वाला हो सकता है. उसके अंदर एक अच्छे वैध के गुण परिलक्षित हो सकते हैं. वह अपनी इस योग्यता द्वारा लोगों का हित करने में सहायक हो सकता है. इसके साथ साथ ही वह पशुओं की देख रेख करने वाला या पशु चिकित्सक भी हो सकता है. व्यक्ति में कार्य को करने की अच्छी क्षमता का विकास भी देखा जा सकता है. वह इंजिनियर या तकनीकी संबंधी कार्य से भी जुड़ सकता है.

यम द्वादशांश | Yama Dwadshansha

5 डिग्री से 7 डिग्री 30 मिनट तीसरा द्वादशांश, 15 डिग्री से 17 डिग्री 30 मिनट सातवां द्वादशांश और 25 डिग्री से 27 डिग्री 30 मिनट ग्यारहवां द्वादशांश होता है. अर्थात 3, 7 और 11 वां द्वादशांश यम द्वादशांश कहलाता है. यम मृत्यु के देवता हैं यह मनुष्य को उसके कर्मों के अनुरुप फल प्रदान करते हैं. यह जीव के सभी अच्छे बुरे स्वरूप को उसके समक्ष रख कर उसके अनुरुप उसे सही मार्ग दिखाने वाले होते हैं. जीवन में भी यम और नियम की भूमिका को बहुत महत्व दिया गया है इन्हीं यम और नियम से जुड़कर जीवन अपने सही मार्ग को पाने में सफल होता है.

यदि लग्न या लगनेश का संबंध यम द्वादशांश से बनता है तो माता पिता अनुशासन प्रिय हो सकते हैं. इससे प्रभावित होने पर अभिभावक बच्चों को अच्छे और बुरे का ज्ञान देने में सक्ष्म होते हैं. इससे प्रभावित जातक समाज में रहते हुए नीति परक नियमों का पालन करने वाला हो सकता है. इसी के साथ ही वह दूसरों को भी ऎसा करने की शिक्षा देने वाला हो सकता है तथा कुछ् कठोर होकर दूसरों को सही और गलत बताने का जिम्मा भी उठा सकता है.

सर्प द्वादशांश | Sarpa Dwadshansha

7 डिग्री 30 मिनट से 10 डिग्री तक का चौथा द्वादशांश, 17 डिग्री 30 मिनट से 20 डिग्री तक का आठवां द्वादशांश और 27 डिग्री 30 मिनट से 30 डिग्री तक बारहवां द्वादशांश होता है. चौथा, आठवां और बारहवां द्वादशांश सर्प द्वादशांश कहा जाता है. यह द्वादशांश सर्प के प्रभावों से प्रभावित होता दिखता है जैसे सांप तेज चलने वाला और विषधारी होता है तथा सर्प की पकड़ भी मजबूत होती है. उसी के गुणों से प्रभावित यह द्वादशांश माता पिता या जातक के जीवन को प्रभावित करने वाला होता है.

यदि लग्न या लगनेश इस सर्प द्वादशांश से प्रभावित हो माता पिता के स्वभाव में उग्र एवं तेजस्विता का भाव देखा जा सकता है. इससे संबंध बनने पर व्यक्ति के भीतर प्रतिशोधी और आक्रमणकारी स्वभाव देखा जा सकता है. उसकी भाषा में कटुता का समावेश हो सकता है. जातक कठिनाइयों से लड़ते हुए अपनी राह बना ही लेता है. उसके व्यवहार में सर्प की भांति वक्र गति रहती है. धीरे - धीरे ही सही वह अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो सकता है.

होरा कुंडली :- 15अंश की एक होरा होती है और एक राशि 30 अंश की होती है / अतः एक राशि में दो होरा होती है / विषम राशि में 1 ,3 , 5 ,7 ,9 , 11 ,में 0 से 15 अंश तक प्रारंभ से सूर्य की होरा होती है / 16 अंश से 30 अंश तक चन्द्रमा की होरा होती है /
0 अंश से 15 अंश तक 1 ,3 , 5 ,7 ,9 , 11
16 अंश से 30 अंश तक 2 ,4 ,6 ,8 ,10,12.
समराशियों में प्रारंभ से 15 अंश तक चन्द्रमा की होरा होती है बाद में 15 से 30 अंश तक सूर्य की होरा होती है /
धन की स्थित देखने के लिए होरा कुंडली का इस्तेमाल करते है

द्रेष्कान कुंडली :-
इस कुंडली से जातक के छोटे व बडे भाई बहनों का सहयोग या सुख का विचार किया जाता है द्रेष्कान कुंडली में लग्न का स्वामी यदि ट्रिक भाव में पीड़ित हो और लग्न कुंडली में तृतीय भाव का स्वामी भी ६८१२ भाव में हो तो जातक को भाई बहनों का सुख प्राप्त नहीं होता है अथवा उनसे दुखी रहता है 

सप्तमांश कुंडली :- 
सप्तमांश कुंडली के द्वारा जातक की संतान का विचार किया जाता है /
1 सप्तमांश कुंडली का लग्नेश यदि पुरुष गृह सूर्य मंगल गुरु हो तो जातक को पुत्र का सुख अच्छा प्राप्त होता है 
2 यदि सप्तमांश कुंडली का लग्नेश यदि स्त्री गृह चन्द्र सुकर हो तो जातक को कन्याओ का सुख प्राप्त होता है 
3 यदि सप्तमांश कुंडली में लग्नेश यदि नीच राशि में हो या पाप ग्रहों से पीड़ित हो या पाप ग्रहों का साथ हो तो जातक की संतान निम्न कार्य करने वाली होती है तथा जातक का नाम डुबाने वाली होती है 
४ यदि लग्न कुंडली में पंचमेश लग्न या त्रिकोण में बैठे और सप्तमांश कुंडली के लग्न का स्वामी शुभ ग्रहों से युत या द्रष्ट हो तो जातक की संतान अपना व कुल का नाम रोशन करती है  और जातक की उन्नति उस संतान के हनी के बाद अधिक हो जाती है 
5 यदि लग्न कुंडली में पंचमेश 6 8 12 वे भाव में चला जावे या पाप कतरी में आ जाय या शनि राहु से द्रष्ट हॉप जाए या सप्तमांश कुंडली में लग्नेश 6 8 12 वे भाव में चला जी तो जातक संतान हीन हो जाता है 

नवमांश कुंडली :- 
नवमांश कुंडली के द्वारा जातक के जीवन साथी पर विचार करते है 
नवमांश कुंडली का लग्नेश यदि मंगल हो तो जातक की स्त्री क्रूर तथा लड़ाकू होती है परन्तु यदि मंगल के साथ शुक्र भी हो तो जातक की स्त्री सुंदर हनी के साथ साथ कुलता होती है 
यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश सूर्य हो तो जातक की स्त्री पति व्रता हनी के साथ साथ उग्र स्वाभाव की होती है 
यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश चन्द्रमा हो तो शीतल स्वाभाव की गौरवर्ण की व मिलन सर होती है 
यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश बुध हो तो का ला में प्रवीण चतुर व ज्ञान वां होती है
यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश गुरु हो तो जातक की स्त्री धार्मिक कार्यो में लगी रहने वाली बहूत अधिक पूजा पथ करने वाली और अंत समय में गृहस्थ जीवन से विरक्त हनी वाली होती है 
यदि लग्नेश शुक्र होतो जातक की स्त्री सुंदर हनी के साथ साथ श्रंगार प्रिय विलाशी और प्रतेक कार्य को निपुणता से करने वाली होती है 
यदि नवमांश के लग्नेश शनि हो तो जातक की स्त्री अध्यात्मिक हनी के साथ साथ न्याय प्रिय आचरण प्रिय तथा मेहनती होती है
·लग्न या लग्नेश में राहु का प्रभाव हो तो जातक की स्त्री चुगल खोर या प्रपंच करने वाली होती है
·यदि लग्नेश पर केतु का प्रभाव हो तोजातक की स्त्री अधिक बिलनी वाली व कुछ बातो को छिपाने वाली होती है 
·यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश यदि स्वराशी में स्थित हो , केंद्र या त्रिकोण में बैठा हो तो जातक को पत्नी का पूरा सुख प्राप्त होता है 
·नवमांश पति यदि पाप यिक्त या पाप द्रष्ट हो या 6 8 12 वे भाव में हो और यह स्थित लग्न कुंडली में भी तो जैसे सप्तमेश पाप युत व पाप द्रष्ट हो तो जातक को स्त्री सुख नहीं मिलता है 
·पाप ग्राही की संख्या नवमांश लग्न में जितनी अधिक होगी जातक की स्त्री उतना अधिक परेशां होगी 

द्वादशांश कुंडली :- इस कुंडली के द्वारा माता पिता के सहयोग के साथ साथ पैत्रक संपत्ति पर भी विचार करते है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश यदि शुभ गृह हो तो जातक के माता पिता शुभ आचरण युक्त और यदि पाप गृह युक्त और पाप गृह हो तो पाप युक्त अचर्ना करने वाले होते है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश यदि पुरुष गृह सवा ग्रही मित्र क्षेत्रीय उच्च का हो तथा केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक को अपने माता पिता से पूर्ण सहयोग अच्छी पत्रक संपत्ति मिलती है साथ ही जातक की सुख सुविधा में कमी नहीं रहती है 
द्वादशांश कुंडली का लग्नेश 6 8 12 वे भाव में तो जातक को अपने माता पिता का सुख व सहयोग नहीं मिलता है 

त्रिशमांश कुंडली :- 
त्रिशमांश कुंडली के द्वारा कष्ट व अनिष्ट का विचार किया जाता है 
यह विषम रशोयो में प्रथम 0 से 5 डिग्री मंगल में तथा दूसरा 0 से 5 डिग्री शनि के तीसरा आठ अंश धनु राशी गुरु का चौथा सात अंश मिथुन राशी के बुध का पांचवा पांच अंश तुला राशी के शुक्र का होता है 
सम राशियों में प्रथम पांच अंश वृष राशी के शुक्र का दूसरा सात अंश कन्या राशी के बुध का तीसरे आठ अंश मीन राशी केचौथे पांच अंश मकर राशी के पांचवा पांच अंश वृश्चिक राशी के होता है 

1.त्रिश्मंश कुंडली में अनिष्ट घटनाओ का विचार करते समय यह अवश्य ध्यान रखे की यह घटनाए तभी घटित होंगी जब महादशा योगनी दशा व गोचर में इन ग्रहों में घटनाओ का संचरण होगा 
2.त्रिश्मंश कुंडली का लग्नेश यदि केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक के जीवन में शुभ घटनाए ज्यादा व अशुभ घटनाए कम होती है 
3.परन्तु यदि त्रिक भाव 6 8 12 वे भाव में लग्नेश आ जाए या पाप ग्रहों से युत या द्रष्ट हो तो जातक के जीवन अंत गृह अनुकूल वस्तु विशेष के संपर्क में आने से होता है 
4.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश सूर्य हो तो ऊँचे स्थान से गिरकर म्रत्यु को प्राप्त होता है
5.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि चन्द्रमा हो तो जल में डूबकर या जलोधर सम्बंधित बीमारीसे म्रत्युहोती है जलोधेर बीमारी में कैथे की चटनी काफी फायदा करती है 
6.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि मंगल हो तो श्ष्ट्र से या शैल्य क्रिया के दारा मृत्यु होती है
7.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेशयदि शनि हो तो वाहन से मृत्यु का विचार किया जाता है 
8.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि गुरु हो तो वायु सम्बन्धी रोग जैसे पथरी किडनी गैस फैट आदि से सम्बंधित रोग से मृत्यु का विचार किया जाता है 

10.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि शुक्र हो तो विलाशिता से या फिर शुगर की बीमारी से मृत्यु होती है 
11.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि बुध हो तो व्यापर मेर घाटे से या व्यापारिक धोखेसे 
12.त्रिश्मांश कुंडली का लग्नेश यदि राहु केतु हो तो विष से या विष युक्त जानवरों के काटने सेऔर आत्म हत्या के द्वारा मृत्यु का विचार किया जाता है 
13.त्रिश्मांश कुंडली के षष्टेश के अनुसार जातक को रोग उत्पन्न होते है
14.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि सूर्य है है तेज़ ज्वर नेत्र रोग आधा शिशिर पीड़ा पीलिया ह्रदय रोग आदि 
15.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि चन्द्रमा है तो काफ शीत मानसिक रोग यूरिन सम्बन्धी रोग
16.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि मंगल है तो रक्त विकार रक्त चाप और फोड़े फुंसी 
17.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि बुध है तो त्वचा सम्नाधि रोग छोटी आंत के रोग श्वास रोग और बैक बोन से सम्बंधित रोग होते है 
18.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि गुरु हो तो आलस्य संन्पात कर्ण दोष लीवर आदि के रोग 
19.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि शुक्र हो तो गुप्तांग के रोग प्रजनन सम्बन्धी रोग शुगर व कलंक भी लगता है 
20.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि शनि हो तो वात विकार आस्थि भंग लक्वा शत्रु से पीड़ा विवाद व जेल यात्रा 
21.त्रिश्मांश कुंडली में षष्टेश यदि राहु केतु हो तो डिप्रेशन 
22.राहु केतु यदि लग्न में हो तो कैंसर से म्रत्यु का विचार किया जाता है 

सप्तमांश वर्ग Saptansh varga


सप्तमांश वर्ग  Saptansh varga 

D7 in Astrology

जन्म कुण्डली के पंचम भाव से संतान के बारे में पूर्ण रुप से विवेचन किया जाता है. इसी पंचम भाव के सूक्ष्म अध्ययन के लिए वैदिक ज्योतिष में सप्तांश कुण्डली का आंकलन किया जाता है. जन्म कुण्डली का पंचम भाव 30 अंश का होता है. इस 30 अंश को सात बराबर भागों में बाँटकर सप्ताँश कुण्डली बनाई जाती है.
सप्तांश कुण्डली से संतान पक्ष के बारे में विचार किया जाता है. इस कुण्डली से संतान का अच्छा बुरा सभी कुछ प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देता है. इस कुण्डली के सभी सात भागों का फलित भिन्न-भिन्न होता है.
सप्तमांश मे राशि 30 अंश के सात भाग किये जाते है।
 प्रत्येक भाग 4 अंश 17 कला 8 विकला का होता है। 
सप्तमांश में विषम राशियो की गणना उसी राशि से और सम राशियो मे उससे सातवी राशि से करते है।


सप्तांश फल विचार :
संतान सुख ज्ञानार्थ सप्तांश कुंडली का परिशीलन नितांत आवश्यक है। 
यदि सप्तांश लग्न विषम हो और उसमे शुभ ग्रह स्थित हो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो, तो पुत्र सुख होता है। यदि सप्तांश लग्न सम हो, तो कन्या होती है। यदि सप्तांश लग्न पाप ग्रह युत या दृष्ट हो, तो संतान सुख नही होता है।
सप्तांश  लग्न का स्वामी जन्म कुण्डली मे जिस राशि मे हो उस राशि अंक की संख्या के समान संतान (पुत्र, पुत्री) होती है।
सप्तमांश लग्न मे पंचम स्थान शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो, तो पुत्र सुख होता है अन्यथा अभाव होता है।
सप्तांश लग्नेश पुरुष ग्रह सू, मं, गु, हो, तो विशेषतया पुत्र सुख होता है। यदि सप्तांश लग्नेश स्त्री ग्रह चं, शु हो, तो कन्या का सुख होता है।
सप्तांश का स्वामी (सप्तांशेश) अस्त हो और जन्म कुंडली मे अशुभ युक्त होकर लग्न मे हो, तो गर्भ का अभाव होता है। सप्तांशेश नीच का हो, तो संतान दुर्बल, अल्पायु, कुस्वभावी होती है। सप्तांशेश शत्रुगृही हो, तो सुपुत्रो की हानि होती रहे और कुपुत्रो का लाभ होता रहे।

ग्रहफल विचार :
यदि सप्तांश का स्वामी सूर्य के साथ हो, तो संतान नेत्र रोगी होती है। यदि सप्तांशेश  गुरु या शुक्र के साथ हो, तो पुत्र भाग्यवान, दीर्घायु होता है। 
यदि सप्तांशेश बुध हो, तो कन्याए अधिक होती है। यदि सप्तांशेश पाप ग्रह हो या जन्म कुण्डली मे पापग्रह की राशि मे हो, तो जातक की संतान नीचकर्मी, अल्पायु होती है। 
यदि सप्तांशेश (सप्तांश का स्वामी) जन्म कुण्डली मे ग्यारहवे या  बारहवे हो, तो जातक को मस्तिष्क, कमर, पैर मे वायु जनित पीड़ा होती है।
यदि उपरोक्त स्थिति मे पापग्रह का योग हो, तो जातक दुष्ट हृदय वाला होता है। शुभग्रह हो, तो जातक सुविचारी, सहृदयी होता है। 
यदि सप्तांशेश जन्म कुण्डली मे शुभग्रह से युत या दृष्ट, शुभग्रह की राशि मे या उच्चस्थ या मित्रगृही हो, तो संतान सन्मार्ग पर चलने वाली, रूपगुण युक्त, सुशील होती है। 
यदि सप्तांशेश जन्मांग मे सप्तांश लग्न से सातवे या आठवे पापयुक्त या पापदृष्ट या अस्त  हो, तो जातक की संतति अल्पायु और दुर्बल होती है। 
यदि सप्तांशेश पापग्रह हो और जन्मांग मे भी वह पापग्रह हो, तो जातक को संतान की कुछ-कुछ चिंता बनी रहती है।  संतान सुख नही रहता है। 

सप्तांश लग्नेश फल :
• सूर्य के सप्तांश मे जातक शूर, शक्तिशाली, सभ्य, उत्तम, व्यवहारी, प्रसिद्ध होता है। 
• चंद्र के सप्तांश मे जातक पवित्र, धार्मिक, विनयशील, भोगी, रतिप्रिय, बुद्धिमान होता है। 
• मंगल के सप्तांश मे जातक असहनशील, स्वाभिमानी, साहसी, शक्तिशाली होता है।
• बुध के सप्तांश मे जातक कवि, कोमल, शिल्प कला का ज्ञाता, विद्वान, बोलने मे निपुण होता है। 
• गुरु के सप्तांश मे जातक पण्डित, स्थिर, साहसी, विद्वान, बुद्धिमान, ज्ञानियो मे श्रेष्ट होता है।
• शुक्र के सप्तांश मे जातक इन्द्रिय तुष्टी, कामी, विलासी, रति-हास्य-गायन-नृत्य मे रत रहता है। 
• शनि के सप्तांश मे जातक मूर्ख, आलसी, दुष्ट, भ्रष्ट, टेडी मति वाला, विकर्मी, पापी होता है। 
इन ग्रहो के उच्च अथवा नीच, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री होने पर उस अनुसार फल होते है।

राशियो  के  पृथक-पृथक  सप्तांश  फलादेश 
नॉट :- निम्नांकित  फलादेश  मे  सप्तमांश  मे  ग्रह, लग्न, चन्द्रमा  द्वारा  जातक  की  आकृति  एवं  लक्षण  का  विस्तृत  वर्णन  है।  यह यवनाचार्य  मत  अनुसार  है। 
मेष :
मेष के प्रथम सप्तांश मे जातक कृश देह, छोटे मुख व सिर वाला, लाल नेत्र, चोर, क्रूर, लड़ाई-झगडे मे जख्मी या मृत्य को प्राप्त होता है।
मेष के द्वितीय सप्तांश मे जातक चौड़े भाल, गाल, मुख वाला, अच्छी हसली वाला, सुन्दर नेत्र व ग्रीवा, चौड़े मोटे  झुके कंधे, कृश जोड़ो वाला होता है। 
मेष के तृतीय सप्तांश मे जातक  नम्र, शूरवीर, लेखक, कामी, स्त्रियो मे रुचिवान, पापी, भ्रमण प्रिय होता है। 
मेष के चतुर्थ सप्तांश मे जातक विशाल नेत्र, कपोल और उदर वाला, गौर हस्त, अध्यापन या प्रवचन या कथा करने वाला, स्नान-सुगंध से आनंदित, वस्त्राभूषण प्रिय होता है।
मेष के पंचम सप्तांश मे जातक ताम्र लाल कांति वाला, साहसी, घनी भौंहे, बड़ी भुजा, चौड़ा सिर व ललाट वाला, सुन्दर नाक और लाल मादक नेत्र वाला, शूरवीर होता है। 
मेष के षष्ठ सप्तांश मे जातक विशाल शरीर और नेत्र वाला, गौरवर्ण, सुन्दर, लम्बा कद वाला, बुद्धिमान, धनवान, मधुर भाषी. ज्ञानी, विद्या मे श्रेष्ट होता है। 
मेष के सप्तम सप्तांश मे जातक चौड़ा, लम्बा, श्यामवर्णी, कठोर शाग्र (नख) छितरे दांत, बिखरे बाल वाला, कलह प्रिय, निष्ठुर, कटु बोलने वाला होता है। 

वृषभ :
वृषभ के पहले सप्तमांश मे जातक चौड़ा माथा, गाल, सीना वाला, पुष्ट स्कंध, छोटी भुजा, श्यामवर्णी, एकदम छोटे बाल या गंजे जैसा, विशाल नेत्र वाला होता है।
वृषभ के दूसरे  सप्तमांश मे जातक कोमल देह, सुन्दर कांति, मधुर वाणी, सुन्दर नेत्र, कामी, वासना युक्त, ज्ञान विज्ञान और कला मे रत होता है।
वृषभ के तीसरे सप्तमांश मे जातक बुद्धिमान, पीत गौर वर्ण, मृग नेत्र, सुभग, रतिप्रिय, दानी, कोमल शरीर, कम बाल वाला, प्रभावशाली होता है।
वृषभ के चौथे सप्तमांश मे जातक ऊँचा मुख, गाल, नाक वाला, धनवान, सुन्दर नेत्र, शेखी बघारने वाला, गौर वर्ण, लाल नख, बगुले या गधे के समान कमर वाला होता है।
वृषभ के पांचवे सप्तमांश मे जातक लाल भूरे नेत्र वाला, सुकुमार, तीक्ष्ण बोलने वाला, स्वतंत्र रहने वाला, पर धन लोभी, रोगी, गायक होता है।  स्त्री की मृत्यु या वियोग हो सकता है।
वृषभ के छठे सप्तमांश मे जातक लम्बा कद, बड़े कान, चौड़ा शरीर, श्याम उन्नत नेत्र, कार्यकुशल, विपत्तियो मे धैर्यवान, कर्मठ होता है।
वृषभ के सातवे  सप्तमांश मे जातक आकर्षक, गोल मुख वाला, श्वेत मुखर नेत्र, श्याम कृश शरीर, शूरवीर, क्रोधी, लोभी, वक्ता, चंचल, अल्पसाहसी, भ्रमणशील होता है।

मिथुन :
मिथुन के प्रथम सप्तांश मे जातक ज्ञानी, कवि, अधिक बोलने वाला, श्यामवर्णी, पवित्र, विलासी, प्रसिद्ध, नृत्य-संगीत व ललित कला प्रेमी, सुविख्यात होता है। 
मिथुन के द्वितीय सप्तांश मे जातक धनवान, अधिक गौर वर्ण, दूरदृष्टि, बुद्धिमान, आलसी, मृदु स्वभाव वाला, संगीत व धर्म मे रत होता है। 
मिथुन के तृतीय सप्तांश मे जातक दूरदृष्टि, ताम्र व विदीर्ण आभा वाला, बड़ी दाड़ी, शूरवीर, उदार कर्मी, हरण करने वाला, विनोदी स्वभाव का होता है। 
मिथुन के चतुर्थ सप्तांश मे जातक सुगठित शरीर, सुन्दर नेत्र, श्याम वर्ण, व्यापार के प्रयोग मे निपुण, सुभग, अल्पभाषी, लेन-देन कुशल व्यापारी होता है। 
मिथुन के पंचम  सप्तांश मे जातक लाल गुलाबी अधर, नख, नेत्र वाला, साहसी, कृश, विभक्त भुजाओ वाला, रति चौर्य (बलात्कारी) कुटिल कर्म करने वाला, वाचाल, कामुक होता है। 
मिथुन के षष्ठ सप्तांश मे जातक अधिक चौड़े और गौरे शरीर वाला, सुन्दर आँख नाक कान वाला, शास्त्र काव्य धर्म मे रत, कोमल, विशेष बुद्धि वाला, सबका प्रिय होता है। 
मिथुन के सप्तम सप्तांश मे जातक स्त्रियो से मान सम्मान पाने वाला, कथा कहानी मे रत, जुआरी, अल्प साहसी, चंचल, समानुपाती व कोमल अंग वाला होता है। 

कर्क :
कर्क के प्रथम सप्तमांश मे जातक विशाल वक्ष, श्याम वर्ण, सुशिक्षित, सुआचरणी, चौड़ा पेडू व नेत्र, कठोर केश और लम्बी भुजा वाला होता है। 
कर्क के द्वितीय सप्तमांश मे जातक मोटे होंठ, भरे कपोल, मोटा व छोटा कण्ठ, ताम्र कान्ति, कृश, लम्बा, मजाकी स्वभाव, पीले नेत्र वला होता है। 
कर्क के तृतीय सप्तमांश मे जातक विद्वान्, चौड़े शरीर वाला, सुन्दर नेत्र, निपुण कवि, संगीतज्ञ, कोमल और सुकुमार होता है। 
कर्क के चतुर्थ  सप्तमांश मे जातक दूरदर्शी, कोमल, सुन्दर बड़े नेत्र, महीन केश, सुन्दर नाक वाला, गीतकार, लम्बी भुजा वाला होता है। 
कर्क के पञ्चम सप्तमांश मे जातक ताम्रवर्ण, सुन्दर कपोल, ऊँची तीखी नाक, लम्बी गर्दन वाला, कृश देह, पीत नेत्र, शूरवीर, पर स्त्री का इच्छुक होता है। 
कर्क के षष्ठ सप्तमांश मे जातक लम्बा, सुन्दर नेत्र व नाक, बड़े कान, गौरवर्णी, जन सम्मानित, बुद्धिवाला, बाते व कार्य हितकारी करने वाला, यशस्वी होता है। 
कर्क के सप्तम सप्तमांश मे जातक कर्कश वाणी वाला, रूखे शुष्क केश, लम्बा, कृश, श्याम देह, दुर्जन, भ्रमण शील, तीक्ष्ण नेत्र, तीव्र दृष्टि, ऊँची नाक वाला होता है। 

सिंह :
सिंह के पहले सप्तांश मे जातक लाल नेत्र, लम्बा, साहसी, चतुर, चौड़ी नाक, मजबूत हड्डी वाला, लम्बे एवं धने रोम वाला, चुस्त, फुर्तीला होता है। 
सिंह के दूसरे सप्तांश मे जातक भाग्यशाली, सुन्दर आंख, तीखी नाक, लम्बा, वक्ता, अर्थशास्त्री, स्त्रियो का सम्मानी, राजनीतिज्ञ होता है। 
सिंह के तीसरे सप्तांश मे जातक  लम्बा चौड़ा शरीर, चौड़ा भाल व सिर, दीर्घ सुन्दर नेत्र, धन संचय करने वाला, धैर्यवान, साहसी, संपन्न होता है। 
सिंह के चौथे सप्तांश मे जातक लड़ाई-झगड़ा करने वाला, दुराचारी, साहसी, केकड़े के सामान आंखे व दृष्टि वाला, मध्यम कद, रक्त वर्णी होता है। 
सिंह के पांचवे सप्तांश मे जातक आत्मविश्वासी, उत्साही, स्थिर, यश मान सम्मान युक्त, सुनयनी, गेहुंआ रंग, चौड़े सिर वाला होता है।  
सिंह के छठे सप्तांश मे जातक शिशिर (ठण्डा) स्थूल देह वाला, छोटे नेत्र, अत्यधिक भ्रमणशील, सन्यास मे निहित, सुन्दर नाक वाला होता है। 
सिंह के सातवे सप्तांश मे जातक कोमल ऊँचे गोल अंग वाला, बुद्धिमान, छोटी नाक, अल्प भाषी, सुवेशी, संकोचशील, गीत संगीत और स्त्री मे रत होता है।

कन्या :
कन्या के प्रथम सप्तमांश मे जातक प्रभावशाली वाग्मी, बुद्धिमान, विनीत, स्थूल देह, श्याम मुखर नेत्र, शांत, पतली कमर, साधारण नाक वाला होता है। 
 कन्या के द्वितीय सप्तमांश मे जातक मोटी जांघे कंधे वाला, मृदुभाषी, कोमल, पूर्ण मुखी, सुकुमार, स्त्रियो मे आसक्त होता है। 
कन्या के तृतीय सप्तमांश मे जातक अभिमानी, छली, मिथ्यावादी (झूठा) रक्तवर्णी, लालनेत्र, चंचल, पतले रोम, अल्प चित्त वाला, ऊँचा मुख, कपटी या चोर होता है। 
कन्या के चतुर्थ सप्तमांश मे जातक शिल्पज्ञ, वेद के अनुसार कार्य करने वाला, बड़ा सिर, नेत्र और दाढ़ी, बुद्धिमान, दानी धनाढ्य, कुशल वार्ताकार होता है। 
कन्या के पंचम सप्तमांश मे जातक भीरु, हतोत्साहित, बोलने में डरपोक, क्रोधी, बडी ठोड़ी, लम्बा मुंह व सिर, श्याम शरीर, मृग सामान नेत्र, आकर्षक होता है। 
कन्या के षष्ठ सप्तमांश मे जातक पूर्ण ऐश्वर्यवान, दृढ़, मानी, धनी, धार्मिक, श्याम नेत्र, टेडी नाक, चौड़ी धनी भोंहे वाला, स्थिर मति, परम्परावादी होता है। 
कन्या के सप्तम सप्तमांश मे जातक मध्यम कद, सुनहरे केश, बड़े नेत्र, स्थूल अधर कपोल दांत गर्दन वाला, उग्र स्वभाव वाला, क्रोधी, तामसी होता है।  

तुला :
तुला के पहले सप्तांश मे जातक कमल समान नेत्र, ऊँची नाक, तरुण अंग, स्वादिष्ट पकवान का इच्छुक, सुदृष्टि, सुन्दर शरीर, विद्वान्, धनार्जनी, सेवा करने वाला होता है। 
तुला के दूसरे सप्तांश मे जातक कृषि, बागवानी, भूसम्पदा मे रत, गोल चेहरा, ऊँची नाक दीर्घ अधर, हिंसक, लालश्याम वर्णी, पर्यटन प्रेमी होता है। 
तुला के तीसरे सप्तांश मे जातक धर्मशास्त्र व अर्थशास्त्र रचयिता, ऊँची नाक व सिर, छोटा मुख व नेत्र, शिरा बहुल, (उभरी नस व नाडी) वाला होता है। 
तुला के चौथे सप्तांश मे जातक  श्याम वर्णी, भारी आवाज वाला, लम्बा रुक्ष या कर्कश चेहरा, मोटे अधर, लंबी गर्दन, चौड़ा वक्ष, टेड़े स्वभाव वाला, ठगने के कर्म करने वाला, टेड़े नख वाला होता है। 
तुला के पांचवे सप्तांश मे जातक धवल मुख, श्याम नेत्र, सुन्दर शरीर, धार्मिक व कला कार्य में निपुण, श्रेष्ठ सज्जनो की सेवा मे  होता है। 
तुला के  छठे सप्तांश मे जातक टेडी भोंहे वाला, सुन्दर नेत्र, सम सुगठित शरीर, कला व अच्छा बोलने मे निपुण, सुन्दर मुख, पेट, नाक वाला, प्रतिभाशाली होता है। 
तुला के सांतवे सप्तांश मे जातक स्थूल होंठ, स्थिर, कोमल भूरे केश, लाल नेत्र, शूरवीर, सोलह वर्ष की उम्र से कम या कोमलांगनी से प्रेम करने वाला होता है। 

 वृश्चिक :
वृश्चिक के प्रथम सप्तांश मे जातक लाल भूरे नेत्र वाला, धने भूरे केश, ऊँचा, असत्य वक्ता, यज्ञ मे रत, चंचल देह वाला, फुर्तीला, प्रगतिशील, योजनाबद्ध होता है। 
वृश्चिक के द्वितीय सप्तांश मे जातक जातक बड़े नेत्र और  भोंहे ला, अल्प रोम, सुन्दर नाक वाला, कोमल पीली कांति, ज्ञान-विज्ञान व शास्त्र-विधि का ज्ञाता, कलाविद होता है। 
वृश्चिक के तृतीय सप्तांश मे जातक बोलने मे निपुण, जीवन का प्रथम भाग (निरुद्ध पूर्वार्द्ध) अविकसित, वृद्ध काया, घृणित, विकृत शरीर होता है। 
वृश्चिक के चतुर्थ सप्तांश मे जातक चौड़े गाल, बड़ी नाक, बड़ा पेट, धुंधराले केश, क्रोधी, अभिमानी, हठी, स्वयम  के अहित मे बोलने वाला, लम्बी भुजाओ वाला होता है। 
वृश्चिक के पंचम सप्तांश मे जातक पतला पेट, चौड़ा वक्ष, वक्ता, जुआरी, सुन्दर मुख व भुजा, पर सेवा युक्त, अल्प निपुण (कार्य क्षमता, दक्षता) होता है। 
वृश्चिक के षष्ठ सप्तांश मे जातक नीलकमल के समान नेत्र वाला, बुद्धिमान, ऊँचा शरीर, ऊँची नाक, अंतर्मुखी, कोमल, सुकोमल पत्नी वाला, साहसी होता है। 
वृश्चिक के सप्तम सप्तांश मे जातक कलह वैर विरोध का इच्छुक, लंबी नाक, चौड़ा सिर और जांघ वाला, भूरे रोम और नेत्र, प्रसिद्ध, स्थिर, धैर्यवान, साहसी होता है। 

धनु :
धनु के प्रथम सप्तांश मे जातक मोटे चौड़े गाल व नाक वाला, चौड़ा पेट, व नेत्र, मादक नेत्र, ऊँचा सिर, स्थूल पैर वाला, सतगुणी, उज्जवल पक्ष से चर्चा रत होता है। 
धनु के द्वितीय सप्तांश मे जातक मृग नेत्र, गोल जांघे, पर धन हर्ता, विशेष रहस्य को जानने वाला, लम्बे हाथ, चौड़े नाक, कान वाला होता है।
धनु के तृतीय सप्तांश मे जातक क्रोधी, वक्ता, त्यागी, कृश सुगठित देह, स्त्री से कलह व ईर्ष्या, लाल नेत्र, ठिगना, मोर के समान आवाज वाला होता है। 
धनु के चतुर्थ सप्तांश मे जातक  ऊँचे कंधे, सुन्दर नाक, स्थूल देह, स्थूल व छोटी दाढ़ी, मृग नेत्र, वानर के समान स्वभाव वाला, गीत प्रिय होता है।
धनु के पंचम सप्तांश मे जातक विषम और चौड़े शरीर वाला, सुन्दर नाक और नेत्र वाला, दृढ़ निश्चयी, काव्य आदि कलाओ का ज्ञाता होता है। 
धनु के षष्ठ सप्तांश मे जातक तपस्वी, सुन्दर, मृदुभाषी, सुकर्मी, चौड़े मुख व नेत्र वाला, गुणवान, मृगाल के समान गौरवर्ण, प्रारम्भ से स्वरक्षक या भरण-पोषण करने वाला होता है। 
धनु के सप्तम सप्तांश मे जातक के दीर्घ होंठ, नाक, नेत्र, सुन्दर, सत्यवक्ता, सन्यासी के समान शरीर, शूरवीर, त्यागी, बड़े ललाट और कान वाला होता है। 

मकर : 
मकर के प्रथम सप्तांश मे जातक लघु वंशी, छोटी नाक, लम्बा, यशस्वी, श्याम वर्णी, काळा वस्त्र पहिनने वाला, भीरु, टेड़े स्वभाव वाला  होता है।
मकर के द्वितीय सप्तांश मे जातक गौरवर्ण, विशाल शरीर, सुन्दर मुख, धनवान, मदमाती क्रिया वाला, निपुण, चंचल, संघर्ष प्रिय होता है।
मकर के तृतीय सप्तांश मे जातक कृश देह, रक्त वर्ण, उग्र, अहंकारी, साहसी, पर स्त्री प्रेमी, मादक चेष्टा वाला, विषम स्वभाव और सुन्दर होता है।
मकर के चतुर्थ सप्तांश मे जातक प्रसन्नचित्त, मृदुभाषी, बुद्धिमान, विशाल गाल, नेत्र, मोती गर्दन, स्त्री का इच्छुक, कमल समान पेट, श्यामवर्णी होता है। 
मकर के पंचम सप्तांश मे जातक संगीत कला मे निरत अथवा सेना सेवा मे निरत, विशेष सम्मानीय, लम्बा, सांवला वर्ण, हिरण के समान गाल वाला होता है। 
मकर के षष्ठ सप्तांश मे जातक स्वर्ण कान्ति वाला, विशाल, श्रेष्ठ, लोगो मे प्रिय, कमल समान नेत्र, तपस्वी, वेदो का ज्ञाता, कोमल होता है। 
मकर के सप्तम सप्तांश मे जातक वृद्ध जांघे व शरीर वाला, संतानहीन, साहसी, लाल नेत्र, अभिमानी, चौड़ा नाक, कंठ, भोंहे व दांत वाला होता है। 

कुम्भ :
कुम्भ के पहले सप्तांश मे जातक दुष्ट, दुर्बल देह, भेंगी आंख वाला, बड़े सिर वाला, शुक (तोता) जैसी नाक वाला, धृणित कार्य करने वाला, निंदनीय होता है। 
कुम्भ के दूसरे सप्तांश मे जातक पके चमकदार बाल वाला, अधिक या अल्प बोलने वाला, विदीर्ण आँख या नाक वाला, प्यासा, मनस्वी, एकांत प्रिय होता है। 
कुम्भ के तीसरे सप्तांश मे जातक बिल्ली के समान नेत्र वाला, चंचल मन, ताम्र वर्ण, मध्यम कद, भेद लेने वाला, चोर, नृत्य करने वाला, भूरे केश वाला होता है।
कुम्भ के चौथे सप्तांश मे जातक मधुर अल्प भाषी, पिपासु (तृष्णी) ऊंची नाक वाला, रक्त गौर वर्ण, मृग नेत्र, नीले वस्त्र धारण करने वाला, निपुण होता है। 
कुम्भ के पांचवे सप्तांश मे जातक रूखे केश, झुके अंग, मिश्रित वर्ण वाला, सुन्दर मुख और नेत्र, प्रवास मे रुचिवान, शराब सेवन मे रुचिवान होता है।
कुम्भ के छठे सप्तांश मे जातक गौर वर्ण, निर्मल छवि वाला, विशाल नेत्र, सुन्दर मुख, व्रत व देव पूजा मे रत, अल्पभाषी, अंतर्मुखी होता है। 
कुम्भ के सातवे सप्तांश मे जातक लम्बा, ताम्र नेत्र व शरीर, प्रसिद्ध, पराक्रमी, सत्यवादी, चौड़ी नाक व होंठ वाला, ऊँचा बोलने वाला भूरे केश वाला होता है। 

मीन :
मीन के पहले सप्तांश मे जातक स्वाभाविक नेत्र, सुन्दर नाक व दांत, कमल समान कान्ति वाला, सुमति वाला, स्वतंत्र रहने वाला होता है। 
मीनके दूसरे सप्तांश मे जातक ललाई युक्त श्वेत वर्णी, अल्प रोम, छोटा मुख, कमल सदृश्य हस्त, शूरवीर शत्रु संहारक, बलवान, साहसी होता है। 
मीन के तीसरे सप्तांश मे जातक सुडोल देह, चौड़ा सुन्दर मुख, विशाल अंगो वाला, गीत जानने वाला, विनम्र, सुन्दर नाक, केश, भोंहे वाला होता है। 
मीन के चौथे सप्तांश मे जातक मंत्री या सलाहकार, निश्चित अर्थ को जानने वाला, सम्पूर्ण, मृदुभाषी, पलाश के पत्तो जैसे विभक्त अंग वाला होता है। 
मीन के पांचवे सप्तांश मे जातक गौर वर्णी, मांसल मुख, कमल समान कोमल नेत्र. पवित्र, निपुण, परामर्शदाता या मंत्री, शांत होता है। 
मीन के छठे सप्तांश मे जातक धर्म मे निपुण, गौर वर्ण, गोल मुख, चौड़े सुन्दर कंधे, सुन्दर दांत , मछली के समान नेत्र वाला होता है। 
मीन के सातवे सप्तांश मे जातक मलिन, भग्न यानि टेडी नाक वाला, टेड़ा स्वभाव, ख़राब वेश धारण करने वाला, दुष्ट मन, कुटिल आलसी होता है। 

पहला सप्तांश (क्षार) ) 0 डिग्री से 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक | First Saptansh (Kshar) From 0 degree to 4 degrees 17 minutes and 8 seconds

प्रथम सप्तांश 0 से लेकर 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक होता है. पहले सप्तांश को क्षार भी कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षार सप्तांश में हो तो इस सप्तांश को मिलेजुले परिणाम देने वाला माना गया है. पंचम भाव क्षार होने पर संतान माता पिता के लिए कष्ट प्रदान करने वाली हो सकती है .ऎसा होने पर  माता पिता को संतान पक्ष की ओर से अपमान या अपयश भी प्राप्त हो सकता है.

दूसरा सप्तांश (क्षीर) 4 डिग्री अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक | Second Saptansh (Kshir) From 4 degrees 17 minutes and 8 seconds to 8 degrees 34 minutes and 17 seconds

दूसरा सप्तांश 4 अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक होता है. दूसरे सप्तांश को क्षीर नाम से जाना जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षीर सप्तांश में हो तो संतान माता पिता की सेवा करने वाली हो सकती है. बच्चे माता पिता की वृद्धावस्था में सहायता करने वाले होते हैं. बुढापे में जब माता पिता को संतान की सेवा की अत्यधिक आवश्यकता होती है तब यदि संतान पूर्ण निष्ठा भाव से सेवा करती है तो यह माता पिता के लिए बहुत ही सुखदायक स्थिति होती है.

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड | Third Saptansh (Dadhi) From 8 degrees 34 minutes and 17 seconds to 12 degrees 51 minutes and 25 seconds

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड तक का होता है. तीसरा सप्तांश दधि कलहाता है. पंचम भाव या पंचमेश दधि में पडे़ तो संतान सुंदर और रुपवान होती है. अच्छे गुणों से युक्त हो कर्त्तव्य परायण एवं कोमल गुण वाली हो सकती है. संतान द्वारा अभिभावक को सुख और सम्मान की प्राप्ति होती है. व्यक्ति संतान के सुख को भोगता है.

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड | Fourth Saptansh (Aajya) From 12 degrees 51 minutes and 25 seconds to 17 degrees 8 minutes and 34 seconds

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड तक का होता है. चतुर्थ सप्तांश को आज्य कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश आज्य भाव में होने से संतान श्रेष्ठ गुणों से युक्त हो सकती है तथा माता पिता को भरपूर सूख देने वाली कही गई है. ऎसी संतान से माता पिता को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की प्राप्ति कराने में सक्षम हो सकती है.

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड | Fifth Saptansh (Ikshuras) From 17 degrees 8 minutes and 34 seconds to 21 degrees 25 minutes and 42 seconds

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड तक का होता है. पंचम सप्तांश को इक्षुरस भी कहते हैं. पंचम भाव या पंचमेश यदि इक्षुरस में हो तो संतान बौद्धिक क्षमता वाली एवं शिक्षा में तेज होती है. संतान पक्ष की ओर से माता पिता को कोई कष्ट प्राप्त नहीं होता. ऎसी संतान कुटुम्ब को साथ लेकर चलने वाली हो सकती है तथा परिवार में संतुलन एवं शांति बनाए रखने का प्रयास करती है.

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड | Sixth Saptansh (Madya) From 21 degrees 25 minutes and 42 seconds to 25 degrees 42 minutes and 51 seconds

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. छठा सप्तांश 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. यह सप्तांश मद्य के नाम से भी जाना जाता है. पंचम भाव या पंचमेश का संबंध जब मद्य सप्तांश से होता है तब माता पिता को संतान की ओर से कष्ट प्राप्त हो सकते हैं. षष्ठेश से संबंध बनने पर संतान में नशीले पदार्थों का सेवन करने की प्रवृत्ति हो सकती है. बच्चे की यह बुरी आदत माता पिता के लिए कष्टकारक होती है.

सातवां सप्तांश (शुद्ध जल) 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक | Seventh Saptansh (Shuddh Jal) From 25 degrees 42 minutes and 51 seconds to 30 degrees

सातवां सप्तांश 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक होता है. यह सप्तांश शुद्ध जल कहलाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश सातवें सप्तांश में आता है तो संतान शुभ फलों को प्रदान करने वाली हो सकती है. संतान की ओर से माता पिता का हृदय सदा प्रसन्नचित रहता है. ऎसी संतान माता पिता के सभी आदेशों का पालन करने वाली और उनकी सेवा करने वाली होती है.

अन्यत्र सप्तमांश विचार :-  सप्तमांश से केवल संतान का विचार करना चाहिये।
सप्तमांश लग्न का पुरुष ग्रह हो, तो जातक को पुत्र उत्पन्न होते है। सप्तमांश लग्न का स्वामी स्त्री ग्रह हो, तो कन्याए अधिक उत्पन्न होती है। यदि सप्तमांश लग्न का स्वामी पापग्रह हो, पापराशि मे हो, पापग्रह के साथ हो, तो संतान नीच कर्म करने वाली होती है। 
सप्तांश लग्न का स्वामी स्वराशि शुभग्रह से युत या दृष्ट हो या शुभग्रह की राशि में स्थित हो, तो संतान अच्छे आचरण करने वाली, सुन्दर, सुशील गुणी होती है। सप्तमांश लग्न से छठे, आठवे स्थान मे पापग्रह हो या पापग्रह से युत या दृष्ट हो, तो जातक संतानहीन होता है।

मानसागरी अनुसार फलादेश -
सप्तांश का स्वामी चन्द्रमा से युत या दृष्ट या शुभग्रह से दृष्ट हो, तो जातक के सहोदर भाई बहन होते है। जातक उग्र कांति, यश, मित्र, प्रगल्भता से युत होता है। सप्तांश मे सूर्य को छोड़कर जितने ग्रह नीच मे स्थित हो और जो बली हो उस अनुसार भ्राता की चिंता हो। सप्तमांश में ग्रह उच्च का हो या शुभग्रह की राशि मे हो, तो जातक राज्य पूज्य, कार्य में सफल, धन संपन्न होता है। 
सप्तमांश लग्न के अंतिम अंश जो ग्रह हो और वह यदि उच्च या स्वराशि का हो, तो जातक धोडो की सवारी मे कुशल, शुर व बंधुओ से त्यक्त होता है। सप्तमांश लग्न का स्वामी यदि उच्च का हो, तो जातक महाधनी और यदि नीच का हो, तो दरिद्री होता है। 
सप्तमांश के तृतीय स्थान मे सूर्य, मंगल, गुरु हो, तो जातक सत्यवादिनी वरदायिनी लक्ष्मी भोगने वाला तथा पिता की मृत्यु पश्चात पुत्र का जन्म होता है। सप्तांश के तृतीय स्थान में चंद्र, बुध, शुक्र हो, तो पिता की मृत्यु पश्चात कन्या का जन्म होता है।

पराशर अनुसार सप्तमांश फलादेश 
महर्षि पराशर ने सप्तमांश के अधिपतियो का नामकरण कर संतान फलादेश मे सरलता और सुगमता उत्पन्न की है। सप्तांश मे विषम राशि के भाग अनुसार क्रमशः 1 क्षार, 2 क्षीर, 3 दधि, 4 आज्य, 5 इक्षु, 6 मद्य, 7 जल ये स्वामी होते है। सम राशियो मे यही क्रम उल्टा जल, मद्य, इक्षु, आज्य, दधि, क्षीर, क्षार हो जाता है। 
• क्षार - विषम राशि मे यह प्रथम और सम राशि में अंतिम है। जातक को संतान सुख कम रहता है। उसकी संतान क्रोधी, कटुभाषी, व्यंग करने वाली, चिंता बढ़ने वाली, असफल, असहाय होती है। 
• क्षीर - विषम राशि मे दूसरा और सम राशि मे छठा है। जातक की संतान सुशील, सुन्दर, आज्ञाकारी, गुणवान होती है। जातक को संतान सुख रहता है।
• दधि - विषम राशि मे तीसरा और सम राशि मे पांचवा है। जातक की संतान विनम्र, स्थिर मति वाली, कोमल स्वभाव, पूर्ण अधिकार की इच्छुक, परिस्थिति अनुकूल आचरण करने वाली होती है।
• आज्य या आजम = तरल घी। विषम राशि और सम राशि मे चौथा है। जातक की संतान धार्मिक विचार और व्यवहार वाली, पवित्र मन, आदर सत्कार करने वाली, त्याग और बलदानी होती है।   
• इक्षु - विषम राशि मे पांचवा  और सम राशि मे तीसरा है। जातक की संतान मधुर भाषी, सौम्य व प्रिय स्वभाव वाली, सरल हृदयी, सुख-सुविधा देने वाली होती है। 
• मद्य - विषम राशि मे छठा  और सम राशि मे पांचवा है। जातक संतान खुश मिजाज, संतान से सुखी, जिन्दा दिल, सुख की वृद्धि करने वाली होती है। 
• जल -  विषम राशि मे सातवा और सम राशि मे पहला है। जातक की संतान सुख सुविधा धन वैभव व सम्मान की वृद्धि कर सुख देने वाली होती है। 


Drekkana द्रेष्काणवर्ग Dreshkan varga | द्रेष्काण तालिका

Drekkana  द्रेष्काणवर्ग  Dreshkan varga


द्रेष्काण विचार द्वारा जातक के भाई बहनों की प्राप्ति का पता चलाया जा सकता है उसके भाई होंगे या बहनें अधिक होंगी. किस का साथ उसे अधिक प्राप्त होगा या किस के साथ वह अधिक दूरी रखने वाला हो सकता है. इसी के साथ आर्थिक संपन्नता में वह कैसे सहायक बन सकते हैं या उनसे जातक को क्या शुभ लाभ प्राप्त हो सकते हैं इत्यादि तत्थों के समझने हेतु द्रेष्काण बहुत उपयोगी माना जाता है.

वर्ग क्या है ?  वर्ग वास्तव में गहो और लग्न का सूक्ष्म विभाजन है। यह इसलिए भी आवश्यक है की एक लग्न मे कई जातक जन्म लेते है। लेकिन हर एक का  गुण, शरीर, धन, पराक्रम, सुख, बुद्धि, भार्या, भाग्य एक सा नही होता।  अतः यही जानने के लिए वर्ग बनाये जाते है। एक राशि 30 अंशो की  है इसके सूक्ष्म विभाजन करने पर कुल सोलह वर्ग बनते है। इनके नाम इस प्रकार है :- 01 लग्न, 02 होरा, 03 द्रेष्काण, 04 चतुर्थांश, 05 सप्तमांश, 06 नवमांश, 07 दशांश,  08 द्वादशंश, 09 षोडशांश, 10 विशांश, 11 चतुर्विंशांश, 12 त्रिशांश, 13 खवेदांश, 14 अक्षवेदांश, 15 भांश, 16 षष्टयांश (1 / 60)

षट्वर्ग :   लग्न, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, त्रिशांश ये छः वर्ग होते है। 
सप्तवर्ग :  उपरोक्त षट्वर्ग मे सप्तांश जोड़ देने पर सप्तवर्ग हो जाते है। 
दसवर्ग :  उपरोक्त  सप्तवर्ग मे दशांश, षोड़शांश, षष्टयांश जोड़ देने पर दस वर्ग होते है। 

राशि (30 अंश) के तीन भाग करने पर प्रत्येक 10 अंश का होता है।
 इसे ही यानि राशि के तृतीय भाग को द्रेष्काण कहते है। 
लग्न व ग्रह की राशि के 10 अंश अर्थात  प्रथम द्रेष्काण मे द्रेष्काण उसी राशि का होता है।
 10 से 20 अंश अर्थात द्वितीय द्रेष्काण उसी राशि से पांचवी राशि का होता है।
     तृतीय द्रेष्काण 20 से 30 अंश उस राशि से नौवी राशि का द्रेष्काण होता है।

द्रेष्काण तालिका 
राशिपहला द्रेष्काण (0 से 10 अंश तक)दूसरा द्रेष्काण (10 से 20 अंशों तक)तीसरा द्रेष्काण (20 से 30 अंशों तक)
मेषमेष(मंगल)सिंह(सूर्य)धनु(गुरू)
वृषवृष(शुक्र)कन्या(बुध)मकर(शनि)
मिथुनमिथुन(बुध)तुला(शुक्र)कुम्भ(शनि)
कर्ककर्क(चंद्रमा)वृश्चिक(मंगल)मीन(गुरू)
सिंहसिंह(सूर्य)धनु(गुरू)मेष(मंगल)
कन्याकन्या(बुध)मकर(शनि)वृष(शुक्र)
तुलातुला(शुक्र)कुम्भ(शनि)मिथुन(बुध)
वृश्चिकवृश्चिक(मंगल)मीन(गुरू)कर्क(चंद्रमा)
धनुधनु(गुरू)मेष(मंगल)सिंह(सूर्य)
मकरमकर(शनि)वृष(शुक्र)कन्या(बुध)
कुम्भकुम्भ(शनि)मिथुन(बुध)तुला(शुक्र)
मीनमीन(गुरू)कर्क(चंद्रमा)वृश्चिक(मंगल)
द्रेष्काण के स्वामी देवता के गुणधर्म का विवेचन भी किया गया है। ये गुणधर्म भी किसी-किसी जातक मे पाए जाते है।  प्रथम द्रेष्काण के  नारद, द्वितीय के अगस्त्य, तृतीय के दुर्वासा है। प्रथम द्रेष्काण 00 से 10 अंश को नारद द्रेष्काण कहते है।  मुनि नारद ब्रम्हा के पुत्र विष्णु भक्त है। तीनो लोक मे सामान गति से विचरण करते है। देव-मानव-दैत्य इन्हे परम हितेषी मानते है। ये परम बुद्धिमान, वीणा वादक, हरि कीर्तन प्रेमी, भक्ति मार्ग प्रदर्शक, पर्यटनी, लीला रसिक, रहस्य द्योतक, सन्देश वाहक है।  लड़ाना-भुझाना (नारद विद्या) इनका स्वाभाव है। इनके गुणधर्म किसी-किसी जातक* मे पाए जाते है।

द्वितीय द्रेष्काण 10 से 20 अंश को अगस्त्य द्रेष्काण कहते है। मुनि अगस्त्य दृढ़ निश्चय, योग व तपोबल की मूर्ति है।  जो सज्जन की सहयता, सेवा, और दुष्टो का दमन करते है। इन्होने सारे समुद्र का जल पी लिया था।  विध्याचल को झुकाकर उसकी पीठ  पर चढ़कर दक्षिण भारत मे जा बसे थे। राम विजय के लिए आदित्य स्तोत्र की रचना की थी। इसमे जन्मा जातक दृढ़ निश्चयी, अदम्य साहसी, संतजन सहायक, दुर्जनो का दमन करने वाला, पराक्रमी होता है।

तृतीय द्रेष्काण 20 से 30 अंश को दुर्वासा कहते है।  मुनि दुर्वाशा अत्रि  व अनुसूया के पुत्र है। ये बहुधा वस्त्राभूषण और भवन से उदासीन, उत्कृष्ट तपोबली, महा क्रोधी है।  इन्हे नियम की भूल असह्य है। इनके शाप से अनेक राजाओ ने दुःख, कष्ट सहन किया है। जातक मुंहफट, मलिन वस्त्र धारी, क्रोधी, अभिमानी, अधीर, कष्ट देने वाला होता है।  ऐसे जातक नियम पालन, कर्म, कर्तव्य मे निष्णात होते है।

द्रेष्काण फल विचार
जन्म लग्न का द्रेष्काण जन्मांग मे जिस राशि मे स्थित हो उस राशि तुल्य भाई होते है। वही देष्काणेश यदि सौम्य ग्रह से युक्त हो, तो भाई चिरंजीवी होते है। वही द्रेष्काणेश पाप-अशुभ युक्त हो, तो भाई मृत्यु या कष्ट पाते है। लग्नेश की द्रेष्काणेश के साथ जैसी नैसर्गिक मित्रता हो, वैसा ही भइओ के साथ सुख, प्रमादि होता है। (लग्नेश द्रेष्काणेश की मित्रता मे भ्रात सुख, प्रेमादि ; सम मे उदासीनता ; शत्रु मे शत्रुता आदि) अर्थात द्रेष्काणेश के साथ जो ग्रह युक्त हो उनकी मित्रादिवत भ्रात सुख, प्रेमादि होता है।

 द्रेष्काणेश युक्त ग्रह पुरुष संज्ञक हो, तो भाई और स्त्री संज्ञक हो तो बहिन होती है। द्रेष्काण लग्न पुरुष सज्ञक हो, तो भाई और स्त्री संज्ञक हो, तो बहिन होती है। जन्म लग्न पुरुष सज्ञक हो और लग्नेश, द्रेष्काणेश की मित्रता हो, तो भाई व उनका सुख भी प्राप्त होता है। जन्म लग्न स्त्री संज्ञक हो और लग्नेश, द्रेष्काणेश की मित्रता हो, तो बहिन और उनका सुख भी प्राप्त होता है।

द्रेष्काणेश (द्रेष्काण का स्वामी ग्रह) छठे, आठवे हो, तो अपने ही दूर स्व शरीर का धात होता है।
स्पस्टीकरण :- द्रेष्काणेश जन्म मे अशुभ (पाप, शत्रु) ग्रह से दृष्ट या युत हो, तो ही उपरोक्त फल होता है।

विशेष फल :
द्रेष्काणेश द्रेष्काण मे जिस राशि मे हो, उस राशि के अंक समान भाई बहन की संख्या होगी। द्रेष्काणेश  जितने अशुभ ग्रह से  युत अथवा दृष्ट हो उतने ही भाई बहन का नाश होता है। द्रेष्काणेश जितने शुभ ग्रह से युत या दृष्ट  हो उतने ही भाई बहन स्वस्थ और जीवित रहते है।

द्रेष्काणेश जन्म कुण्डली मे चन्द्र के साथ शुभ ग्रह से युत हो, तो सुन्दर, सुडोल शरीर, अधिक रोम वाला होता है। चंद्र युक्त द्रेष्काणेश अशुभ ग्रह से युत हो, तो जातक कर्ण रोगी, बंधु  विरोधी, शत्रु विरोधी होता है।

द्रेष्काणेश मंगल जन्म कुंडली मे आठवे हो, तो उसका भाई वृक्ष या अन्य स्थान से गिरकर मरता है या मरण तुल्य कष्ट पाता है। द्रेष्काणेश जन्म कुण्डली मे गुरु, शनि के साथ हो, तो जातक का मरण विष से होता है। द्रेष्काणेश सूर्य, मंगल आठवे हो, तो आग व बिजली से भय होता है। द्रेष्काणेश जन्म कुंडली मे आठवे हो, तो  हाथ मे कोई चिन्ह होता है। द्रेष्काणेश जन्म कुंडली मे आठवे अशुभ ग्रह से युत हो, तो माता या स्वयं को हिक्का (हिचकी) रोग होता है। यदि शुभ ग्रह साथ हो, तो जातक अभिमानी, प्रतापी होता है। लग्न के द्रेष्काण का स्वामी छठे स्थान मे स्थित हो, तो उस भाव मे जो राशि अंक हो उतने मास मे शिशु को मृत्यु भय रहता है।

द्रेष्काण लग्न फल :
सूर्य के द्रेष्काण मे जातक मेला-कुचेला, गन्दा रहन-सहन वाला, शूरवीर, स्त्री प्रिय, क्रूर, पापी, साहसी, कुकर्म मे निपुण, मूर्ख, बुरो का पक्षधर, नष्ट होने वाला, गुरु पत्नी से व्यभिचारी, अल्प संतानि, जुंए में रत, कंजूस, दुर्जन, बकवादी, दुराचारी होता है।
अन्यत्र - तीनो द्रेष्काण का स्वामी सूर्य हो, तो जातक तेज, कलह प्रिय, दानी, शीघ्र भड़कने वाला, ब्राह्मण व देव का द्वेषी, कपटी, पाखण्ड पूर्ण होता है।

चन्द्रमा के द्रेष्काण मे जातक सुन्दर शरीर, गोल मुख, शिल्पज्ञ, बकवादी, विधुर, कभी भी नष्ट होने वाला, शास्त्र मे मंदबुद्धि, सुशील, दयालु, तेजस्वी, चंचल, धर्म और अधर्म दोनों मे रत, विदेशी कामकाज मे कुशल होता है।
अन्यत्र - चन्द्रमा के तीनो द्रेष्काण मे जातक निश्चय ही भाग्यशाली, धन संपन्न, गुरु भक्त, प्रसिद्ध, कीर्तिवान, पुत्र व मित्रो युक्त, भाई-बंधु द्वारा पूजक होता है।

मंगल के द्रेष्काण मे जातक नीच मलिन स्वभाव (गंदगी पसंद) क्रूर, धन विहीन, पापी, असहनशील, पुत्रधन से विहीन, निष्ठुर, निर्दयी, दुराचारी, क्षीण देह वाला, पेटू, क्रोधी, रोग से दुःखी, नौकर या सेवक, निर्गुणी (गुण समूह का त्यागी) होता है।
अन्यत्र - मंगल के तीनो द्रेष्काण मे जातक क्षीण शरीर, घायल या निर्बल क्रूर, मारे गये भाई व पत्नी वाला, विषयी, प्रतापहीन, पाप व व्यसन मे रत होत्ता है।

बुध के द्रेष्काण मे जातक बुद्धि कुशल, राजा से सम्मानित, दीर्घायु, बलवान, शांत, बहु पुत्र वाला, पवित्र, यशस्वी, धर्म ज्ञान मे रत, अप्रमादी, पतिव्रता का प्रिय, शास्त्रज्ञ, कुलभूषण, दानी, संतुष्टी होता है।
अन्यत्र - बुध ग्रह तीनो द्रेष्काण मे स्वामी हो, तो जातक सौम्य, रोगी, आलस्य रहित, धनवान, धन-धान्य से संपन्न होता है।

गुरु के द्रेष्काण मे जातक दीर्घायु, निरोगी, बुद्धिमान, प्रियदर्शन (सुन्दर) गुणवान, स्वतंत्र रहने वाला, शांत, मोक्ष अभिलाषी, स्व स्त्री से स्नेह पाने वाला, अन्य स्त्रियो मे निरत, धनवान होता है।
अन्यत्र - तीनो द्रेष्काण का स्वामी गुरु होने पर जातक तेजस्वी, सर्व सुख सम्पन्न , धार्मिक, वैभव पूर्ण जीवन, स्वजनो से प्रेम करने वाला होता है।

शुक्र के द्रेष्काण मे अच्छा शरीर, राजा से सम्मानित, सर्वज्ञ, मनुष्य से प्रेम करने मे निपुण, दानी, स्त्रियो का रक्षक, रत्नादि से युक्त, श्रेष्ट स्त्री-पुत्र वाला, दयालु, मोटा, सत्यनिष्ठ, खुले दिल वाला, धर्म मे अनुरक्त होता है।
अन्यत्र - तीनो द्रेष्काण मे शुक्र होने पर जातक धनवान, शास्त्र पारंगत, रोग एवं पाप से मुक्त, धन और वैभव मे निरंतर वृद्धिवान, शांत, उदार संपन्न होता है।

शनि के द्रेष्काण मे जातक नीच, मलिन, क्रूर, ठग, दुराचारी, कंजूस, पुत्र धन से रहित, अवगुणी, ग्रुरु पत्नी या सौतेली माँ से व्यभिचारी, असहनशील, क्रोधी, बकवादी, विषाद युक्त, कामातुर होता है।
अन्यत्र - शनि के तीनो द्रेष्काणो मे जातक कंजूस, धर्म व अर्थ से हीन, धातु तस्कर, सुखी नही रहने वाला, बर्बर, दयाहीन, दुराचारी, नास्तिक होता है।

ग्रह द्रेष्काण से तात्पर्य ग्रह जिन जिन राशियो का स्वामी है। जैसे - मंगल = मेष व वृश्चिक।तीनों द्रेष्काण अर्थात प्रथम द्वितीय तृतीय मे से एक, किन्तु फल तीनो मे सामान है।

मेषादि राशियो का पृथक-पृथक द्रेष्काण फल 
मेष : मेष के प्रथम द्रेष्काण मे जातक दानी, तेजस्वी, पराक्रमी, ऊंच-नीच देखने वाला, भीष्म प्रतिज्ञा वाला, कलह प्रिय, स्त्रीवान, भाइयो को उग्र दण्ड देने वाला होता है।
मेष के द्वितीय द्रेष्काण मे जातक की स्त्री चंचल, सैरसपाटे करने वाली, प्रेम करने वाली, गीत प्रिय, एवं मनस्वी होती है। जातक मित्र और धन युक्त, *भ्रष्ट महिलाओ की संगति वाला पर धन भोगी होता है।
मेष के तृतीय द्रेष्काण मे जातक गुणवान, दोषी, बलवान, साहसी, राज सेवक, स्वजनो का प्रिय, अत्यंत धार्मिक, स्वाभिमानी, स्त्री का आदर करने वाला होता है।
* भ्रष्ट महिला अर्थात नारिया जो नाटक, अभिनय, मॉडलिंग, विज्ञापन, सिनेमा, क्लब, जनसंचार मे कार्यरत !

वृषभ : वृषभ के प्रथम द्रेष्काण मे जातक शराब, भोजन, नारी के वियोग मे संतृप्त (दुःखी) वस्त्र-अलंकार से युक्त, युवतियो के समान कोमल और सुन्दर होता है।
वृषभ के द्वितीय द्रेष्काण मे जातक सौम्य शरीर, सुभग स्त्री वाला, रूपवान, धनवान, दृढ़ प्रतिज्ञ, बुद्धिमान,स्त्रियो  का लोभी एवं प्रिय होता है।
वृषभ के तृतीय द्रेष्काण मे जातक चतुर, वीर, पापी, मंद भाग्य वाला, दूसरो धन लेने वाला, वय यानि उम्र के अंत मे दुःखी होता है।

मिथुन : मिथुन के प्रथम द्रेष्काण मे जातक स्थूल एवं उत्तम अंग वाला, धन से युक्त, लम्बा शरीर, जुंआरी, राजा का विश्वास पात्र, मिथ्याचारी, प्रतिभावान होता है।
मिथुन के द्वितीय द्रेष्काण मे जातक छोटा चेहरे वाला, ठिगना, सुन्दर शरीर, अल्प पतले बाल वाला, विनम्र, कोमल प्रकृति, बुद्धिमान, सौभाग्यशाली, यशस्वी होता है।
मिथुन के तृतीय द्रेष्काण मे जातक स्त्री द्वेषी, लम्बा बलशाली पुष्ट शरीर, अधिक खाने वाला, रूखे नख और रूखी हाथ पैर की त्वचा वाला होता है।

कर्क : कर्क राशि के प्रथम द्रेष्काण मे जातक देवताओ और ब्राह्मण का पूजक, गौर वर्ण, उपयुक्त कार्यकारी, सुन्दर, मृदुभाषी, सेवा कार्य मे तत्पर, सुभग होता है।
कर्क के द्वितीय द्रेष्काण में जातक लोभी, बकवादी, स्वप्नरत (कल्पना लोक विचारणी) स्त्रियो के रंग रूप से शीघ्र प्रभावित, अभिमानी, विलासी, चंचल, अनेक रोग युक्त होता है।
कर्क के तृतीय द्रेष्काण मे जातक की स्त्री चंचल, समृद्धशाली होती है। जातक विदेश गमन करने वाला, शराब प्रिय, सज्जन, वन-जंगल-जल यात्री, रत्न- आभूषणो युक्त, फूलो से प्रेम करने वाला होता है।

सिंह : सिंह के 00 से 10 अंश मे जातक दानी, बलवान, शत्रु स्वामी विजेता, अधिक धन का इच्छुक, मित्रवान, राज्य मे उच्च पदवान, साहसी होता है।
सिंह के 10 से 20 अंश मे जातक उच्च अभिलाषी, दानी, दृढ़ निश्चयी, बलवान, प्रभुता संपन्न, लड़ाई-झगडे का इच्छुक, सुखी, वेद-धर्म मे रुचिवान, बुद्धिमान होता है।
सिंह के 20 से 30 अंश मे जातक लोभी, दुविधाग्रस्त, दूसरो का धन हड़पने वाला, स्वस्थ, जिद्दी, अधिक बुद्धिमान, सम शरीर, अल्प संतानी, साहसी होता है।

कन्या : कन्या के प्रथम द्रेष्काण मे जातक सुन्दर, सौम्य पकृति, मृदुभाषी, लम्बा, कोमल शरीर, विनम्र, स्त्री से लाभी, समृद्धशाली, लंबे बाल, कोमल भूरे नयन वाला होता है।
कन्या के दूसरे द्रेष्काण मे जातक धैर्यवान, विदेशगामी, कला-कहानी में पंडित, लड़ाई-झगडे मे निपुण, अधिक बोलने वाला, आदेश मानने वाला होता है।
कन्या के तृतीय द्रेष्काण मे जातक गीत-संगीत मे  रुचिवान, जंगली स्त्री का स्वामी, विशाल नेत्र व सिर, छोटा शरीर (बोना, नाटा) राजा का कृपा पात्र होता है।

तुला : पहला द्रेष्काण हो, तो जातक कामदेव के सामान अति सुन्दर, निपुण, यज्ञादि कर्म करने वाला, छल-छिद्री (श्यामकला) व्यापारी, धैर्यवान होता है।
दूसरा द्रेष्काण हो, तो जातक कमल नेत्र वाला, अच्छा बोलने वाला, साहसी, विलासी, ख्याति प्राप्त, स्ववंश वृद्धि करने वाला, बुजुर्गो का सेवक होता है।
तीसरा द्रेष्काण हो, तो जातक चंचल, कपटी, कृतघ्न, कुरूप, टेड़े स्वभाव वाला, नष्ट मित्र, यश का इच्छुक, पापात्मा, अल्प बुद्धि होता है।

वृश्चिक : वृश्चिक के पहले द्रेष्काण मे जातक गौर वर्ण, साहसी, दृढ़ प्रतिज्ञ, रण का इच्छुक, विशाल नेत्र, स्थूल शरीर, कलह प्रिय होता है।
वृश्चिक के द्वितीय द्रेष्काण मे स्वादिष्ट भोजन करने वाला, चतुर, स्वर्ण आभा युक्त त्वचा वाला, सुन्दर, दूसरो के धन से युक्त, शीलवान  कला मे रुचिवान होता है।
वृश्चिक के तृतीय द्रेष्काण मे दोनो भोंहो से रहित, त्वचा पर अल्प रोम, दीर्घ बाहु, पीत नेत्र, लम्बोदर, दूसरो का धन हड़पने वाला, पतित, धैर्यवान होता है।

धनु : प्रथम द्रेष्काण मे जातक गोल चेहरा व नेत्र, जाति का सरगना (प्रमुख) न्याय प्रिय, सुआचरणी, सौम्य कोमल, स्वअर्जित धन से धनी होता है।
द्वितीय द्रेष्काण मे जातक धर्मज्ञ व शास्त्रज्ञ, उत्कृष्ट वक्ता, यज्ञादि धार्मिक आयोजन मे अग्रणी, सुप्रसिद्ध मंत्रवेत्ता, तीर्थाटन करने वाला होता है।
तृतीय द्रेष्काण मे जाति और बंधुओ मे प्रधान, चतुर, धार्मिक, स्त्रीवान, कुछ कामुक, पर स्त्री गामी, रूप-यश का इच्छुक, सफलता पाने वाला होता है।

मकर : मकर के 00 से 10 अंश मे जातक लम्बी भुजा, श्याम वर्ण, प्रसिद्ध, यशवान, मुर्ख, कम बोलने वाला, स्त्रियो को जीतने वाला, आकर्षक चेष्टा वाला होता है।
मकर के 10 से 20 अंश मे जातक छोटे चहेरे वाला, दूसरो की स्त्री व धन का अपहरण कर्ता, चतुर, स्त्रियों की गति जानने वाला, दानशील होता है।
मकर के 20 से 30  अंश मे जातक वाचाल (निरर्थक बोलने वाला) नीच (कलंकी) कृश, माता-पिता से विमुक्त (अलग)  विदेश जाने वाला, व्यसनी होता है।

कुम्भ : कुम्भ के पहले द्रेष्काण मे जातक स्त्रीवान, सुखी दाम्पत्य जीवन, सुखी, यशस्वी, लम्बा, परिश्रम से धनी, धर्म मे निष्ठावान, अधिक प्रभावी, परिश्रम से धनी, राजा का सेवक होता है।
कुम्भ के दूसरे द्रेष्काण मे जातक लोभी, समृद्धशाली, मृदुभाषी, गौरवर्ण,  हास्य विनोद प्रिय, अधिकार से बोलने वाला, बुद्धिमान, अधिक मित्र वाला होता है।
कुम्भ के तीसरे द्रेष्काण मे जातक लम्बा व पतला, धूर्त, प्रतापी, झूठ बोलने  वाला, पतले व छोटे हाथ वाला, नाचने वाला, कठोर ह्रदयी, विदीर्ण नेत्र वाला होता है।

मीन : पहले भाग 00 से 10 अंश  मे जातक मादक भूरे नेत्र, गौरवर्ण, मेघावी, धार्मिक कार्यो मे रत, प्रेमी, सुखी, जल क्रीड़ा करने वाला, विनीत होता है।
दूसरे भाग 10 से 20 अंश मे जातक आर्यजनो का सम्मानी, पवित्र स्वादिष्ट भोजन करने वाला, पर धन इच्छुक, श्रेष्ट स्त्री वाला, प्रतिभाशाली, श्रेष्ट वक्त होता है।
तीसरे भाग 20 से 30 अंश मे जातक किंचित श्यामल वर्ण, उदार, ललित कला निपुण, बड़े पैर वाला, मित्र को दानी, स्वादिष्ट भोजन प्रेमी, विनोदी स्वाभाव वाला  होता है।

समस्त ग्रहो के द्रेष्काण मे सूर्य फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक उद्विग्न चित्त वाला, विदेशगामी, संघर्षशील, प्रतापी, बलवान, दूरस्थ प्रदेश मे बसने वाला होता है। 
चंद्र के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक धर्मिष्ठ, कुटुंब-भाई-बहन वाला, पुण्यवान, पवित्र आत्मा, लोक प्रिय, सब धनो से युक्त, स्त्रीवान होता है। 
मंगल के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक शत्रु व बाधा युक्त, दुःखी, नीच समागम करने वाला, धन व संतान सुख मे हानि पाने वाला होता है।  
बुध के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक धर्माचरणी, कामी, विलासी, विचित्र बोलने वाला (अदभूत असाधारण तथ्य) संत विद्वान देवताओ का भक्त होता है। 
गुरु के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक विनीत, अथिति व आथित्य प्रेमी, सर्वगुण संपन्न, मेघावी, व्याक्य विशारद (तर्क निपुण) होता है। 
शुक्र के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक सुखी, देव-गुरु-विद्वानो का सम्मानी, निरोगी, महिलाओ का प्रेम भाजन, सत्यवादी होता है।
शनि के द्रेष्काण मे सूर्य फल - जातक पापी, रोगी, कृतघ्न, पुत्र व्यसनी और पीड़ा देने वाला, दुराचारी, सगे-सम्बन्धी और बन्धुजनो से त्यक्त होता है।

समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे चंद्र फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक पापी, दुर्बल, बर्बाद किया हुआ, आत्म सम्मान से वंचित, निर्गुणी, अल्प धनवान, दुर्भाग्यशाली, दूसरो की स्त्री का लोभी होता है। 
चंद्र के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक बुद्धिमान, बहु मित्र वाला, भाई-बंधु युक्त, सुखी, सुन्दर, पापो को नष्ट करने वाला, पुत्रवान होता है। 
मंगल के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक प्रतापहीन, क्रियाहीन, पर धन लोभी, सहस्त्र दुःखो से युक्त, मित्रहीन अलसी, अल्प बुद्धि होता है। 
बुध के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक सौम्य, सुभग, समृद्धशाली, सर्वगुण संपन्न, विद्यावान, विद्वान, प्रतिभा संपन्न, सब कलाओ मे निपुण होता है। 
गुरु के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक सदाचारी, शास्त्र  प्रेमी, सुशील, अनेक मित्र, अल्प क्रोधी, आथित्य प्रेमी, देव गुरु का भक्त  होता है। 
शुक्र के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक श्रेष्ट वाहन से युक्त, स्त्री प्रिय, उदार चेष्टावान, सत्य प्रिय, कलाओ मे कुशल, प्रशाशन से सम्मानित होता है। 
शनि के द्रेष्काण मे चंद्र फल - जातक मन व शरीर रोगी, दीन, दुःखी, पापी, विकृत, अनैतिक आचरण करने वाला, जीवन मे अनेक कष्ट पाने वाला होता है।

वराहमिहिर अनुसार :
चंद्र जिस राशि मे होता है उसके अनुरूप ही फल दिया करता है। चन्द्रमा अपने स्वयं या मित्र (सूर्य, बुध) के द्रेष्काण मे हो, जातक गुणी, आकर्षक, प्रतिभावान होता है। चन्द्रमा समक्षेत्री (मं, गु, शु, श) हो, तो मिश्रित परिणाम होते है।  चन्द्रमा शत्रुक्षेत्री या पापयुक्त हो तो जातक गुणहीन अनाकर्षक होता है। 

समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे मंगल फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक मुख व नेत्र रोगी, पंडित, सुशील, अल्प संतानी, धन वैभव से हीन, दुःखी, दुर्जन, प्रतापहीन होता है।
चंद्र के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक क्रूर, दुष्ट, दुर्जन, द्वेषी, धर्म प्रेमी, प्रसिद्ध, उदार, गुणी, नष्ट शत्रु, निजजन की चिंता करने वाला होता है।
मंगल के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक पराश्रित, पर अन्न खाने वाला, रोगी, महाक्रोधी, प्रतापहीन, अल्प बुद्धि, चरित्रहीन, दुराचरणी होता है।
बुध के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक गंभीर प्रकृति, उन्नतिशील, दृढ़ सकंल्पी, समृद्धशाली, विभिन्न धन युक्त, उच्च पदाधिकारियो से सम्मानित होता है।
गुरु के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक आभाव ग्रस्त, पीड़ा युक्त, दुःखी, प्रसिद्ध, ख्याति प्राप्त, कुवेशी, विद्वानो का आदर करने वाला, विनम्र, बुद्धिमान, देवताओ का सेवक होता है।
शुक्र  के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक सुरुचिपूर्ण, स्त्री प्रिय, स्वर्ण-मणि-गज युक्त, बल स्फूर्ति तथा पौरुष युक्त, धन व वाहन से सुखी, साहसी होता है।
शनि के द्रेष्काण मे मंगल फल - जातक मुर्ख, सतगुण व सत्चरित्र से रहित, व्यर्थ द्वेषी, कलह प्रिय, कुवेशी, अश्लील, प्रियजन वियोग होता है।

   समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे बुध फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक  कलंक और अपयश का भागी, क्रूर, हताश, ऋणी, धोखेबाज, कुरूप, कपटी, असंतुष्ट, धोटालेबाज, कामी होता है। 
चंद्र के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक शत्रु  भय से मुक्त, श्रेष्टजन सेवक, अनेक भाषाओ का ज्ञाता, क्लेश कलह प्रिय, दुःखी होता है। 
मंगल के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक शुभ व मंगल वैदिक कार्यो में रत, परम्परा निष्ठ, संयुक्त परिवार मे रहने वाला होता है। 
बुध के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक सुन्दर, आकर्षक, भाग्यशाली, सुभग, धर्म यज्ञ व्रतादि मे रत, आर्यजन (लोकहित) को दानी, मित्रवान होता है। 
गुरु के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक प्रतापी, धनी, सुन्दर, स्त्री प्रिय, पराक्रमी, अधिक बल-वीर्य-पौरुष युक्त, स्वस्थ, सुखी, काम सुख सक्षम होता है। 
शुक्र के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक धनवान, अपार सम्पदा युक्त, चतुर, सभ्य, सुसंकृत, खजाने वाला, शत्रुहीन, प्रसन्नचित्त, प्रशासनिक अधिकारी या पदाधिकारी से प्रशंसित होता है। 
शनि के द्रेष्काण मे बुध फल - जातक ऋणी, विवाद ग्रस्त, दुर्बल देह, दूरस्थ देश या विदेश वासी, धन नष्ट करने वाला, अलगाववादी, फुट डालने वाला होता है।


समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे गुरु फल (तीनो द्रेष्काण) 
सूर्य के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक कंजूश, क्रूर, निष्क्रिय, निन्दित, निर्लज्ज, अनैतिक धन (तस्करी, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी) कमाने वाला होता है।
चंद्र के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक चित्ताकर्षक, रूपवान, दानी यशस्वी, सज्जन, प्रसिद्ध, बहुत सम्मान पाने वाला, धनयुक्त, देव- ब्राह्मण भक्त होता है।
मंगल के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक दस्युजन (गुण्डे मवाली) से भयभीत, पित्तरोगी, स्वजन तथा शत्रु से कष्ट, धनहानि, बकवादी, नेत्र रोगी होता है।
बुध के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक कुल मे प्रसिद्ध, विद्या विनीत, विद्वान, सज्जन, धार्मिक, सौम्य आकृति, विनम्र, गुणी होता है।
गुरु के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक सुशील, शत्रुहंता, क्षमाशील, धैर्यवान, राज सम्मान युक्त, धन वैभव और पशु धन से संपन्न, सुखी, गुरु भक्त होता है। 
शुक्र के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक स्वर्ण-रत्न-आभूषण से संपन्न, हाथी-घोड़े (उच्च वाहन) आदि से युक्त, सुखी, राज्य सम्मानी होता है। 
शनि के द्रेष्काण मे गुरु फल - जातक कुबुद्धि, महाक्रोधी, स्वपीड़न या आत्महत्या की प्रवृत्ति वाला, विषादग्रस्त, पर धन लोभी, मित्रहीन, अनेक दुःख पाने वाला, विध्वंसक होता है। 


समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे शुक्र फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक विषम, कु स्त्री वाला, सुखहीन, उग्र, नीच, निष्ठुर, हत्यारा, निर्धन, आत्म सम्मान से हीन, संकुचित वृत्ति वाला, महाक्रोधी होता है।
चंद्र के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक सुखी, विद्वान्, विनम्र, विनीत, माता-पिता का भक्त, तेजस्वी, धार्मिक, कृतज्ञ होता है।  
मंगल के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक चोर, धूर्त, कपटी, धोखेबाज, छली (ठग)  छोटे-मोटे रोग से रोगी, व्यसनी मायावी होता है।  
बुध के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक सुभग, साहसी, भाग्यशाली, धूर्त (कुलटा) स्त्री स्नेह भाजन, स्वर्ण-रत्न व श्रेष्ट संतान युक्त, बलि होता है।
गुरु के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक अधिक सुन्दर, सत्यवान, क्षमाशील, धनी, समस्त कला निपुण, सहनशील, जन प्रेमी, उत्कृष्ट व्यक्तित्व वाला होता है।
शुक्र के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक साहसी, धनी, जाति व कुटुम्ब  प्रमुख, कुल श्रेष्ठ, अव्यसनी, सुन्दर, अध्यात्म विद्या रत होता है।
शनि के द्रेष्काण मे शुक्र फल - जातक भाई-बंधु रहित, पर स्त्री रत, कुकर्मी, दुष्टो का संगी, कैदी, हत्यारा, कुसेवक होता है। जातक की हत्या हो सकती है।

समस्त ग्रहो  द्रेष्काण मे शनि  फल (तीनो द्रेष्काण)
सूर्य के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक बहु कन्या वाला, परिश्रमशील, मंदबुद्धि, प्रतापहीन, खिन्नचित्त, कमजोर, टेड़े स्वभाव वाला परन्तु सुखी होता है। 
चंद्र के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक धनी, सर्व कला दक्ष, विवेकी, विपक्ष या शत्रु हीन, पुत्र प्राप्ति का इच्छुक, विरोध रहित होता है। 
मंगल के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक चोर, धूर्त, धोखेबाज, कपटी, निष्ठुर, नृशंस, निर्मम, निर्लज्ज, हत्यारा, पापी, मित्र हीन होता है। 
बुध के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक शास्त्रज्ञ, अनेक क्षेत्रो का ज्ञाता, वैज्ञानिक, प्रशंसित, स्व पत्नी से संतुष्ट, निडर, बहुश्रुत और बहुशास्त्र पारंगत होता है।  
गुरु के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक सज्जन, गुरुभक्त, प्रियभाषी, सहिष्णु, बलशाली, विद्वानो से सम्मानित, कुशल वक्ता, सज्जन, श्रेष्ठ स्त्री वाला होता है।
शुक्र के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक धन-धान्य संपन्न, बहुलाभी, सुयोग्य मित्र वाला, शत्रुहीन, व्यसन रहित, व्यापार मे बहुत लाभी होता है।
शनि के द्रेष्काण मे शनि होने पर जातक सदाचारी, स्वस्थ, सुखी, युवाओ का मित्र, विशिष्ट, मित्रवान, राज्य सम्मान प्राप्त, चरित्रवान होता है।

विशेष : द्रेष्काण मे सूर्य केन्द्र या उच्च का हो, तो सेना नायक, मित्रवान, बुद्धिमान होता है। द्रेष्काण मे शुभ ग्रह  यदि शुभ स्थान मे हो, तो शुभ फल देता है, समस्त कार्य निर्विघ्न संपन्न होते है। द्रेष्काण मे ग्रह नीच या शत्रुक्षेत्री हो, तो वैसा फल देता है तथा यथा क्रम मे धाव धातादिक देता है।

  मानसागरी अनुसार द्रेष्काण फल 
⋆ द्रेष्काण मे शुभग्रह स्वराशि या उच्च राशि मे हो, तो वरदात्री, सत्यवादिनी, लक्ष्मी भोगता है। अपने द्रेष्काण मे स्थित सौम्यग्रह केन्द्र या त्रिकोण मे हो, तो जातक धनी, मानी और सर्व कला निपुण होता है।
⋆ द्रेष्काणेश यदि शुभग्रह की राशि मे हो या शुभग्रह या भृगु से दृष्ट हो, तो अनेक सौख्य, निरोगता, मान-यश मे वृद्धि, स्वदेश के कार्य मे विख्यात, दूसरे का विरोधी होता है। 
⋆ द्रेष्काणेश चन्द्रमा से युत या दृष्ट हो या मंगल अथवा शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक स्व अवस्था अनुसार कर्म से धन प्राप्त करता है। 
⋆ द्रेष्काणेश नीच राशिस्थ, शत्रुक्षेत्री या पापयुक्त हो, तो उस राशि संख्या अनुसार जातक जीवन के उस मास या वर्ष मे कष्ट, पीड़ा या मृत्यु प्राप्त करता है।  जितने पाप ग्रह से प्रभावित हो उस मास या वर्ष संख्या मे कष्ट, दुःख प्राप्त होता है।  
⋆ यदि द्रेष्काणेश जन्म कुंडली मे 6, 8 वे भाव मे पाप दृष्ट या पाप युक्त हो, तो जातक का अनुज ऊंचाई से गिरकर मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त करता है। जातक के हाथ पर चोट का निशान हो सकता है। यदि सूर्य हो,  तो विद्युत या अग्नि से, मंगल हो, तो ऊंचाई से और गुरु या शनि हो, तो विष से मृत्यु पाता है। 
⋆ यदि द्रेष्काणेश 22 वे द्रेष्काण मे पाप ग्रह से दृष्ट या युक्त हो, तो जातक स्वयं या माता या अनुज को श्वांस रोग होता है तथा 22 वा द्रेष्काण स्वामी अपने रोग से मृत्यु देता है। 
22 वा द्रेष्काण यानि अष्टम भाव का प्रथम द्रेष्काण तथा लग्न से 210 अंश दुरी पर  होता है।  22 वा द्रेष्काण मृत्यु कारक माना जाता है।   
⋆ द्रेष्काणेश उच्च का होकर केन्द्र 1, 4, 7, 10  मे हो, तो जातक नृप, स्वगृही हो, तो धनवान, मित्रगृही हो, तो सम्मान पाता है। द्रेष्काणेश फणफर 2, 5, 8 11 मे उच्च, मित्र या स्वगृही हो, तो राजा के सामान होता है।  द्रेष्काणेश आपोक्लिम 3, 6, 9, 12 मे स्वगृही या मित्रगृही हो, तो जातक सबोध संतति वाला, सदाचारी, खेती द्वारा धनी होता है। 
⋆ द्रेष्काणेश नीच राशिस्थ या शत्रुक्षेत्री हो, तो उस राशि तुल्य शरीर मे धाव या चोंट का चिन्ह होता है यह राशि द्वारा द्योतित स्थान पर भी होता है। 
                                               
पाश्चात्य ज्योतिष मे द्रेष्काण   Decanetes

भारत से भी ज्यादा महत्व पाश्चात्य ज्योतिष मे द्रेष्काण को दिया जाता है। 
द्रेष्काण की गणना कर उस अनुसार फल प्रतिपादन करना वहा की मुख्यता है। प्राचीन शब्द DEKAN को ही DECAN या DACANETES यानि द्रेष्काण कहते है। प्रत्येक द्रेष्काण 10 अंश का होता है यानि भचक्र राशि के तीसरे भाग 30 ÷ 3 = 10 अंश को द्रेष्काण कहते है। शोध अनुसार मूलतः द्रेष्काण व आकृति (DECANS & FACES) का सम्बन्ध वास्तव मे नक्षत्र से है।

अरेबियन भूगोल और खगोल वेत्ता "अबूमज़र" द्वारा प्रतिपादित द्रेष्काण और उनकी रशिया बेबीलोनियन, इजिप्टीयन, परसियन पर आधारित थी। अरब विद्वानो ने इसे आकृति FACES की संज्ञा दी और प्रत्येक राशि मे तीन आकृतिया मानी। "टॉलेमी" ने इसे राशि का विशेष विभाजन माना तथा आकृति (चित्र) व द्रेष्काण (चित्र के भाग) को नक्षत्र प्रतिपादित किया, इनकी गणना 36 है। परन्तु आधुनिक मतावलम्बियो ने इसे मान्य नही किया और कहा कि यह मूल सिद्धांत के विपरीत है। 


आधुनिक पाश्चात्य द्रेष्काण सारणी 
इस प्रकार आधुनिक मान्यता अनुसार राशि के तृतीय भाग को द्रेष्काण कहा जाता है। प्रत्येक राशि के तीन द्रेष्काण होते है जो गणना में 12 X 3 = 36 है। इनके स्वामियो का निरूपण दो अलग अलग सिद्धांत से किया जाता है। प्राचीन सिद्धांत अनुसार द्रेष्काण स्वामियो की गणना ग्रहो की क्रमबद्धता अनुसार मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, सूर्य, चंद्र से है परन्तु यह प्रचलन में नही है। प्रचलित सिद्धांत भारतीय ज्योतिष अनुरूप ही है। राशि का प्रथम द्रेष्काण उसी राशि का, दूसरा द्रेष्काण उससे पांचवी राशि का, तृतीय द्रेष्काण उससे नौवी राशि का होता है। भारतीय सिद्धांत अनुसार द्रेष्काण के स्वामियो की गणना राशियो के त्रियुग्म यानि तत्व अनुसार ही की जाती है। ग्रहो मे हर्षल व नेप्च्यून की गणना की जाती है। 
* जातक = वह प्राणी जिसका विचार किया जा रहा हो। 
                    
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...