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संतान पुत्र होगा या पुत्री | लड़का होगा या लड़की | Child Astrology Boy Or Girl

संतान पुत्र होगा या पुत्री | लड़का होगा या लड़की |  Child Astrology Boy Or Girl


किसी महिला के मासिक धर्म के समय स्त्री के जन्मांग में जन्मकालीन चंद्रमा से जब गोचर का चंद्रमा 3,6,10 एवं 11वें भाव को छोड़कर अर्थात लग्न, द्वितीय, चर्तुाि, सप्तम, अष्टम, नवम एवं बारहवें भाव से गोचर करता है तथा उसे मंगल देखता है तथा पुरुष की जन्म कुंडली में जन्मकालीन चंद्रमा से गोचर का चंद्रमा 3,6,10,11 में से किसी एक भाव में हो तथा गुरु से चंद्रमा दृष्ट हो तब स्त्री पुरूष के संयोग से गर्भ धारण होता है। यदि पंचम भाव को सूर्य मंगल एवं गुरु ेखे तथा पंचम पर किसी ग्रह का दुष्ट प्रभाव न हो तो पुत्रोत्पति होता है। यदि पंचमेश पुरुष ग्रह होकर पाप दृष्ट या युत न हो तऔर जब चंद्र या शुक्र पचम या पंचमेश को देखे तथा पाप प्रभाव में पंचम या पंचमेश न हो तो ऐसी अवस्था में अधिकतर कन्या संतति उत्पन्न होती है। जो दम्पति मेडिकल जांच में ठीक है किंतु संतान उत्पति में असफल है ऐसे समय का उपयोग कर संतानोत्पति कर सकते हैं। किंतु जो दम्पति मेडिकल जांच में ठीक नहीं किंतु उनकी कुंडलियों में संतान योग के कारण दिखाई दे ऐसे दम्पतियों को उचित चिकित्सा करवाना ही श्रेष्ठ है। 

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संतानोत्पति योग: यदि लग्नेश, लग्न, द्वितीय या तृतीय भावस्थ हो तो प्रथम संतान पंत्र और लग्नेश चतुर्थ भाव में हो तो द्वितीय संतान पुत्र होती है। यदि पंचमेश एवं पंचम भाव पर गुरु की दृष्टि तथा पंचम एवं पंचमेश पापत्व प्रभाव से रहित हो तो ऐसी स्थिति में अधिकांशतः पुत्रोत्पति होती हैं पंचम भाव शुभ प्रभाव में हो तो संतान योग होता है किंतु शुभ ग्रह का पंचमेश से दृष्ट न होने पर संतान की अभाव रहता है। सप्तम में शुक्र दशम में चंद्रमा तथा चतुर्थ में पापग्रह होने से संतानहीन योग बनता है। पंचमेश जिस भाव में स्थित है वहीं से 5,6,12वें भाव में दुष्ट ग्रह होने पर संतान अभाव रहता है। यदि संतान हो भी जाये तो उसके जीवित रहने में संदेह है। किसी जातक के जन्मांग में पंचम भाव पर पापी ग्रह शनि, राहु, केतु अथवा नीच ग्रह की दृष्टि या युति, पंचम भाव में पंचमेश नीचस्थ हो, द्वादशेष, अष्टमेश, षष्ठेश से दृष्ट या युत होने पर संतानोत्पति में बाधक है क्योंकि दुष्ट ग्रह के प्रभाव से अंडे के विकास में बाधा आती है तथा प्रोजस्टीरोन हारमोन की कमी हो जाती है। गर्भाशय की मांसपेशियां कमजोर होती है। मंगल की दृष्टि आदर्शन का कारण बनती है। पंचम भाव के उपाधिपति के नक्षत्र के उपनक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा, अंतरदशा और प्रत्यंतर में संतान उत्पति होती है।

दूसरी समस्‍या है छोटी चिंताओं की पहले मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता था। क्‍योंकि मुझे यह स्‍त्री विशेष या कह दें पर्सनेलिटी विशेष की समस्‍या लगती थी। जो केवल स्‍त्री ही नहीं किसी इंडी‍जुअल पुरुष में भी हो सकती थी। ज्‍योतिष अध्‍ययन के अनुसार चिंता करने की समस्‍या के कारण स्त्रियों और पुरुषों में एक जैसे होते हैं। यानि इसमें फर्क नहीं किया गया है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पूर्व में जातक हमेशा पुरुष ही रहे होंगे। ज्‍योतिष की पुस्‍तकें पढ़ने के दौरान ही एलन पीज की पुस्‍तक हाथ लगी। इसमें स्त्रियों और पुरुषों के सोचने के तरीके के बारे में विस्‍तार से बताया गया था। तो मेरा भी ध्‍यान इस ओर गया।
अब सवाल यह है कि छोटी चिंताओं का स्‍वरूप क्‍या है और इसका एक साथ समाधान कैसे किया जा सकता है? ज्‍योतिष की ही पुस्‍तकों में इसका सपाट और सटीक उपाय बताया गया है। जिस तरह एक आदमी को सुखमय वैवाहिक और संबंध की दृष्टि से संतुष्टिदायक जिंदगी के लिए शुक्र की आवश्यकता होती है वैसे ही स्त्रियों के लिए इसे गुरु के रूप में देखा गया है। गुरु का नाम गुरु है तो ऐसा लगता है जैसे स्त्रियों को ज्ञान देने वाले की जरूरत है लेकिन वास्‍तव में गुरु नहीं बल्कि सांसारिकता ज्ञान और सांसारिकता का लाभ देती है। गुरु इसी सांसारिकता को रिप्रजेंट करता है। अब चूंकि गुरु किसी भी स्थिति में नुकसान नहीं करता। हां फल कम या अधिक दे सकता है। ऐसे में अधिकांश स्त्रियों को आँख मूंदकर पुखराज पहनने की सलाह दे दी जाती है। इससे उनके सोचने का नजरिया वृहद् हो जाता है। इसी के साथ मोती पहनने की सलाह भी दी जाती है। चंद्रमा का उपचार विचार शृंखला को थामे रखता है।

गुरु और चंद्रमा का कांबिनेशन प्राथमिक स्‍तर पर ही अधिकांश समस्‍याओं का समाधान कर देता है। उन विचारों और कारणों को बढ़ने ही नहीं देता जो चिंताओं को हवा दे। इस तरह महिलाओं को फैशन में ही सही पुखराज और मोती पहन लेने चाहिए। भले ही वे ज्‍योतिष से संबंधित स्‍टोन हैं, लेकिन खूबसूरत होने के कारण ग्राह्य भी हैं।

बुध का प्रभाव —पुरुष कुण्‍डली में जहां शनि पीड़ादायी ग्रह है वहीं स्‍त्री जातक के लिए बुध पीड़ादायी ग्रह सिद्ध होता है। बुध के प्रभाव में एक ही रूटीन में लंबे समय तक बने रहना और एक जैसी क्रियाओं को लगातार दोहराते रहना पुरुष के लिए आसान है, पर स्‍त्री जातकों के लिए यह पीड़ादायी सिद्ध होता है। ऐसे में महिलाओं को अपनी दिनचर्या, कपड़े, रहने का तौर तरीका लगातार बदलते रहने की सलाह दी जाती है। इससे उनकी जिंदगी में दुख और तकलीफ का असर कम होता है।

मंगल का प्रभाव —सामान्‍य तौर पर ऋतुस्राव के दौरान स्त्रियों के रक्‍त की हानि होती है। ज्‍योतिष में इसे मंगल के ह्रास के रूप में देखा जाता है। मंगल के इस नुकसान की भरपाई के लिए सुहागिनों को लाल बिंदी लगाने, लाल चूडि़यां पहनने, लाल साड़ी एवं लाल रंग का सिंदूर लगाने की सलाह दी जाती है। मंगल की भूमिका अधिकार एवं तेज क रूप में होती है। लाल रंग को धारण करने से मंगल का तेज महिलाओं को फिर से प्राप्‍त हो सकता है।
चन्द्रमा का प्रभाव–चंद्रमा पीडि़त होने पर शरीर में खनिज तत्‍वों और कैल्शियम की कमी हो जाती है।राहू, केतू, बुध और शनि के कारण चंद्रमा पीडि़त हो तो स्‍त्री कर्कशा, रुदन करने वाली या कलहप्रिय होती है। ऐसी स्त्रियों को रोजाना सुबह खाली पेट मिश्री के साथ मक्‍खन खाने की सलाह दी जाती है। मक्‍खन (butter) में उपलब्‍ध खनिज तत्‍व एवं कैल्शियम जातक के‍ केन्‍द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) को फिर से दुरुस्‍त करता है और जातक हंसने खिलखिलाने लगता है।
किसी भी रोगी जातक की कुंडली का विश्लेषण करते समय सबसे पहले 3, 6 8 भावों के ग्रहों की शक्ति का आंकलन करना चाहिए. जन्मकुंडली के अनुसार शरीर का विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव और उनसे मुक्ति प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं. लेकिन इसके साथ ही साथ कुण्डली में रोगों का अध्ययन करते समय इन तथ्यों का अध्ययन करते हुए ग्रहों की युति, प्रकृति, दृष्टि, उनका परमोच्चा या परम नीच की स्थिति का भी अध्ययन आवश्यक है तभी हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं |

आदि काल से ऋषियों ने पहले ही संतान प्राप्ति के नियम(Progeny Rules)और संयम आदि निर्धारित किये थे जिस प्रकार प्रथ्वी पर उत्पत्ति और विनाश का क्रम हमेशा से चलता रहा है और ये आगे भी ये नियमित रहेगा उसी प्रकार इस क्रम में जड़-चेतन का जन्म होता है फिर उसका पालन होता है इसके पश्चात विनाश होता है |

मनचाही सन्तान लड़का या लड़की उत्पन्न करना हमारे वश की बात है, बसर्ते हमें इस विषय पर प्रयाप्त और ठीक ठाक जानकारी हो । शास्त्र सम्मत बिधी बिधान के अनुसार मन पसन्द सन्तान की उत्पत्ती कैसे हो इस पर चर्चा हम यहाँ करेंगे ।

गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.

योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा. स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है.
योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये. इस स्थिति मे स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा. इस स्थिति में अगर गर्भादान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान प्राप्त होगी.

विवाहोपरांत सभी दम्पति की अभीलाषा होती है कि उसकी कम से कम एक संतान अवश्य हो -जिस प्रकार धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड का विकास सुचारु रूप से होता रहता है और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा और नही मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा |

इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान(Conception) का कारण समझ लेना चाहिये जिनका पालन करने से आप तो संतानवान होंगे ही आप की संतान भी आगे कभी दुखों का सामना नहीं करेगा |
इनमे से अधिकांश औषधियों का चयन प्राचीन ग्रंथो से किया गया हैं और वैद्यों एवं प्रयोगकर्ता इन्हें पूर्ण सफल और अनुभव सिद्ध भी मानते हैं और कुछ मंत्रो के विधान से भी और निष्ठां पूर्वक किया गया ब्रत भी फलदायी होता है |
कुछ राते ये भी है जिसमे हमें सम्भोग करने से बचना चाहिए-जैसे अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और आमवस्या –

चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा-
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं-मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता(Disease)को प्राप्त होता है पांचवी रात्रि से संतान उत्पन्न करने की विधि करनी चाहिए |

इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये-यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता है इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं(Sperm) का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है|
यदि पति-पत्नी संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास(sexual intercourse) कर सकते हैं इस काल में गर्भाधान की संभावना नही के बराबर होती है|

चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है- इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये इसका गर्भस्थ शिशु पर अत्यंत प्रभावकारी असर पडता है |
अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आ रही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये- यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें- राहु बाधक हो तो कन्यादान से- केतु बाधक हो तो गोदान से- शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं|
janiye सहवास(lovemaking)की कुछ राते—
मासिक स्राव रुकने से अंतिम दिन (ऋतुकाल) के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है|
चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है|
पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी|
छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा|
सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी|
आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है|
नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है|
दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है|
ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है|
बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता ह|
तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है|
चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है|
पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है|
सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है |
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विवाहोपरांत सभी दम्पति यह चाह्ते है की उनकी सन्तान स्वस्थ , सुन्दर और बुद्धिमान हो , साथ ही साथ दम्पति खुद निर्णय करे की उन्हे पुत्र चाहिए या पुत्री , लेकिन यह वहुत कम दंपत्ति जानते है की ऐसा कैसे हो सकता है । यह जो बिधी हम बताने जा रहे है यह 100 प्रतिशत सफल सिद्ध हुयी है एक दम्पति ने इस बिधी का पालन किया फलस्वरूप ( पांच पुत्रियों के बाद) पुत्र उत्पन्न करने में सफलता पाई ।
मेरा मकसद लिंग संतुलन बिगारना नहीं है । एक दम्पती जिसे तीन पुत्र था उन्हें एक पुत्री की चाह थी इश बिधी का प्रयोग से पुत्री हुयी । ऐसे अनेक प्रमाण है , यह अनुभब सिद्ध प्रयोग है , । गर्भ धारण संस्कार का उचित समय दो बातो पर निर्भर करता है । आपको लड़का चाहिए या लड़की । पुत्र को जन्म देने की इछा से किये जाने बाले गर्भधारण संस्कार का उचित समय … एक तो यह की उस समय शुक्ल पछ ( चाँदनी रात वाला ) हो और दुसरी यह है की जिस दिन पत्नी का मासिक धर्म सुरु हुवा हो उस दिन रात को पहली रात मानकर गिनने पर आठमी , दशमी , बरहमी , या चौदहमी रात हो । यह तो हुयी मोटी बात , मुख्य और जरुरी बाते जिसका पालन होना अनिवार्य होता है वह यह की इस गणित के अनुसार आगामि महीनो में ऐसा संयोग कब बनेगा । जब इधर स्त्री का मासिक धर्म शुरू हो और उधर शुक्ल पक्छ की एकंम तिथि (परवा ) एक ही ही दिन पड़ जाये / एक दो दिन आगे पीछे भी शुरू हो तो कार्य सिद्ध होने में कोई बाधा नहीं पड़ती / गणित के इस बिबरण को फर्मुला मान ले और जब भी पत्नी का ऋतुस्राव शुक्ल पछ की तिथियों से संयोग कार्यक्रम निर्धारीत कर ले / अवं अच्छी तैयारी के साथ अनुकूल रात्रियों में गर्भधान संस्कार आयोजित करे / सारे प्रयत्न निष्ठां पुर्बक और सतर्कता के साथ करे और फल भगवान पर छोड दे \
प्रायः संतान न होने के लिए स्त्री ( पत्नी ) को दोषी ठहराया जाता है और बदनाम भी किया जाता है / यदि पुरुष के सुक्र में पर्याप्त शुक्राणु नहीं हो .गर्भ स्थापित न होने का कारण स्त्री नहीं पुरुष होगा / नये बैज्ञानीक अनुसन्धान के आधार पर कहा जा सकता है . की व्यक्ती अपनी इछा से लड़का या लड़की पैदा कर सकता है . इस बात के वैज्ञानीक प्रमाण मिल चुके है . / स्त्री के अंडे ( ovum ) में केवल ( X ) क्रोमोसोम पाये जाते है . जबकि पुरुष में X और Y दोनों क्रोमोशोम्स होते है / यदि X और Y क्रोमोशोम्स का संजोग हो तो लड़का शरीर बनता है / और यदी गर्भधान के समय पुरुष के शुक्र में X क्रोमोशोम्स गैर मौजूद हुवा तो गर्भधान लड़की का हो जायेगा / भारतीय जयोतिष के अनुसार शुक्ल पछ के समय सम संख्या बाली आठवी .दशवी . बारहमी . अदि रात्रियो में गर्भधान करने से पुत्र प्राप्ति का बिधान बताया गया है / इन रात्रियो में चंद्रमा के प्रभाव से शुक्र में X क्रोमोशोम्स की उपस्थीती बनी रहती है / बैज्ञानिको के अनुसंधानानुसार चन्द्रमा के प्रभाब से पुरुषो के शुक्र में X क्रोमोसोम्स प्रयाप्त मात्रा में मौजुद पाई गई एवं बिशम रात्रियों में Y क्रोमोशोम्स की अधिकता थी / स्त्री अपने मासिक अबधी के 12 वे से 14 वे दिन के मध्य अत्यधिक प्रजनन सामर्थ्य रखती है /यदि पुत्र उत्पन्न करने की अभिलाषा हो तो पति व पत्नी को बड़े सयम के साथ गर्भधान के लिए सतर्कता पूर्वक नियम का पालन करते हुवे स्त्री के मासिक धर्म का पहला या दूसरा दिन शुक्ल पछ की पहली व दूसरी तिथि के साथ साथ पड़े तो सर्वाधीक प्रजनन छमता बाले 12 वे एवम 14 वे रात पुरुष के शुक्र में भी Y क्रोमोसोम्स सर्वाधिक सघन मात्रा में उपलब्ध रहते है . जो पुत्र उत्पती के लिए अति आवश्यक और मूल कारक है / जब यह संयोग बने तभी 12 वे 14 वे दिनों में गर्भधान संस्कार होना चाहिये / अन्य दिनों में गर्भधान होने से कन्या सन्तान की सम्भाबना अधिक रहती है / यह ध्यान रखने की बात है की मासिक धर्म का पहला या दुसरा दिन शुक्ल पछ की पहली या दूसरी तिथि हो और 12 वे .. 14 वे दिनों के पहले या बाद में पुरुष ब्रम्हचर्य का पालन करे या गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करे |

Putra prapti ke upay (पुत्र प्राप्ति के अचूक ज्योतिषीय उपाय)


पुरातन काल के लोग उपरोक्त नियम-संयम से संतान-उत्त्पति किया करते थे-
सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए एकदम से नहीं उठना चाहिए तथा वास्तु शास्त्र में कुछ ऐसे प्रमुख दोष बताये गए है जिनके कारण संतान की प्राप्ति नहीं होती या वंश वृद्धि रुक जाती है इस समस्या के पीछे की वास्तविकता-क्या है इसका शास्त्रीय और ज्योतिषीय आधार क्या है ये आप अपनी जन्म कुंडली के द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते है-इसके लिए आप हरिवंश पुराण का पाठ या संतान गोपाल मंत्र का जाप करे-
पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता के साथ इस मंत्र का जप तुलसी की माला से करें-
संतान प्राप्ति गोपाल मन्त्र –
” ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।”
इस मंत्र का बार रोज 108 जाप करे और मंत्र जप के बाद भगवान से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला, सेहतमंद पुत्र की कामना करें-
अपने कमरे में श्री कृष्ण भगवान की बाल रूप की फोटो लगाये या लड्डू गोपाल को रोज माखन मिसरी की भोग अर्पण करे-
कई बार प्रायः देखने में आया है की विवाह के वर्षो बाद भी गर्भ धारण नहीं हो पाता या बार-बार गर्भपात हो जाता है, ज्योतिष में इस समस्या या दोष का एक प्रमुख कारण पति या पत्नी की कुंडली में संतान दोष अथवा पितृ दोष हो सकता है या घर का वास्तुदोष भी होता है, जिसके कारण गर्भ धारण नहीं हो पाता या बार-बार गर्भपात हो जाता है-
पुत्र-प्राप्ति गणपति मन्त्र-
श्री गणपति की मूर्ति पर संतान प्राप्ति की इच्छुक महिला प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होकर एक माह तक बिल्ब फल चढ़ाकर इस मंत्र की 11 माला प्रतिदिन जपने से संतान प्राप्ति होती है-
 ‘ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नम:’
पुत्र-प्राप्ति शीतला-षष्ठी ब्रत-
माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है कहीं-कहीं इसे ‘बासियौरा’ नाम से भी जाना जाता हैं इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये- इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है |
अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आरही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये. यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं|

खुद जानें, लड़का होगा या लड़की – केरल ज्योतिष

आप एक मामले में तो बड़े-बड़े ज्योतिषियों को फेल कर ही सकते हैं। अक्सर घर में, पड़ौस में, नाते-रिश्तेदारी में कोई महिला गर्भवती होती है तो सबको जिज्ञासा होती है कि उसके लड़का होगा या लड़की। हम फटाफट किसी न किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं और उसकी भविष्यवाणी का बड़ी उत्सुकता से सही होने का इंतजार करते हैं। अक्सर ज्योतिषी का कहा इस मामले में सही नहीं होता।


संतान प्राप्ति में बाधा योग/श्राप योग:- | Sthapit yog in Kundali


लेकिन एक विधि ऐसी भी है कि आप घर बैठे ही आसानी से पता लगा सकते हैं कि कोई महिला गर्भवती है या नहीं, यदि है तो उसके लड़का होगा या लड़की। तो शुरू करें वह चमत्कारी तरीका, जो यह बताता है कि कोई महिला गर्भवती है या भी या नहीं, और है तो उसके लड़का होगा या लड़की। यह विधि है केरल की। इसलिए इसे कहते हैं केरल प्रश्न ज्योतिष।

सूत्र-1-आपकी भाभी, बहन या कोई महिला गर्भवती है भी कि नहीं, यह जानने के लिए दिन की संख्या लिखें (ए), इसे तीन से गुणा करें। अब इसमें तिथि की संख्या जोड़ें (बी) = कुल अंक (सी), इसमें दो का भाग दें। यदि एक बचे तो महिला गर्भवती है, शून्य बचे तो गर्भवती नहीं है।

उदाहरण-मान लीजिए कि किसी ने सोमवार को सवाल किया है और उस दिन अमावस के पहले की द्वादशी है। तो इसका इस तरह योग करेंगे। सोमवार के लिए संख्या 2×3=6+27 कृष्णा 12 (15+12) कुल अंक 33/2, बचा एक, यानि महिला गर्भवती है।

अच्छी तरह समझ लें कि हमेशा रविवार की संख्या एक होगी। दिन कोई हो, उसकी गिनती रविवार से करें, जैसे कि गुरुवार है किसी दिन तो उस दिन का अंक होगा पांच। इसी तरह उपरोक्त उदाहरण में कृष्ण पक्ष की द्वादशी ली गयी है, इसकी गिनती होगी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से। इसका अंक होगा एक और कृष्ण द्वादशी है तो पूरनमासी तक के पंद्रह अंक और इसके बाद द्वादशी तक के बारह अंक। इस तरह कुल अंक होंगे 27.

अब पता लगाते हैं कि गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की। इसके लिए इनकी संख्या जोड़ें-

दिन+तिथि+नक्षत्र+योग+गर्भवती स्त्री के नाम के अंक, अब इसमें 7 का भाग दें। यदि 1,3,5 संख्या बचे तो लड़का गर्भ में पल रहा है और 2,4,6 बचे तो गर्भ में लड़की पल रही है। याद रखिए कि नक्षत्र 27 होते हैं। हमेशा अश्विनी नक्षत्र से गिनती शुरू करनी है और इसका एक नंबर लेना है। अंतिम नक्षत्र रेवती होता है. जिसका नंबर होता है 27. इसी प्रकार योग भी 27 होते हैं। पहला योग होता है विषकुंभ, इसका नंबर है 1, और

अंतिम योग है वैधृति, इसका नंबर है 27, इसी प्रकार नाम के नंबर हिंदी नाम के ही लेने हैं। जैसे नाम है भारती तो इसके अंक हुए 3, दिन सोमवार 2+ तिथि 27(कृष्ण 12 )+ नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी 12+ योग वैधृति 27+ गर्भवती का नाम (भारती) 3=71/ 7, शेष बचा 1, इसका मतलब है कि उसके लड़का होगा।

मेरे पास एक सज्जन आए और पत्नी के गर्भ के बारे में पूछने लगे। उनका कहना था कि वह इसलिए चिंता में हैं कि पिछली बार का गर्भ गिर गया था। उन्होंने पत्नी का नाम मीरा बताया। मैंने तत्काल गणना की। यह 27 जुलाई 2013 की बात है। दिन शनिवार 7+21 (तिथि कृष्णा 6) + 26 नक्षत्र (उत्तरा भाद्रपद)+7 योग (सुकर्मा)+2 मीरा नाम के अंक। कुल अंक हुए 63/7, लिहाजा सात का भाग देने पर शून्य बचा।

मैंने कहा कि बच्चे का बचना मुश्किल है। आप अपने डाक्टर से सलाह लें। उन्होंने बताया कि डाक्टर ने भी ऐसा ही बताया है। कुछ दिन बाद पता कि उस महिला का फिर से एबार्शन हुआ है।

संतान के लिंग निर्धारण के विषय में ज्‍योतिष कभी घोषणा नहीं करता है। ज्‍योतिष की यह गणना मात्र एक संकेत की तरह ही होती है, इसके अनुसार अधिकतम संभावना के बारे में बताया जा सकता है, लेकिन न तो इसे अंतिम माना जाना चाहिए और न ही किसी प्रकार के निर्णय के लिए इस सलाह को काम में लिया जा सकता है। लिंग निर्धारण के बजाय संतान की संभावना के संबंध में सवाल पूछा जा सकता है।

Beeja Sphutas & Kshetra Sphutas (बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट)


संतान पुत्र होगा या पुत्री (Santan)
इस विषय को लेकर आज तक मैंने कुल 23 फलादेश दिए हैं। इनमें से 21 सही रहे और दो गलत। दो फलादेश गलत रहने का कारण भी यह रहा कि मुझे जो जानकारियां मुहैया कराई गई थी वे गलत निकली। बाद में जातक ने अपनी गलती स्वीकार की और मेरे फलादेश को माना।

वैसे भारत सरकार के कानून के मुताबिक लिंग परीक्षण (Gender determination) करना गैरकानूनी है। इसके बावजूद सोनोग्राफी वाले अंधाधुंध कमाते हैं। हर किसी को पुरुष संतान (Sanatan) की चाह है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि मैं सोनोग्राफी वालों के पीछे ही पडा रहूंगा या बताउंगा भी कि आपके संतान (Santan) पुत्र होगा या पुत्री।

संतान का लिंग पता करने के बारे में मेरे गुरूजी से पूछा तो उन्होंने जो उत्तर दिया वह अतार्किक लगा। उन्‍होंने कहा संतान ईश्‍वर की देन है इस बारे में हमें फलादेश करने की मनाही है। इस विषय को न ही छेड़ें तो बेहतर होगा। बाद में भले ही मुझे उनकी बात खरी लगने लगी हो लेकिन उस समय मैं जोश में था और पता करना ही चाहता था।

संतान के बारे में निर्णय करने के लिए मेरा खुद का तरीका विकसित किया। इसके लिए मैं पहले जातक की कुण्डली देखता हूं और पता करता हूं कि जातक अमीर बनने के योग हैं या नहीं, दूसरा आने वाले दिनों में जातक धक्के खाता फिरेगा या उसके जीवन में स्थिरता आएगी, तीसरा जातक की पारिवारिक पृष्ठ भूमि कैसी है, चौथा फिलहाल जातक की आर्थिक स्थिति कैसी है, पाँचवाँ जातक के चंद्रमा की क्या स्थिति है। तो मेरे जातक से सवाल होते हैं…

1 अभी आपके पास कितना पैसा है
2 आने वाले दिनों की क्या योजना है
3 जातक के पिताजी क्या करते हैं

अगर तीनों चीजें फेवरेबल हो तो कुण्डाली में देखता हूं कि जातक का खुद का चंद्रमा किस स्थिति में है। अगर चंद्रमा खराब हुआ और ऊपर की स्थितियां फेवरेबल हुई तो जातक के अवश्य कन्या होगी।

और यदि जातक का बैंक बैलेंस खत्म सा हो गया हो, नौकरी में प्रमोशन रुका हुआ हो, पिता ने घर से निकाल दिया हो, रात को समय पर नींद नहीं आती हो और पत्नीर का वज़न बढता जा रहा हो तो जातक को पुत्र संतान की प्राप्ति होगी।

ऐसा क्यों ? इसके दो कारण हैं। पहला, जातक की असुरक्षा की भावना जितनी अधिक प्रबल होती जाती है, जीवन की समस्याएं जितनी अधिक होती हैं पुरुष संतान होने की संभावना बढ़ जाती है। मैं मानसिक स्‍तरों और इसकी कार्यप्रणाली के बारे में अधिक तो नहीं जानता लेकिन अनुमान लगा सकता हूं कि साइकोलॉजिकली होता यह होगा कि जातक का अवचेतन यह निर्णय करता होगा कि अब अपना तो खेल खत्म हुआ अगली पीढ़ी में अपने रक्त का संचार करने के लिए पुत्र छोड़ दें।

दूसरा कारण चंद्रमा का है। चंद्रमा की स्थिति बेहतर होने पर जातक निश्चिंत स्व्भाव का हो जाता है। ऐसे में समृद्धि बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रहा होता तो गुणसूत्रों में वाई का अनुपात बढ़ जाता होगा। अधिकांश विज्ञान के विद्यार्थी समझ जाएंगे कि ऐसे कैसे वाइ बढ़ सकता है। दोनों विपरीत परिस्थितियां मिलकर पुत्र होना सुनिश्चित करती हैं।

वहीं जिस जातक का स्थाईत्‍व लगातार बढ़ता जा रहा हो, उसके गुणसूत्रों में वाइ का अनुपात घट जाता होगा। ऐसे में कन्या की प्राप्ति होने की संभावना बहुत हद तक बढ़ जाती है। इसमें चंद्रमा का रोल यह रहता है कि कुण्डली में चंद्रमा की खराब स्थिति मानसिकता को ऐसा कर देती है कि मनुष्य लगातार ऊपर चढ़ने का प्रयास करता है। ऐस में कन्या बुध के रूप में उसे अतिरिक्त सहायता देने के लिए आ जाती है।

यह मेरा अनुभूत नियम है कि जिस जातक के कन्या संतान हुई वह या तो पैसे वाला पहले से बन रहा था वरना कन्या संतान के साथ ऐसी परिस्थितियां बनी कि वह पैसे वाला बन गया। अगर अमीर नहीं तो खाते-पीते परिवार का मालिक तो बना ही है। इसके उलट मेरे कुछ जातक पुत्र के जन्म के बाद ट्रांसफर, पैसे का नुकसान, व्यापार में धक्के्, सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट का दंश भोग रहे हैं।

मेरे एक दोस्त को इस बारे में जानकारी थी। जब मैंने उससे पूछा कि अभी तुम्हारी माली हालत कैसी है तो उसने चट से जवाब दिया कि बिल्कुल कड़का हूं। मैंने पूरे आत्मसविश्वास के साथ कहा कि तुम्हें पुत्र रत्न की ही प्राप्ति होगी। बाद में उसके पुत्री हुई। मैंने माफी मांग ली, तो मित्र ने बताया कि उसकी दादी मेरे मुंह से पोता होने की बात ही सुनना चाहती थी इसलिए उसने झूठ बोला कि वह कड़का है।

मेरे आस-पास रहने के कारण उसे इस पद्धति के बारे में जानकारी थी। उसने अपने भाई के बिजनेस में कुछ लाख रुपए लगा रखे हैं। जो लगातार बढ़ रहे हैं। जब उसने खुलासा किया तो मैं बहुत झल्लाया। खैर जो भी हो, मेरा फलादेश गलत होकर भी अधिक सही रहा।

गर्भ में लड़का है या लड़की, केरलीय ज्‍योतिष से जानें

संतान के लिंग निर्धारण के विषय में ज्‍योतिष कभी घोषणा नहीं करता है। ज्‍योतिष की यह गणना मात्र एक संकेत की तरह ही होती है, इसके अनुसार अधिकतम संभावना के बारे में बताया जा सकता है, लेकिन न तो इसे अंतिम माना जाना चाहिए और न ही किसी प्रकार के निर्णय के लिए इस सलाह को काम में लिया जा सकता है। लिंग निर्धारण के बजाय संतान की संभावना के संबंध में सवाल पूछा जा सकता है।

पुत्र प्राप्ति के उपाय - putra ki prapti kaise kare upay | मनचाही संतान प्राप्ति के उपाय

पुत्र प्राप्ति के लिए सेक्स (सम्भोग) का समय | मनचाही संतान प्राप्ति के उपाय

पुत्र प्राप्ति के उपाय - putra ki prapti kaise kare upay

संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है. यानि प्रयत्न पूर्वक कर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है, कुछ लोग पुत्र-पुत्री में भेद नहीं करते, ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत कम है। यदि आप पुत्र चाहते हैं या पुत्री चाहते हैं तो कुछ तरीके यहां दिए जा रहे हैं, जिन पर अमल कर उसी तरीके से सम्भोग करें तो आप कुछ हद तक अपनी मनचाही संतान प्राप्त कर सकते हैं-
पुत्र प्राप्ति हेतु मासिक धर्म के चौथे दिन सहवास की रात्रि आने पर एक प्याला भरकर चावल का धोवन यानी मांड में एक नीबू का रस निचोड़कर पी जावें। अगर इच्छुक महिला रजोधर्म से मुक्ति पाकर लगातार तीन दिन चावल का धोवन यानी मांड में एक नीबू निचोड़कर पीने के बाद उत्साह से पति के साथ सहवास करे तो उसकी पुत्र की कामना के लिए भगवान को भी वरदान देना पड़ेगा। गर्भ न ठहरने तक प्रतिमाह यह प्रयोग तीन दिन तक करें, गर्भ ठहरने के बाद नहीं करें।

गर्भाधान के संबंध में आयुर्वेद में लिखा है कि गर्भाधान ऋतुकाल (मासिक धर्म) की आठवीं, दसवीं और बारहवीं रात्रि को ही किया जाना चाहिए। जिस दिन मासिक ऋतु स्राव शुरू हो, उस दिन तथा रात को प्रथम दिन या रात मानकर गिनती करना चाहिए। छठी, आठवीं आदि सम रात्रियां पुत्र उत्पत्ति के लिए और सातवीं, नौवीं आदि विषम रात्रियां पुत्री की उत्पत्ति के लिए होती हैं अतः जैसी संतान की इच्छा हो, उसी रात्रि को गर्भाधान करना चाहिए।

इस संबंध में एक और बात का ध्यान रखें कि इन रात्रियों के समय शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रात (पूर्णिमा) वाला पखवाड़ा भी हो, यह अनिवार्य है, यानी कृष्ण पक्ष की रातें हों तो गर्भाधान की इच्छा से सहवास न कर परिवार नियोजन के साधन अपनाना चाहिए।

शुक्ल पक्ष में जैसे-जैसे तिथियां बढ़ती हैं, वैसे-वैसे चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं। इसी प्रकार ऋतुकाल की रात्रियों का क्रम जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे पुत्र उत्पन्न होने की संभावना बढ़ती है, यानी छठवीं रात की अपेक्षा आठवीं, आठवीं की अपेक्षा दसवीं, दसवीं की अपेक्षा बारहवीं रात अधिक उपयुक्त होती है।

पूरे मास में इस विधि से किए गए सहवास के अलावा पुनः सहवास नहीं करना चाहिए, वरना घपला भी हो सकता है। ऋतु दर्शन के दिन से 16 रात्रियों में शुरू की चार रात्रियां, ग्यारहवीं व तेरहवीं और अमावस्या की रात्रि गर्भाधान के लिए वर्जित कही गई है। सिर्फ सम संख्या यानी छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं और चौदहवीं रात्रि को ही गर्भाधान संस्कार करना चाहिए।

गर्भाधान वाले दिन व रात्रि में आहार-विहार एवं आचार-विचार शुभ पवित्र रखते हुए मन में हर्ष व उत्साह रखना चाहिए। गर्भाधान के दिन से ही चावल की खीर, दूध, भात, शतावरी का चूर्ण दूध के साथ रात को सोते समय, प्रातः मक्खन-मिश्री, जरा सी पिसी काली मिर्च मिलाकर ऊपर से कच्चा नारियल व सौंफ खाते रहना चाहिए, यह पूरे नौ माह तक करना चाहिए, इससे होने वाली संतान गौरवर्ण, स्वस्थ, सुडौल होती है।
* गोराचन 30 ग्राम, गंजपीपल 10 ग्राम, असगंध 10 ग्राम, तीनों को बारीक पीसें, चौथे दिन स्नान के बाद पांच दिनों तक प्रयोग में लाएं, गर्भधारण के साथ ही पुत्र अवश्य पैदा होगा।

शक्तिशाली व गोरे पुत्र प्राप्ति के लिए—

गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एक कोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे | इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा | इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |
यदि आपकी संनात होती हो परन्तु जीवित न रहती हो तो सन्तान होने पर मिठाई के स्थान पर नमकीन बांटें। भगवान शिव का अभिषेक करायें तथा सूर्योदय के समय तिल के तेल का दीपक पीपल के पेड़ के पास जलायें, लाभ अवश्य होगा। मां दुर्गा के दरबार में सुहाग सामिग्री चढ़ाये तथा कुंजिका स्तात्र का पाठ करें तो भी अवश्य लाभ मिलेगा।

पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका

पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।

यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।

* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।

* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।

* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।

* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि
पूर्णरूप से की है।

गर्भाधान मुहूर्त—–

जिस स्त्री को जिस दिन मासिक धर्म हो,उससे चार रात्रि पश्चात सम रात्रि में जबकि शुभ ग्रह केन्द्र (१,४,७,१०) तथा त्रिकोण (१,५,९) में हों,तथा पाप ग्रह (३,६,११) में हों ऐसी लग्न में पुरुष को पुत्र प्राप्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ संगम करना चाहिये। मृगशिरा अनुराधा श्रवण रोहिणी हस्त तीनों उत्तरा स्वाति धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों में षष्ठी को छोड कर अन्य तिथियों में तथा दिनों में गर्भाधान करना चाहिये,भूल कर भी शनिवार मंगलवार गुरुवार को पुत्र प्राप्ति के लिये संगम नही करना चाहिये।

पुत्र प्राप्ति के अचूक ज्योतिषीय उपाय 
एवं हि जन्म समये बहुपूर्वजन्मकर्माजितं  दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः | 
ततद ग्रहोक्त जप दान शुभ क्रिया भिस्तददोषशान्तिमिह शंसतु  पुत्र सिद्धयै ||

अर्थात जन्म कुंडली से यह ज्ञात होता है कि पूर्व जन्मों के किन पापों के कारण संतान हीनता है | बाधाकारक ग्रहों या उनके देवताओं का जाप ,दान ,हवन आदि शुभ क्रियाओं के करने से पुत्र प्राप्ति होती है

अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आरही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये. यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं-

                 ||सहवास की कुछ राते-||

मासिक स्राव रुकने से अंतिम दिन (ऋतुकाल) के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।

पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।

छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।

आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।

सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।


पुरातन काल के लोग उपरोक्त नियम -संयम से संतान-उत्त्पति किया करते थे -

सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए, एम दम से नहीं उठना चाहिए- शास्त्र में कुछ ऐसे प्रमुख दोष बताये गए है जिनके कारण संतान की प्राप्ति नहीं होती या वंश वृद्धि रुक जाती है | इस समस्या के पीछे की वास्तविकता-क्या है इसका शास्त्रीय और ज्योतिषीय आधार क्या है ये आप अपनी जन्म कुंडली के द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते है -इसके लिए आप हरिवंश पुराण का पाठ या संतान गोपाल मंत्र का जाप करे-

पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता के साथ इस मंत्र का जप तुलसी की माला से करें-

संतान प्राप्ति गोपाल मन्त्र -

" ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।"

इस मंत्र का बार रोज 108 जाप करे और मंत्र जप के बाद भगवान से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला, सेहतमंद पुत्र की कामना करें-


तीन प्रकार की  वंध्या: संतान प्राप्ति की कामना मनु महाराज द्वारा वर्णित तीन नैसर्गिक इच्छाओं में से एक है। निःसंतान रहना एक भयंकर अभिशाप है। यह पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के फल है या फल का भोग है। संतान हो किंतु दुष्ट और कुल -कीर्तिनाशक हो तो यह स्थिति और अधिक कष्टदायक होती है। जिनके संतान नहीं होती है भारत में उनकी तीन श्रेणियां मानी जाती हैं।

1. जन्मवंध्या
2. काक वंध्या
3. मृतवत्सा।

1. काक वंध्या वह होती है जिसके केवल एक संतान होती है।
2. मृतवत्सा के संतान तो होती है पर जीवित नहीं रहती।
3. जन्मवंध्या के संतान होती ही नहीं। यहां तीनों श्रेणियों की स्त्रियों की इस अभिशाप से मुक्ति के कुछ टोटके दिए जा रहे हैं जिनका निष्ठापूर्वक प्रयोग करने से लाभ मिल सकता है।

जन्मवंध्या: रासना नामक एक जड़ी को रविवार के दिन जड़ डंठल और पत्ते सहित उखाड़ लाएं। इसे 11 वर्ष से कम आयु अर्थात कुमारी कन्या के हाथ से एक रंग की गाय के दूध् में पिसवा कर रख लें। ऋतु काल में मासिक धर्म के दिनों में इसे चार तोले के हिसाब से एक सप्ताह पीने से संतान उत्पन्न होती है। ध्यान रहे यह प्रयोग तीन चार बार दोहराना पड़ सकता है।

एक रुद्राक्ष और एक तोला सुगंध रासना को कुमारी कन्या के हाथ से एक रंग की गाय के दूध में पिसवा कर पीएं। ‘¬ ददन्महागणपते रक्षा-मृत मत्सुत देहि’ इस मंत्र से औषधि को 21 बार अभिमंत्रित कर ले।

काकवंध्या: काक वंध्या वह कहलाती है जिसके एक ही बार संतान हो। यदि ऐसी स्त्रियां संतान की इच्छा रखती हों तो ये प्रयोग करें। रवि पुष्य योग में दिन को असगंध की जड़ उखाड़ लाएं और भैंस के दूध के साथ पीस कर दो तोला रोज खाएं। विष्णुकांता की जड़ रविपुष्य के दिन ला कर पूर्वोक्त प्रकार से भैंस के दूध के साथ पीस पर भैंस के ही दूध के मक्खन के साथ सात दिन तक खाने से संतान प्राप्त होती है। यह प्रयोग ऋतुकाल में ही करें।

मृतवत्सा: मृतवत्सा वह होती है जिसके संतान होती तो अवश्य है परंतु जीवित नहीं रहती। इसमें गाय का घी काम में लिया जाना चाहिए। खास कर उसका जिसका बछड़ा जीवित हो।
मजीठ, मुरहठी, कूट, त्रिफला, मिश्री, खरैंटी, महामेदा, ककोली, क्षीर काकोली, असगंध की जड़, अजमोद, हल्दी, दारु हल्दी, हिंगु टुटकी, नीलकमल, कमोद, दाख, सफेद चंदन और लाल चंदन ये सब वस्तुएं चार-चार तोला लेकर कूट-छानकर एक किलो घी में मिलाकर उपलों पर मंदी आंच पर पकानी चाहिए। जब केवल घी की मात्रा के बराबर रह जाए तो छान कर रख लेना चाहिए। इसका प्रयोग पति-पत्नी दोनों करें तो पुत्र उत्पन्न होगा जो स्वस्थ तथा सुंदर होगा। जब तक इन वस्तुओं का सेवन किया जाए तब तक हल्का भोजन करना चाहिए। भगवान के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए दिन में सोने, तामसिक पदार्थों के सेवन, भय, चिंता, क्रोध आदि तथा तेज सर्दी और गर्मी से बचना चाहिए। कुछ और प्रयोग भी हैं जो इस प्रकार हैं।

ऋतु काल में नए नागकेसर के बारीक चूर्ण को गाय के घी के साथ मिला कर खाने से भी संतान प्राप्त होती है।
जटामांसी (एक जड़ी का नाम) को चावल के पानी के साथ पीने से संतान प्राप्त होती है।

मंगलवार को कुम्हार के घर जाएं और कुम्हार से प्रार्थना पूर्वक मिट्टी के बर्तन काटने वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भर कर उसमें डाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया मंगलवार को ही करें। अगर संभव हो तो पति-पत्नी रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही डोरे को हनुमान जी के चरणों में रख दें। बार-बार गर्भपात होने परमुलहठी, आंवला और सतावर को भली भांति पीस कर कपड़ाछान कर लें और इसका सेवन रविवार से प्रारंभ करें। गाय के दूध के साथ लगभग 6 ग्राम प्रतिदिन लें।

मंगलवार को लाल कपड़े में थोड़ा सा नमक बांध लें। इसके बाद हनुमान के मंदिर जाएं और पोटली को हनुमान जी के पैरों से स्पर्श कराएं। वापस आकर पोटली को गर्भिणी के पेट से बांध दें गर्भपात बंद हो जाएगा।
पुत्र-प्राप्ति शीतला-षष्ठी ब्रत
माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है। कहीं-कहीं इसे 'बासियौरा' नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये। इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है

पुत्र प्राप्ति हेतु
विजोरे की जड़ को दूध में पका कर घी में मिला कर पीएं। ऋतुकाल में इस प्रयोग को प्रारंभ कर सम संख्या वाले दिनों में समागम करने से पुत्र प्राप्त होता है।
पुत्राभिलाषियों को अपने घर में स्वर्ण अथवा चांदी से निर्मित सूर्य-यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। यंत्र के पूर्वाभिमुख बैठकर दीपक जलाकर यं त्रऔर सूर्य देव को प्रणाम करते हुए सूर्य मंत्र का 108 बार नित्य श्रद्धा से जप करना चाहिए। दीपक में चारों ओर बातियां (बत्तियां) होनी चाहिए। घृत का चतुर्मुखी दीपक जप-काल में प्रज्वलित रहना चाहिए।
षष्ठी देवी का एक वर्ष तक पूजन अर्चन करने से पुत्र-संतान की प्राप्ति होती है। ऊँ ह्रीं षष्ठी देव्यै स्वाहा मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जप करते हुए षष्ठी देवी चालीसा, षष्ठी देवी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। कथा भी पढ़नी सुननी चाहिए।
श्रावण शुक्ल एकादशी का पुत्रदा एकादशी व्रत पुत्र सुख देता है। व्रत संपूर्ण विधि से करें।
स्त्रियां पुत्रदायक मंगल व्रत कर सकती हैं जिसे बैशाख या अगहन मास में प्रारंभ करना चाहिए। व्रत वर्ष भर प्रत्येक मंगल को करें और नित्य मंगल की स्तुति करें।
जिसको पुत्र प्राप्त नहीं हो रहा है वह स्त्री रविवार को प्रातः काल उठकर सिर धोकर खुले बाल फैलाकर उगते सूर्य को अघ्र्य दे और उनसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना करे। इस प्रकार 16 रविवार तक करे तो सफलता निश्चित प्राप्त होती है
जिस स्त्री को पुत्र नहीं हो रहा हो वह अपने घर में 21 तोले का प्राण प्रतिष्ठित चैतन्य पारद शिवलिंग स्थापित कराए और प्रत्येक सोमवार को सिर धोकर पीठ पर बाल फैलाकर ‘ऊँ नमः शिवायः’ मंत्र से उस पारद शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाए और 7 बार उस जल का चरणामृत ले। इस प्रकार 16 सोमवार करे तो पुत्र प्राप्ति के लिए शंकर से की जाने वाली प्रार्थना अवश्य फलित होती है।
पति को चाहिए कि वह पत्नी को कम से कम 4 ( रत्ती का शुद्ध पुखराज स्वर्ण अंगूठी में गुरु पुष्य नक्षत्र में जड़वाकर तथा गुरु मंत्रों से अभिमंत्रित करवाकर शुभ मुहूर्त में पत्नी को धारण करवाए। इससे पुत्र प्राप्ति की संभावना बढ़ती है।
प्राण प्रतिठित संतानगोपाल यंत्र प्राप्त कर उसे एक थाली में पीले पुष्प की पंखुड़ियां डालकर स्थापित करें। यंत्र का पूजन पुष्प, कुंकुंम अक्षत से करें, दीपक लगाकर (यंत्र के दोनों ओर घी के दीपक लगाएं) निम्न मंत्र का पुत्र जीवा माला से एक माला जप नित्य करें। निरंतर 21 दिन तक करें तो सफलता प्राप्त होती है। ।।‘‘ऊँ हरिवंशाय पुत्रान् देहि देहि नमः।।’’ 21 दिन पश्चात यंत्र और माला बहते जल में प्रवाहित करे दें।
रक्त गुणा की जड़ को शुभ योग में प्राप्त कर तांबे की ताबीज में रखकर भुजा या कमर में धारण करने वाली स्त्री को पुत्र की प्राप्ति होती है।
एक बेदाग नीबू का पूरा रस निचोड़ लें। इसमें थोड़ा सा नमक स्वाद के अनुसार मिला लें। अब इस द्रव को लड्डू गोपाल के आगे थोड़ी देर के लिए रख दें। रात को सोने से पूर्व स्त्री इस द्रव को पी ले और पति-पत्नी अपने धर्म का पालन करें तो अवश्य पुत्र ही होगा। ध्यान रहे यह क्रिया केवल एक बार ही करनी है, बार-बार नहीं।
यदि संतान न हो रही हो तो मंगलवार को मिट्टी के बर्तन में शुद्ध शहद भर कर ढक्कन लगा कर श्मशान में गाड़ दें।
उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ ला कर पास रखें, संतान अवश्य होगी।
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में बोरिंग के पानी टैंक या कुएं का उत्तर-पश्चिम कोण में होना भी संतान उत्पत्ति में बाधक माना गया है। उपाय के लिए पांचमुखी हनुमान जी का चित्र ऐसे लगाएं कि वह पानी को देखें।
असगंध का भैंस के दूध के साथ सात दिन तक लें। यह उपाय पुष्य नक्षत्र में रविवार को शुरू करें। इससे पुत्र उत्पन्न होता है।
गोखरू, लाल मखाने, शतावर, कौंच के बीज, नाग बला और खरौंटी समान भाग में पीस कर रख लें। इस चूर्ण को रात्रि में पांच ग्राम दूध के साथ लें।
रविवार पुष्य योग के दिन (पुष्य नक्षत्र) सफेद आक की जड़ गले में बांधने से भी गर्भ की रक्षा होती है। इसके लिए धागा लाल ही प्रयोग करें।
‘‘ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रूं पुत्रं कुरु कुरु स्वाहा‘‘- यह जप यंत्र है। वांछित यंत्र स्वर्ण अथवा चांदी के अतिरिक्त स्वर्ण पालिश वाला यंत्र भी समान रूप से लाभकारी होता है। निःसंतान दंपतियों को सूर्य का स्तवन भी करना चाहिए जैसे सूर्याष्टक, सूर्यमंडलाष्टकम् आदि। इन स्तोत्रों का निरंतर श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ जातक को तु.रंत सुखानुभूति देता है। स्वरुचि के अनुसार सूर्य देवता की अन्य किसी भी स्तुति का पाठ कर सकते हैं। (पति पत्नी दोनों अथवा कोई भी एक)
किसी योग्य ज्योतिष के परामर्शानुसार अथवा कुलगुरु, पुरोहित से सलाह लेकर संतान गोपाल मंत्र का जप स्वयं करें अथवा योग्य, अनुभवी कर्मकांडी ब्राह्मण से विधि विधान के साथ करावें। मंत्रानुष्ठान एक लाख मंत्र जप शास्त्र सम्मत माना गया है। इसमें निश्चित समय, निश्चित स्थान, निश्चित आसन और निश्चित संख्या में प्रतिदिन जप करने का विधान है
संकल्प पूर्वक  शुक्ल पक्ष से गुरूवार के १६  नमक रहित मीठे व्रत रखें | केले की पूजा करें तथा ब्राह्मण बटुक को भोजन करा कर यथा योग्य दक्षिणा दें | १६ व्रतों के बाद उद्यापन कराएं  ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं गुरुवे नमः का जाप करें |
2. पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी में गुरु रत्न पुखराज स्वर्ण में विधिवत  धारण करें |
3. यजुर्वेद के मन्त्र दधि क्राणों ( २३/३२)  से हवन कराएं |
4. अथर्व वेद के मन्त्र  अयं ते योनि ( ३/२०/१) से जाप व हवन कराएं |

5 संतान गोपाल स्तोत्र

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि में तनयं कृष्ण त्वामहम शरणम गतः |

उपरोक्त मन्त्र की १०००  संख्या का जाप प्रतिदिन १०० दिन तक करें | तत्पश्चात १०००० मन्त्रों से हवन,१००० से तर्पण ,१०० से मार्जन तथा १० ब्राह्मणों को भोजन कराएं |

6    संतान गणपति स्तोत्र
श्री गणपति की दूर्वा से पूजा करें तथा उपरोक्त स्तोत्र का प्रति दिन ११ या २१ की संख्या में पाठ करें |

7. संतान कामेश्वरी प्रयोग
उपरोक्त यंत्र को शुभ मुहूर्त में अष्ट गंध से भोजपत्र पर बनाएँ तथा षोडशोपचार पूजा करें तथा  ॐ  क्लीं ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवति संतान कामेश्वरी गर्भविरोधम निरासय निरासय सम्यक शीघ्रं संतानमुत्पादयोत्पादय स्वाहा ,मन्त्र का नित्य जाप करें | ऋतु काल के बाद पति और पत्नी जौ के आटे में शक्कर मिला कर ७ गोलियाँ बना लें तथा उपरोक्त मन्त्र से २१ बार अभिमन्त्रित करके एक ही दिन में खा लें तो लाभ होगा | |

8.पुत्र प्रद प्रदोष व्रत ( निर्णयामृत )
शुक्ल  पक्ष की जिस त्रयोदशी को शनिवार हो उस दिन से साल भर यह प्रदोष व्रत करें|प्रातःस्नान करके पुत्र प्राप्ति हेतु व्रत का संकल्प करें | सूर्यास्त के समय शिवलिंग की भवाय भवनाशाय मन्त्र से पूजा करें  जौ का सत्तू ,घी ,शक्कर का भोग लगाएं | आठ दिशाओं में  दीपक रख कर  आठ -आठ बार प्रणाम करें | नंदी को जल व दूर्वा अर्पित करें तथ

9. पुत्र व्रत (वराह पुराण )
भाद्रपद कृष्ण सप्तमी को उपवास करके विष्णु का पूजन करें | अगले दिन ओम् क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी जन वल्लभाय  स्वाहा मन्त्र से तिलों की १०८ आहुति दे कर ब्राह्मण भोजन कराएं  | बिल्व फल खा कर षडरस भोजन करें | वर्ष भर प्रत्येक मास की सप्तमी को इसी प्रकार व्रत रखने से पुत्र प्राप्ति होगी

स्त्री की कुंडली में जो ग्रह निर्बल व पीड़ित होता है उसके महीने  में गर्भ  को भय रहता है अतः उस  महीने के अधिपति ग्रह से सम्बंधित पदार्थों का निम्न लिखित सारणी के अनुसार  दान करें जिस से गर्भ को भय नहीं रहेगा

गर्भ मास के अधिपति ग्रह व उनका दान
गर्भाधान से नवें महीने तक प्रत्येक मास के अधिपति ग्रह के पदार्थों का उनके वार में दान करने से गर्भ क्षय का भय नहीं रहता |  गर्भ मास के अधिपति ग्रह व उनके दान निम्नलिखित हैं:-

प्रथम मास: शुक्र  (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा शुक्रवार को  )
द्वितीय मास: मंग ( गुड ,ताम्बा ,सिन्दूर ,लाल वस्त्र , लाल फल व दक्षिणा मंगलवार को  )
तृतीय मास:   गुरु ( पीला वस्त्र ,हल्दी ,स्वर्ण , पपीता ,चने कि दाल , बेसन व दक्षिणा गुरूवार को  )
चतुर्थ मास: सूर् ( गुड ,  गेहूं ,ताम्बा ,सिन्दूर ,लाल वस्त्र , लाल फल व दक्षिणा रविवार को )
पंचम मास:  चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )
षष्ट मास: शनि ( काले तिल ,काले उडद ,तेल ,लोहा ,काला वस्त्र व दक्षिणा  शनिवार को )
सप्तम मास:  बुध( हरा वस्त्र ,मूंग ,कांसे का पात्र ,हरी सब्जियां  व दक्षिणा बुधवार को )
अष्टम मास:  गर्भाधानकालिक लग्नेश ग्रह  से सम्बंधित दान उसके वार में |यदि पता न हो तो अन्न ,वस्त्र व फल का दान अष्टम मास लगते ही कर  दें |
नवं मास: चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )

विशेष- प्रमुख ज्योतिष एवम आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार  रजस्वला स्त्री चौथे दिन शुद्ध होती है |  रजस्वला होने की तिथि से सोलह रात्रि के मध्य प्रथम तीन दिन का त्याग करके ऋतुकाल जानना चाहिए जिसमें पुरुष स्त्री के संयोग से गर्भ ठहरने की प्रबल संभावना रहती है |रजस्वला होने की तिथि से 4,6,8,10,12,14,16 वीं रात्रि अर्थात युग्म रात्रि को सहवास करने पर पुत्र तथा 5,7,9 वीं आदि विषम रात्रियों में सहवास करने पर कन्या संतिति के गर्भ में आने की संभावना रहती है| याज्ञवल्क्य के अनुसार स्त्रियों का ऋतुकाल 16 रात्रियों का होता है जिसके मध्य युग्म रात्रियों में निषेक करने से पुत्र प्राप्ति होती है |

वशिष्ठ के अनुसार उपरोक्त युग्म रात्रियों में पुरुष नक्षत्रों पुष्य ,हस्त,पुनर्वसु ,अभिजित,अनुराधा ,पूर्वा फाल्गुनी , पूर्वाषाढ़,पूर्वाभाद्रपद और अश्वनी में गर्भाधान  पुत्र कारक  होता है |  कन्या के लिए विषम रात्रियों में स्त्री कारक नक्षत्रों में गर्भाधान करना चाहिए | ज्योतिस्तत्व के अनुसार नंदा और भद्रा तिथियाँ पुत्र प्राप्ति के लिए और पूर्णा  व जया तिथियाँ कन्या प्राप्ति के लिए प्रशस्त होती हैं अतः इस तथ्य को भी ध्यान में रखने पर मनोनुकूल संतान प्राप्ति हो सकती है

मर्त्यः पितृणा मृणपाशबंधनाद्विमुच्यते पुत्र मुखावलोकनात | 
श्रद्धादिभिहर्येव मतोऽन्यभावतः प्राधान्यमस्येंत्य यमी रितोऽजंसा  ||

(  प्रश्न मार्ग )

पुत्र का मुख देखने से मनुष्य पितृ बंधन से मुक्त हो जाता है और वही पुत्र समय आने पर उसका श्राद्ध भी करता है| इसी लिए कुंडली में पुत्र भाव की प्रधानता होती है |
दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।

* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा. स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है.
कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए

शक्तिशाली व गोरे पुत्र प्राप्ति के लिए
गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एककोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे | इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा | इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |

- पुत्र प्राप्ति के लिए संतान गणपति स्तोत्र -
नमो स्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च ।
सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च ।।
गुरूदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते ।
गोप्याय गोपिताशेषभुवना चिदात्मने ।।
विŸवमूलाय भव्याय विŸवसृष्टिकराय ते ।
नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुण्डिने ।।
एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नम: ।
प्रपन्नजनपालाय प्रणतार्तिविनाशिने ।।
शरणं भव देवेश संतति सुदृढां कुरू ।
भवष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक ।।
ते सर्वे तव पूजार्थे निरता: स्युर्वरो मत: ।
पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धप्रदायकम् ।।

सप्ताह के 7 दिनों की रात्रियों के शुभ समय इस प्रकार हैं :
रवि >> 8 से 9 >> 1.30 से 5
सोम >> 10.30 se 12 >> 1.30 से 4
मंगल >> 7.30 से 9 >> 10.30 से 1.30
बुध >> 7.30 से 10 >> 3 से 4.30
गुरु >> 12 से 1.30 >> 3 से 4
शुक्र >> 9 से 10.30 >> 12 से 3.30
शनि >> 9 से 12

रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम 14 व अंतिम 15 मिनट का त्याग करके बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित करें पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में श्य्या पर चढ़े तत्पश्चात शय्या पर निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए :

अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्

‘हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओ
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरुण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें
चरक संहिता, शारीरस्थान : 8.8
दोंनो गर्भ विषय में मन लगाकर रहें ऐसा करने से तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज ग्रहण करती है विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है ||


एवं हि जन्म समये बहुपूर्वजन्मकर्माजितं  दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः |
ततद ग्रहोक्त जप दान शुभ क्रिया भिस्तददोषशान्तिमिह शंसतु  पुत्र सिद्धयै ||
अर्थात जन्म कुंडली से यह ज्ञात होता है कि पूर्व जन्मों के किन पापों के कारण संतान हीनता है | बाधाकारक ग्रहों या उनके देवताओं का जाप ,दान ,हवन आदि शुभ क्रियाओं के करने से पुत्र प्राप्ति होती है |

जन्मकुंडली में लग्नेश और पंचमेश का या पंचमेश और नवमेश का युति,दृष्टि या राशि सम्बन्ध शुभ भावों में हो |
लग्नेश पंचम भाव में मित्र ,उच्च राशि नवांश का हो |
पंचमेश पंचम भाव में ही स्थित हो |
पंचम भाव पर बलवान शुभ ग्रहों की पूर्ण दृष्टि हो |
जन्म कुंडली में गुरु स्व ,मित्र ,उच्च राशि नवांश का लग्न से शुभ भाव में स्थित हो |
एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो कर स्थित हों |
गुरु से पंचम भाव में शुभ ग्रह स्थित हो |
गुरु के अष्टक वर्ग में  पंचम स्थान में बलवान ग्रहों द्वारा प्रदत्त  पांच  या अधिक शुभ बिंदु हों |
सप्तमांश लग्न का स्वामी बलवान हो कर जन्म कुंडली में शुभ भाव में स्थित हो |


||संतान सुख हीनता के योग||
लग्न एवम चंद्रमा से पंचम भाव में निर्बल पाप ग्रह अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों ,पंचम भाव पाप  कर्तरी योग से पीड़ित हो , पंचमेश और गुरु  अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में लग्न से 6,8 12 वें भाव में स्थित हों , गुरु से पंचम में पाप ग्रह हो , षष्टेश अष्टमेश या द्वादशेश का सम्बन्ध पंचम भाव या उसके स्वामी से होता हो , सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में 6,8 12 वें भाव में  अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है | जितने अधिक कुयोग होंगे उतनी ही अधिक कठिनाई संतान प्राप्ति में होगी |
पंचम भाव में अल्पसुत राशि ( वृष ,सिंह कन्या ,वृश्चिक ) हो तथा उपरोक्त योगों में से कोई योग भी घटित होता हो तो कठिनता से संतान होती है |
गुरु के अष्टक वर्ग में गुरु से पंचम स्थान शुभ बिंदु से रहित हो तो संतानहीनता होती है |
सप्तमेश निर्बल हो कर पंचम भाव में हो तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है |
गुरु ,लग्नेश ,पंचमेश ,सप्तमेश चारों ही बलहीन हों तो अन्पतत्यता होती है |
गुरु ,लग्न व चन्द्र से पांचवें स्थान पर पाप ग्रह हों तो अन्पतत्यता होती है |
पुत्रेश पाप ग्रहों के मध्य हो तथा पुत्र स्थान पर पाप ग्रह हो ,शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अन्पतत्यता होती है

||संतान बाधा के कारण व निवारण के उपाय||
सर्वप्रथम पति और पत्नी की जन्म कुंडलियों से संतानोत्पत्ति की क्षमता पर विचार किया जाना चाहिए |जातकादेशमार्ग तथा फलदीपिका के अनुसार पुरुष की कुंडली में सूर्य स्पष्ट ,शुक्र स्पष्ट और गुरु स्पष्ट का योग करें |राशि का योग 12 से अधिक आये तो उसे 12 से भाग दें |शेष राशि ( बीज )तथा उसका नवांश दोनों विषम हों तो संतानोत्पत्ति की  पूर्ण क्षमता,एक सम एक विषम हो तो कम क्षमता तथा दोनों सम हों तो अक्षमता होती है | इसी प्रकार स्त्री की कुंडली से चन्द्र स्पष्ट ,मंगल स्पष्ट और गुरु स्पष्ट से विचार करें |शेष राशि( क्षेत्र ) तथा उसका नवांश दोनों सम  हों तो संतानोत्पत्ति की  पूर्ण क्षमता,एक सम एक विषम हो तो कम क्षमता तथा दोनों विषम  हों तो अक्षमता होती है | बीज तथा क्षेत्र का विचार करने से अक्षमता सिद्ध होती हो तथा उन पर पाप युति या दृष्टि भी हो तो उपाय करने पर भी लाभ की संभावना क्षीण  होती है ,शुभ युति दृष्टि होने पर शान्ति उपायों से और औषधि उपचार से लाभ होता है |  शुक्र से पुरुष की तथा मंगल से स्त्री की संतान उत्पन्न करने की क्षमता का विचार करें |

||कौन सा ग्रह सन्तान वाधा  कारक है और उपाय क्या||
1 सूर्य संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण पितृ पीड़ा है |
पितृ शान्ति के लिए गयाजी में पिंड दान कराएं |  हरिवंश पुराण का श्रवण करें |
सूर्य रत्न माणिक्य धारण करें |
रविवार को सूर्योदय के बाद गेंहु,गुड ,केसर ,लाल चन्दन ,लाल वस्त्र ,ताम्बा, सोना  तथा लाल रंग के फल दान करने चाहियें |
सूर्य के बीज मन्त्र ॐ  ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः  के 7000 की संख्या में जाप करने  से भी सूर्य कृत अरिष्टों की निवृति हो जाती है |
गायत्री जाप से , रविवार के मीठे व्रत रखने से तथा ताम्बे के पात्र में जल में  लाल चन्दन ,लाल पुष्प ड़ाल कर नित्य सूर्य को अर्घ्य  देने पर भी शुभ  फल प्राप्त होता है |
विधि पूर्वक बेल पत्र की जड़ को रविवार में लाल डोरे में धारण करने से भी सूर्य प्रसन्न हो कर शुभ फल दायक हो जाते हैं  |

2 चन्द्र संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण माता का शाप या माँ दुर्गा की अप्रसन्नता है  जिसकी शांति के लिए रामेश्वर तीर्थ का स्नान ,गायत्री का जाप करें |
श्वेत तथा गोल मोती चांदी की अंगूठी में रोहिणी ,हस्त ,श्रवण नक्षत्रों में जड़वा कर सोमवार या पूर्णिमा तिथि में पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका या कनिष्टिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप ,पुष्प ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |
सोमवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र का ११००० संख्या में जाप करें |सोमवार को चावल ,चीनी ,आटा, श्वेत वस्त्र ,दूध दही ,नमक ,चांदी  इत्यादि का दान करें |

3. मंगल संतान प्राप्ति में बाधक है
मंगल संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण भ्राता का शाप ,शत्रु का अभिचार या  श्री गणपति या श्री हनुमान की अवज्ञा होता है जिसकी शान्ति के लिए प्रदोष व्रत तथा रामायण का पाठ करें |लाल रंग का मूंगा  सोने या ताम्बे  की अंगूठी में  मृगशिरा ,चित्रा या अनुराधा नक्षत्रों में जड़वा कर मंगलवार  को सूर्योदय के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , लाल पुष्प, गुड  ,अक्षत आदि से पूजन कर लें
मंगलवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ  क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः  मन्त्र का १०००० संख्या में जाप करें | मंगलवार को गुड शक्कर ,लाल रंग का वस्त्र और फल ,ताम्बे का पात्र ,सिन्दूर ,लाल चन्दन केसर ,मसूर की दाल  इत्यादि का दान करें |

4. बुध संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण मामा का शाप ,तुलसी या भगवान विष्णु की अवज्ञा है
जिसकी शांति के लिए विष्णु पुराण का श्रवण ,विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें |
हरे  रंग का पन्ना सोने या चांदी की अंगूठी में आश्लेषा,ज्येष्ठा ,रेवती  नक्षत्रों में जड़वा कर बुधवार को सूर्योदय के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की कनिष्टिका अंगुली में धारण करें |
धारण करने से पहले ॐ  ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुधाय  नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , लाल पुष्प, गुड  ,अक्षत आदि से पूजन कर लें | बुधवार  के नमक रहित व्रत रखें ,  ॐ  ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुधाय  नमः मन्त्र का ९००० संख्या में जाप करें | बुधवार को कर्पूर,घी, खांड, ,हरे  रंग का वस्त्र और फल ,कांसे का पात्र ,साबुत मूंग  इत्यादि का दान करें | तुलसी को जल व दीप दान करना भी शुभ रहता है |

5. बृहस्पति संतान प्राप्ति में बाधक है
बृहस्पति संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण गुरु ,ब्राह्मण का शाप या फलदार वृक्ष को काटना है जिसकी शान्ति के लिए  पीत रंग का  पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी मेंपुनर्वसु ,विशाखा ,पूर्व भाद्रपद   नक्षत्रों में जड़वा कर गुरुवार को सूर्योदय के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , पीले पुष्प, हल्दी ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |पुखराज की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न सुनैला या पीला जरकन भी धारण कर सकते हैं | केले की जड़ गुरु पुष्य योग में धारण करें |गुरूवार के नमक रहित व्रत रखें ,  ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे  नमः मन्त्र का १९०००  की संख्या में जाप करें | गुरूवार को घी, हल्दी, चने की दाल ,बेसन पपीता ,पीत रंग का वस्त्र ,स्वर्ण, इत्यादि का दान करें |फलदार पेड़ सार्वजनिक स्थल पर लगाने से या ब्राह्मण विद्यार्थी को भोजन करा कर दक्षिणा देने और गुरु की पूजा सत्कार से भी बृहस्पति प्रसन्न हो कर शुभ फल देते हैं |

6. शुक्र संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण गौ -ब्राह्मण ,किसी साध्वी स्त्री को कष्ट देना या पुष्प युक्त पौधों को काटना है जिसकी शान्ति के लिए गौ दान ,ब्राह्मण दंपत्ति को वस्त्र फल आदि का दान ,श्वेत रंग का  हीरा प्लैटिनम या चांदी की अंगूठी में  पूर्व फाल्गुनी ,पूर्वाषाढ़ व भरणी नक्षत्रों में जड़वा कर शुक्रवार को सूर्योदय के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय  नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , श्वेत  पुष्प, अक्षत आदि से पूजन कर लें हीरे की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न श्वेत जरकन भी धारण कर सकते हैं |शुक्रवार  के नमक रहित व्रत रखे
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय  नमः मन्त्र का १६ ०००  की संख्या में जाप करें | शुक्रवार को  आटा ,चावल दूध ,दही, मिश्री ,श्वेत चन्दन ,इत्र, श्वेत रंग का वस्त्र ,चांदी इत्यादि का दान करें |

7.शनि संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण पीपल का वृक्ष काटना या प्रेत बाधा है जिसकी शान्ति के लिए पीपल के पेड़ लगवाएं,रुद्राभिषेक करें ,शनि की लोहे की मूर्ती तेल में डाल कर दान करें|  नीलम लोहे या सोने की अंगूठी में पुष्य ,अनुराधा ,उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर शनिवार  को  सूर्यास्त  के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  प्रां प्रीं प्रों  सः शनये  नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प,  काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|
नीलम की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न संग्लीली , लाजवर्त भी धारण कर सकते हैं | काले घोड़े कि नाल या नाव के नीचे के कील  का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है |शनिवार के नमक रहित व्रत रखें | ॐ  प्रां प्रीं प्रों  सः शनये  नमः मन्त्र का २३०००  की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,काले जूते ,काला कम्बल , काले  रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें |श्री हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करना भी शनि दोष शान्ति का उत्तम उपाय है |
पद्म पुराण में वर्णित शनि के  दशरथ को दिए गए वचन के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शनि की लोह प्रतिमा बनवा कर शमी पत्रों से उपरोक्त स्तोत्र द्वारा पूजन करके तिल ,काले उडद व लोहे का दान प्रतिमा सहित करता है तथा नित्य विशेषतः शनिवार को भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे दशा या गोचर में कभी शनि कृत पीड़ा नहीं होगी और शनि द्वारा सदैव उसकी रक्षा की जायेगी |

8. राहु संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण सर्प शाप है जिसकी शान्ति के लिए नाग पंचमी में नाग पूजा करें ,गोमेद पञ्च धातु की अंगूठी में आर्द्रा,स्वाती या शतभिषा नक्षत्र  में जड़वा कर शनिवार  को  सूर्यास्त  के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प,  काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|रांगे का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है | ॐ  भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र का १८००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,सतनाजा ,नारियल ,  रांगे की मछली ,नीले रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें | मछलियों को चारा देना भी राहु शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है |

9. केतु संतान प्राप्ति में बाधक है
तो कारण ब्राह्मण को कष्ट देना है जिसकी शान्ति के लिए ब्राह्मण का सत्कार करें , सतनाजा व नारियल का दान करें और ॐ स्रां  स्रीं  स्रों सः केतवे नमः का १७००० की संख्या

||संतान सुख की प्राप्ति के समय का निर्धारण||
पति और पत्नी दोनों की कुंडली का अवलोकन करके ही संतानप्राप्ति के समय का निर्धारण करना चाहिए |पंचम भाव में स्थित बलवान और शुभ फलदायक ग्रह ,पंचमेश और उसका नवांशेश ,पंचम भाव तथा पंचमेश को देखने वाले शुभ फलदायक ग्रह,पंचमेश से युक्त ग्रह ,सप्तमान्शेष ,बृहस्पति ,लग्नेश तथा सप्तमेश अपनी दशा अंतर्दशा प्रत्यंतर दशा में संतान सुख की प्राप्ति करा सकते हैं |

दशा के अतिरिक्त गोचर विचार भी करना चाहिए |
गुरु गोचर वश लग्न ,पंचम भाव ,पंचमेश से युति या दृष्टि सम्बन्ध करे तो संतान का सुख मिलता है |
लग्नेश तथा पंचमेश के राशि अंशों का योग करें |
प्राप्त राशि अंक से सप्तम या त्रिकोण स्थान पर गुरु का गोचर संतान प्राप्ति कराता है |
गोचर में लग्नेश और पंचमेश का युति , दृष्टि या राशि  सम्बन्ध हो तो संतानोत्पत्ति होती है |
पंचमेश लग्न में जाए या लग्नेश पंचम भाव में जाए तो संतान सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है |
बृहस्पति से पंचम भाव का स्वामी जिस राशि नवांश में है उस से त्रिकोण (पंचम ,नवम स्थान ) में गुरु का गोचर संतान प्रद होता है |
लग्नेश या पंचमेश अपनी राशि या उच्च राशि में भ्रमण शील हों तो संतान प्राप्ति हो सकती है | लग्नेश ,सप्तमेश तथा पंचमेश तीनों का  का गोचरवश युति दृष्टि या राशि सम्बन्ध बन रहा हो तो संतान लाभ होता है |

स्त्री की जन्म राशि से चन्द्र 1 ,2 ,4 ,5 ,7 ,9 ,1 2  वें स्थान पर हो तथा मंगल से दृष्ट हो और पुरुष जन्म राशि से चन्द्र 3 ,6 10 ,11 वें स्थान पर गुरु से दृष्ट हो तो स्त्री -पुरुष का संयोग गर्भ धारण कराने वाला होता है | आधान काल में गुरु लग्न ,पंचम या नवम में हो और पूर्ण चन्द्र व् शुक्र अपनी राशि के हो तो अवश्य संतान लाभ होता है |

||विलम्ब से सन्तान प्राप्ति||
सन्तान प्राप्ति के लिए मुख्य रूप से पञ्चम भाव, पञ्चमेश, पञ्चम भाव पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव एवं गुरु (बृहस्पति) का विचार किया जाता है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष, मिथुन, सिंह, कन्या ये चार राशियाँ अल्प प्रसव वाली राशियाँ मानी गयीं हैं । तथा वृषभ, कर्क, वृश्चिक, धनु, मीन ये बहुप्रसव वाली राशियाँ मानी हैं ।।
पञ्चम भाव में पाप ग्रह हो तो संतति सुख में बाधा आती है । परन्तु यदि अकेला राहू हो तो सुन्दर पुत्र का योग बनाता है । पञ्चमेश यदि 6, 8,12 वें घर में हो या 6, 8,12 वें घर के स्वामी पञ्चम में हो तो जातक का संतान सुख बाधित होता है । परन्तु यदि पञ्चमेश अशुभ नक्षत्र में हो तो संतान प्राप्ति में विलंब होता है ।।
मित्रों, राहू के विषय में एक और बात कही जाती है, कि पञ्चम का राहु पहली संतान के लिए अशुभ होता है । लग्न पर पाप प्रभाव हो तो भी सन्तान संतति विलंब से होती है । लग्न, षष्ठ, सप्तम तथा अष्टम स्थान का मंगल भी संतान प्राप्ति में विलंब कराता ही है । और मित्रों ये सूत्र स्त्री-पुरुष दोनों की कुंडली में समान रूप से लागू होता है ।।
स्त्री की कुण्डली में लग्न, पञ्चम, सप्तम, भाग्य अथवा लाभ भाव में शनि हो तो भी संतान देर से होती है । जन्म कुण्डली में सूर्य-शनि की युति भी संतान प्राप्ति में विलंब और संतान से मतभेद करवाती है । प्रथम या सप्तम का मंगल (पत्नी के लिए) कष्ट से संतान प्राप्ति का सूचक होता है ।।
पञ्चम भाव पर पापग्रहों की दृष्टि भी जातक के जीवन में संतान प्राप्ति में बिलम्ब करवाती है । अगर आपकी कुण्डली में गुरु राहु यु‍ति हो तथा पञ्चम भाव पाप प्रभाव में हो तो जातक के जीवन में स्वयं के सन्तान के जगह दत्तक सन्तान का योग बनता है ।

पंचम में कोण सा ग्रह होगा तो उसका क्या फ़ल होगा
पंचम ग्रह में राहु   :-
यदि शादी करते समय पंचम में राहु हो तो संतान में देरी होतीहै। इससे संतान के देरी से होने ,गिर जाने व् नही होने आदि जैसे योग बनते है। अतः पंचम राहु ज्यादातर पहला बच्चा कन्या होती है। और संतान के नही होने का एक कारण सर्प का शाप मन जाता है। इसलिये क्योकि इस जन्म में या अगले जन्म में सांप को या उसके बच्चे को मर देने के कारण देरी होती है। ऐसे में दोष दूर करने के लिए नागदेव कि पूजा करने से पुत्र कि प्राप्ति होती है।

पंचम ग्रह में केतु    :- 
संतान के भाव में केतु हो तो पुत्र प्राप्ति में बाधा आती है। महर्षि गर्ग ने इसके बारे में कुछ इस तरह कहा है।
        'पुत्रे केतो प्रजाहानी -विधाज्ञानविवर्जित।
         भयत्रासी सदा दुखी विदेशगमने रतः।।
पंचम भाव में केतु के कारण संतान को हानि होती है। ऎसे में सन्तानेश स्वग्रही हो तो संतान पर सौम्य ग्रह कि दिशा उसकी दशा - अन्तर्दशा में संतान योग बन जाता है।

पंचम ग्रह में सूर्य :-             
पंचम के सूर्य के फल महर्षियो के अनुसार अच्छे परिणाम नही बताए जाते।
'अंसुतः धनवर्जित: त्रिकोण।।
जिसकी जन्मपत्री में पंचम में सूर्य हो तो वह पुत्र रहित और धन हिन् रहता है। ऐसा भी देखने में आया है। कि सूर्य के पंचम में होने से पहले पुत्र कि प्राप्ति सम्भव है।

पंचम ग्रह में मंगल :-
पांचवे ग्रह में मंगल होने के अच्छे परिणाम नही बताऐ गये है। ज्योतिष कि प्रमुख पुस्तको के अनुसार :-
'तनय भवन संस्थे,भूमि पुत्रे
मनुष्यो ब्वति तनय हीनः दुखी।
यदि निज गृह तुगे वर्तते भूमि पुत्रः
क्रशमलयुतगांत्र पुत्रमेके ददाति।।'
यदि संतान के भाव में मंगल हो तो जातक पुत्र हिन् और दुखी रहता है। लेकिन पंचम में मंगल होने पर पुत्र योग बनता है। पर जातक संतान के कारण तनाव में रहता है।

पंचम ग्रह में शनि  :-
शादी के वक्त पंचम भाव में शनि संतान के लिए लाभकारी सिद्ध नही है। पंचम भाव में यदि शनि शत्रु ग्रह में हो तो जातक पुत्र और आर्थिक रूप से दुखी रहता है। यदि शनि अपने मित्र या फिर उच्च स्थान पर हो तभी एक पुत्र कि प्राप्ति सम्भव है। नवांश में उच्च स्थिति पर हो तो संतान कि प्राप्ति सम्भव है।

संतान कब होगी
(1) यदि गोचर में गुरु का पंचम स्थान हो यो पुत्र कि प्राप्ति सम्भव है।
(2) जो ग्रह पंचम में स्थित हो तो उसकी दिशा में संतान के योग बनने कि आशा है।
(3) पंचम में स्वामी कि दिशा के होने पर संतान के योग बन जाते है।

क्या आप जानना चाहते है की आप के यहाँ पुत्र होगा या पुत्री
एवं हि जन्म समये बहुपूर्वजन्मकर्माजितं  दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः |
ततद ग्रहोक्त जप दान शुभ क्रिया भिस्तददोषशान्तिमिह शंसतु  पुत्र सिद्धयै ||
अर्थात जन्म कुंडली से यह ज्ञात होता है कि पूर्व जन्मों के किन पापों के कारण संतान हीनता है

|| लड़का होगा या लड़की होगी ||

सूत्र-1-आपकी भाभी, बहन या कोई महिला गर्भवती है भी कि नहीं, यह जानने के लिए दिन की संख्या लिखें
(ए), इसे तीन से गुणा करें। अब इसमें तिथि की संख्या जोड़ें (बी) = कुल अंक (सी), इसमें दो का भाग दें।
यदि एक बचे तो महिला गर्भवती है, शून्य बचे तो गर्भवती नहीं है।
उदाहरण-
मान लीजिए कि किसी ने सोमवार को सवाल किया है और उस दिन अमावस के पहले की द्वादशी है।
तो इसका इस तरह योग करेंगे। सोमवार के लिए संख्या 2×3=6+27 कृष्णा 12 (15+12) कुल अंक 33/2, बचा एक, यानि महिला गर्भवती है।

अच्छी तरह समझ लें कि हमेशा रविवार की संख्या एक होगी। दिन कोई हो, उसकी गिनती रविवार से करें, जैसे कि गुरुवार है किसी दिन तो उस दिन का अंक होगा पांच। इसी तरह उपरोक्त उदाहरण में कृष्ण पक्ष की द्वादशी ली गयी है, इसकी गिनती होगी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से। इसका अंक होगा एक
और कृष्ण द्वादशी है तो पूरनमासी तक के पंद्रह अंक और इसके बाद द्वादशी तक के बारह अंक।
इस तरह कुल अंक होंगे 27.

अब पता लगाते हैं कि गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की।
इसके लिए इनकी संख्या जोड़ें-

दिन+तिथि+नक्षत्र+योग+गर्भवती स्त्री के नाम के अंक,
अब इसमें 7 का भाग दें।
यदि 1,3,5 संख्या बचे तो लड़का गर्भ में पल रहा है और 2,4,6 बचे तो गर्भ में लड़की पल रही है।
याद रखिए कि नक्षत्र 27 होते हैं।
हमेशा अश्विनी नक्षत्र से गिनती शुरू करनी है
और इसका एक नंबर लेना है।
अंतिम नक्षत्र रेवती होता है. जिसका नंबर होता है 27.
इसी प्रकार योग भी 27 होते हैं।
पहला योग होता है विषकुंभ, इसका नंबर है 1,
और

अंतिम योग है वैधृति, इसका नंबर है 27,
इसी प्रकार नाम के नंबर हिंदी नाम के ही लेने हैं।
जैसे नाम है भारती तो इसके अंक हुए 3,
दिन सोमवार 2+ तिथि 27(कृष्ण 12 )+ नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी 12+ योग वैधृति 27+ गर्भवती का नाम (भारती) 3=71/ 7, शेष बचा 1, इसका मतलब है कि उसके लड़का होगा।
मेरे पास एक सज्जन आए और पत्नी के गर्भ के बारे में पूछने लगे।
उनका कहना था कि वह इसलिए चिंता में हैं कि पिछली बार का गर्भ गिर गया था।
उन्होंने पत्नी का नाम रोमा बताया।
मैंने तत्काल गणना की।
यह 27 जुलाई 2013 की बात है।
दिन शनिवार 7+21 (तिथि कृष्णा 6) + 26 नक्षत्र (उत्तरा भाद्रपद)+7 योग (सुकर्मा)+2 रोमाँ नाम के अंक।
कुल अंक हुए 63/7, लिहाजा सात का भाग देने पर शून्य बचा।

मैंने कहा कि बच्चे का बचना मुश्किल है।
आप अपने डाक्टर से सलाह लें।
उन्होंने बताया कि डाक्टर ने भी ऐसा ही बताया है।
कुछ दिन बाद पता कि उस महिला का फिर से एबार्शन हुआ है।
दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

|| गर्भ धारण करने के अचूक नुस्खे ||
* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिये

||शक्तिशाली व गोरे पुत्र प्राप्ति के लिए||
गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एककोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे | इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा | इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |
 योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा. स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है.

योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये. इस स्थिति मे स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा. इस स्थिति में अगर गर्भादान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान प्राप्त होगी.

मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता को प्राप्त होता है. पांचवी रात्रि में संभोग से कन्या, छठी रात्रि में पुत्र, सातवी रात्रि में बंध्या पुत्री, आठवीं रात्रि के संभोग से ऐश्वर्यशाली पुत्र, नवी रात्रि में ऐश्वर्यशालिनी पुत्री, दसवीं रात्रि के संभोग से अति श्रेष्ठ पुत्र, ग्यारहवीं रात्रि के संभोग से सुंदर पर संदिग्ध आचरण वाली कन्या, बारहवीं रात्रि से श्रेष्ठ और गुणवान पुत्र, तेरहवी रात्रि में चिंतावर्धक कन्या एवम चौदहवीं रात्रि के संभोग से सदगुणी और बलवान पुत्र की प्राप्ति होती है. पंद्रहवीं रात्रि के संभोग से लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री और सोलहवीं रात्रि के संभोग से गर्भाधान होने पर सर्वज्ञ पुत्र संतान की प्राप्ति होती है. इसके बाद की अक्सर संतान नही होती. अत: इच्छित संतान प्राप्ति के लिए उपरोक्त तथ्यों का ध्यान रखते हुये बताये गये स्वरों के अनुसार कर्म करना चाहिये.

जिन लोगों को सुंदर, दिर्घायु और स्वस्थ संतान चाहिये उन्हें गडांत, ग्रहण, सूर्योदय एवम सूर्यास्त्काल, निधन नक्षत्र, रिक्ता तिथि, दिवाकाल, भद्रा, पर्वकाल, अमावस्या, श्राद्ध के दिन, गंड तिथि, गंड नक्षत्र तथा आंठवें चंद्रमा का त्याग करके शुभ मुहुर्त में संभोग करना चाहिये.

पुरातन काल में दंपति आज की तरह हर रात्रि को नही मिलते थे सिर्फ़ उनका सहवास सिर्फ़ संतान प्राप्ति के उद्देष्य के लिये होता था. शुभ दिन और शुभ मुहुर्त के संभोग से वो योग्य संतान प्राप्त कर लेते थे. वर्तमान काल में युवा पीढी की उदंडता, अनुशासनहीनता, लडाई झाग्डे की प्रवॄति वाले उग्रवादी होने के लिये वास्तव में उनके माता पिता ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वे किसी भी दिन, किसी भी समय संभोग करके गर्भ धारण करके संतान पैदा कर लेते हैं.

ऋषि कश्यप और उनकी स्त्री दिति इसके ज्वलंत उदाहरण हैं एक दिवस महर्षि कश्यप संध्या समय नदी तट पर संध्या हेतु जा रहे थे कि उसी समय उनकी पत्नि दिति ने कामाभिभूत होकर महर्षि कश्यप को सहवास के लिये निमंत्रण देकर उन्हें ऐसा करने के लिये बाध्य कर दिया. इस संध्या काल के गर्भाधान की वजह से ही दिति ने हिरणकश्यप जैसी राक्षस संतान पैदा की.

दिति की बहिन एवम महर्षि कश्यप की द्वितीय पत्नि अदिति धार्मिक नियमों का पालन करते हुये केवल रात्रि के शुभ मुहुर्तों में ही संभोग रत होते थे अत: अदिति की गर्भ से सारी देवता संताने ही पैदा हुई.

गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.

यदि पति पत्नि संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं, इस काल में गर्भादान की संभावना नही के बराबर होती है.

तीन चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये. अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है. इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये. इसका गर्भस्थ शिशि पर अत्यंत प्रभावकारी असर पदता है, अभिमन्यु का उदाहरण सभी जानते हैं.

अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आरही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये. यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं.
Beeja & Kshetra Sphuta-The Astrology of Sperm & Ovary
Horary Chart for Progeny, Computation of Beeja, Kshetra and Santhana Sphutas

संतान योग को अच्छी तरीके से पता लगा सकते हैं इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट । बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के  ग्रहो की स्तिथि से हैं । अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते है यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी बीज बो देवे उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो अशुभ फल होंगे और बीज अशुभ होगा।

स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा और भोग अंशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्तपन्न करने में सक्षम नही होगी।

Three important sphutas are considered in this regard: (i) Beeja (seed) sphuta, (ii) Kshetra (field) sphuta, and (iii) Putra tithi (opportune date for impregnation) sphuta. Beeja sphuta is obtained by adding the longitude of Sun, Venus and Jupiter in the husband's chart. The sum indicates a sign and its Navamsa. If both of these are in odd signs, virility is present and the chances of an offspring are good. If both are in even signs, virility and the chance of progeny are both absent. If one is odd and the other is even, the progeny may be delayed. Kshetra sphuta is worked out by adding the longitudes of Jupiter, Moon and Mars in the wife's natal chart. If the sign and Navamsa thus obtained are both in even signs, fertility and chances of progeny are assured. In case both are in odd signs, the progeny will be delayed or even denied. If one is odd and the other is even, there may be a delay but the progeny can be expected.

Putra tithe sphuta is decisive in progeny prediction. It is determined as follows: Multiply the longitudes of natal Moon and Sun separately by 5, subtract the result obtained from Sun from that of Moon, and convert the result into degrees, minutes, etc. Divide it by 12. The quotient plus 1 gives the tithe required. If this is less than 15, it is deemed to be in the dark half ,and if the remainder is less than 6, the tithe is in the first half. If it is more than 6, it would be in the second half.Impregnation during this period has greater chance of fertilization.

Though the 5th house maybe strong and all indications for birth or children maybe present, there will be no issues if there is no strength or vitality for Beeja and Kshetra. Beeja is the seed of the male and Kshetra is the bed of the woman. In other words Beeja and Kshetra represent, not exactly the sperm and the ovum, but the element that really makes the male and female fluids fertile.------------ if the Beeja and Kshetra in their horoscopes are not strong, when judged according to astrological rules, they will not bring forth any issues.
When the Beeja (male) is weak and Kshetra (female) is strong, then children may be born late in the life after undertaking the necessary remedial measures. The strength to cause pregnancy is controlled by the Sun – lord of vitality – in general. Venus governs the seminal fluid. These two must have favorable positions in the horoscope particularly in odd signs. Similarly, in the case of a female, Mars governs the nature of blood and the Moon
controls the strength to bear children. These two planets should preferably occupy even signs. In case of a male, add together the longitude of Sun, Venus and Jupiter. Expunge
multiples of 360 degrees. The sign arrived at indicates what is called “Beeja Sphuta” or longitude of seed. Similarly in a female horoscope add together the longitude of Mars, Moon and Jupiter. Expunge multiples of 360 degrees. The sign arrived at represents the
longitude of the bed or “Kshetra Sphuta”


 For males, flow of seminal fluid is controlled by Venus and power to help in causing pregnancy is governed by the Sun who is the lord of vitality. These two planets must have good placements preferably in odd signs with benefic associations and aspects for males—for females, it will be worthwhile to mention that Moon gives strength to conceive and bear the children and also regulates and controls the flow and cycle of menstruation; whereas Mars, in case of females, plays very important role and is responsible for quality and superiority of blood. As such for females, the Moon and Mars should preferably find good placement in their horoscopes in even signs with benefic associations and aspects. Jupiter who is a natural significator for issues for both males and females should find good placement in horoscopes. Considering the above facts, Beeja Sphuta for males is worked out from the longitudes of Sun, Venus and Jupiter; and, in case of females, Kshetra Sphuta is worked out from the longitudes of Moon, Mars and Jupiter.
      Following table will be useful and enable the readers to work out Beeja Sphuta and Kshetra Sphuta for forecasting the results regarding issues:

In case ofAdd Longitude of natal planets      Resulting Sign/NavamsaResultsmales  Jupiter, Sun & Venusboth odd virility assured   Expunging 12 signsodd/ even                                       mixed resultseven/odddoubtfulboth evenvirility nil
females  Jupiter, Moon & Marsboth evenfecundity assured   Expunge 12 signseven & oddchildren afterodd/ evengreat effortsboth oddfecundity nil
Childless couples may come to the astro scholar to check about the cause of the lack of progeny. The scholar will have to anlayse the House of Progreny, the positions of Jupiter and Venus and compute longitudes like Beeja,Kshetra, Santhana etc.


Santhana Prasna - Progeny Horary

We have to calculate the male Beeja Sphuta, which is the combined longitudes of Jupiter,
Venus and Sun. And the female Kshetra Sphuta, which is the combined longitudes of Moon,
Mars and Jupiter.

The longitudes of Sun  Venus  Jupiter
Is  Beeja Sphuta called- O Noble One!
Moon Mars Jupiter collective is female
Kshetra Sphuta, used in Progeny Horary


Beeja Sphuta    =  Long Venus + Long Sun + Long  Jupiter

Kshetra Sphuta = Long Moon + Long Mars + Long Jupiter

If Beeja Sphuta is  in  an Oja Rasi ( Odd Sign ) & Kshetra Sphuta is  in an Even Sign ( Yugma Rasi ), auspiciousness is indicated.

Well, these are the saying of the wise, the pramanas, for the lack of progeny.
This checks for some blocks regarding Fifth House Query

If Rahu be in House Fifth or with the Fifth lord
With malefic aspect;curse serpentine for progeny lack

If Saturn be in trines with his son from Aroodha
With malefic aspect;curse paternal for progeny lack

If Fifth lord be in Ninth from Aroodha Ascendant With malefic aspect; Deities curse for progeny lack

If Fifth lord be with Mars from Aroodha Ascendant With malefic aspect; Enemies curse for progeny lack

If Sixth lord be with Mars in House Number Five With malefic aspect; Enemies cause for progeny lack

If Fifth lord be with Saturn from Aroodha Ascendant If Fourth be afflicted; Maternal curse for progeny lack


If Fifth lord be with Saturn  & Gulika from AL trinal If Ninth be afflicted; Paternal curse for progeny lack

Santhana Thidhi

If we multiply the longitude of the Moon by 5, we get the Santhana Chandra Sphuta
If we multiply the longitude of the Sun by 5, we get the Santhana Ravi Sphuta

Since snm-sns = Lunation ( longitude of the moon - longitude of the sun ),
thidhi, Santhana Thidhi is given by the formula


Santhana Thidhi = Long Moon*5 - Long Sun*5


The Santhana Thithi should be < 180 degrees ( Shukla Paksha or Waxing Moon Fortnight ).

If greater than 180 problems seen as it is Krishna Paksha or Waning Moon Fortnight.

If Santhana Thithi > 240 degrees negativity is indicated.

Santhana Lagna  Thidhi

Santhana Lagna Thidhi = Long ( Moon ) - Long ( Ascendant )

Check the Fifth House for Negativity Factors

If Santhana Tidhi Rasi is aspected by benefics - some hope.  Not so if it is aspected by malefics.

If Santhana Thidhi falls in Waxing Moon
Probability of getting a child is high
Difficult if it falls in Waning Moon
And remote if it is after Lunation Fifth !

If ( in Waning Moon ) after Lunation Eighth
Worship the Lord of the Mountains ( Siva ) !
In Lunation Sixth, Lord Karthikeya
And Ganesh, if in Lunation Fourth !

If in Lunation Eighth, do Brahmakoorcha
Also the same in Lunation Fourteen
In Lunation Tenth do Ashtaka
And in New Moon do Parvana, O Noble One!

All lunations in Waxing Moon positive
With Vishnu's Grace it will be received !
If in Lion's & Tiger's Karana
Indicates enemy trouble of a major sort !

If indications are negative, go for  Solution - Those difficulties  can be overcome by Santhana Gopala Homa  
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