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पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

ये शायद मेरा सबसे महत्वकांक्षी लेख है। हम लोगों ने कई बार रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कहानियों में योद्धाओं के ओहदे के बारे में पढ़ा है। सबसे आम शब्द जो इन पुस्तकों में आता है वह है "महारथी" और ये शब्द इतना आम बना  दिया गया है कि किसी भी योध्या के लिए हम महारथी शब्द का प्रयोग कर लेते है जबकि यह एक बहुत बड़ी पदवी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर तक पहुच पाते थे। क्या आपको पता है कि इन श्रेणिओं को पाने के लिए भी कुछ योग्यता जरुरी होती थी? अगर नहीं तो आज हम पौराणिक काल के योद्धाओं के स्तर के बारे में जानेंगे।

यहाँ मैं विशेष रूप से अनुरोध करना चाहूंगा कि कृपया रामायण और महाभारत के योद्धाओं की आपस में तुलना न करें। उनका बल उनके काल में उनके समकक्ष योद्धाओं के लिहाज से देखें। अन्यथा रामायण काल के सामान्य योद्धा भी महाभारत काल के महारथी से अधिक शक्तिशाली थे। उसी प्रकार किसी देवता की तुलना साधारण मनुष्य से ना करें। उनका बल भी उनके समक्ष देवताओं अथवा दानवों के सन्दर्भ में है। ये भी ध्यान रखें कि किसी भी योद्धा को केवल उसके शारीरिक बल से नहीं अपितु उसके द्वारा प्राप्त दिव्यास्त्रों के आधार पर भी प्रमाणित किया जाता था।

1. अर्धरथी: 

अर्धरथी एक प्रशिक्षित योद्धा होता था जो एक से अधिक अस्त्र अथवा शास्त्रों का प्रयोग जनता हो तथा वो युद्ध में एक साथ २५०० सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो। रामायण और महाभारत की बात करें तो इन युद्धों में असंख्य अर्धरथियों ने हिस्सा लिया था। उल्लेखनीय है कि महाभारत युद्ध में योद्धओं के बल का वर्णण करते हुए पितामह भीष्म ने कर्ण की गिनती एक अर्धरथी के रूप में की थी और इस अपमान के कारण कर्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक भीष्म पितामह जीवित रहेंगे वो महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लेगा।

2. रथी: 

एक ऐसा योद्धा जो दो अर्धरथियों या ५००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सके। इसके अतिरिक्त उसकी योग्यता एवं निपुणता कम से कम दो अस्त्र एवं दो शस्त्र चलाने में हो। महाभारतकाल में दुर्योधन एवं दुःशासन को छोड़ कर सारे कौरव रथी थे। इसके अलावा द्रौपदी के पांचो पुत्र (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक एवं श्रुतसेन), जयद्रथ, शकुनि एवं उसका पुत्र उलूक, युयुत्सु, सुदक्षिण, विराट के पुत्र राजकुमार उत्तर, शंख, शतानीक एवं श्वेत, अर्जुन का पुत्र इरावान, वृषसेन को छोड़ कर्ण के सभी पुत्र, दुर्योधन एवं दुःशाशन के सभी पुत्र, सुशर्मा, उत्तमौजा, युधामन्यु, जरासंध पुत्र सहदेव, बाह्लीक पुत्र सोमदत्त, कंस आदि की गिनती रथी के रूप में होती थी। रामायण में असंख्य रथियों ने हिस्सा लिया जिनका विस्तृत वर्णण नहीं मिलता है। राक्षसों में खर और दूषण, वातापि आदि रथी थे। वानरों में गंधमादन, मैन्द एवं द्विविन्द, हनुमान के पुत्र मकरध्वज, शरभ एवं सुषेण को रथी माना जाता था। 

3. अतिरथी: 

एक ऐसा योद्धा जो अनेक अस्त्र एवं शस्त्रों को चलने में माहिर हो तथा युद्ध में १२ रथियों या ६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सकता हो। महाभारत काल में युधिष्टिर, नकुल, सहदेव, घटोत्कच, दुःशाशन, विराट, द्रुपद, धृष्टधुम्न, शिखंडी, कर्ण का पुत्र वृषसेन, मद्रराज शल्य, कृतवर्मा, भूरिश्रवा, कृपाचार्य, शिशुपाल एवं उसका पुत्र धृष्टकेतु, रुक्मी, शिखंडी, सात्यिकी, भीष्म के चाचा बाह्लीक, नरकासुर, राक्षस अलम्बुष, प्रद्युम्न, कीचक एवं अलायुध आदि अतिरथी थे। रामायण काल में अंगद, नल, नील, प्रहस्त, अकम्पन, शत्रुघ्न, भरत पुत्र पुष्कल, विभीषण, हनुमान के पिता केसरी, ताड़का एवं उसका पुत्र मारीच आदि की गिनती अतिरथी में होती थी।

4. महारथी:

ये संभवतः सबसे प्रसिद्ध पदवी थी और जो भी योद्धा इस पदवी को प्राप्त करते थे वे पुरे विश्व में सम्मानित और प्रसिद्ध होते थे। महारथी एक ऐसा योद्धा होता था जो सभी ज्ञात अस्त्र शस्त्रों को चलने में माहिर होता था और इसके अतिरिक्त उनके पास सामान्य अस्त्रों से ऊपर कुछ दिव्यास्त्रों का ज्ञान होता था। युद्ध में महारथी १२ अतिरथियों अथवा ७२०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। इसके अतिरिक्त जिस भी योद्धा के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान होता था (जो गिने चुने ही थे) वो सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे। साधारणतयः अधिकतर बड़े योद्धाओं को महारथी कह के बुलाया जाता है लेकिन असल में गिनती के कुछ योद्धा होते थे जो महारथी की पदवी हासिल करते थे। महाभारत में दुर्योधन, अश्वत्थामा, भगदत्त, जरासंध, अभिमन्यु, बर्बरीक आदि को महारथी के श्रेणी में रखा जाता है। भीम को १८ अतिरथियों के बराबर, बलराम, गुरु द्रोण, अर्जुन एवं कर्ण को दो-दो महारथियों के समान तथा पितामह भीष्म को तीन महारथियों के समकक्ष माना जाता है। रामायण काल में भरत, ऋक्षराज जामवंत, सुग्रीव, लव, कुश, अतिकाय आदि महारथी की श्रेणी में आते हैं। कुम्भकर्ण को तीन, रावण को चार तथा बालि एवं कर्त्यवीर्य अर्जुन को छः महारथियों के समान माना जाता है। अन्य योद्धाओं में लक्ष्मण, हनुमान एवं परशुराम के विषय में थोड़ा मतभेद है। अधिकतर जगह इन्हे अतिमहारथी की श्रेणी मिली है तो कुछ जगह इन्हे ९ महारथियों के बराबर माना जाता है।

5. अतिमहारथी: 

इस श्रेणी के योद्धा दुर्लभ होते थे। अतिमहारथी उसे कहा जाता था जो १२ महारथी श्रेणी के योद्धाओं अर्थात ८६४०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो साथ ही सभी प्रकार के दैवीय शक्तियों का ज्ञाता हो। महाभारत में अतिमहारथी योद्धाओं का कोई प्रामाणिक सन्दर्भ नहीं मिलता है पर कुछ ग्रन्थ में भीष्म को (प्रस्वपास्त्र के ज्ञान और परशुराम को परास्त करने के कारण) और अर्जुन को (पाशुपतास्त्र के ज्ञान के कारण) अतिमहारथी श्रेणी में रखने का तर्क दिया जाता है। कर्ण (ब्रम्हास्त्र के अतिरिक्त भार्गवास्त्र का ज्ञान पर कई श्राप), द्रोण और बलराम के बारे में भी कोई सटीक जानकारी नहीं मिलती। केवल रामायण काल में मेघनाद की गिनती निर्विवाद रूप से अतिमहारथी में की जाती है क्यूंकि ऐसा कोई भी दिव्यास्त्र नहीं था जिसका ज्ञान उसे ना था विशेषकर वो तीनों महास्त्र - ब्रम्हास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र का ज्ञाता था। केवल पाशुपतास्त्र को छोड़ कर लक्ष्मण को भी समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था अतः उसे भी  इस श्रेणी में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के अवतार विशेषकर वाराह, नृसिंह, राम, कृष्ण एवं कहीं-कहीं परशुराम को भी अतिमहारथी की श्रेणी में रखा जाता है। देवताओं में कार्तिकेय, गणेश तथा वैदिक युग में इंद्र, सूर्य, यम, अग्नि एवं वरुण को भी अतिमहारथी माना जाता है। आदिशक्ति की दस महाविद्याओं और रुद्रावतार विशेषकर वीरभद्र और हनुमान को भी अतिमहारथी कहा जाता है।

6. महामहारथी: 

ये किसी भी प्रकार के योद्धा का उच्चतम स्तर माना जाता है। महामहारथी उसे कहा जाता है जो २४ अतिमहारथियों अर्थात २०७३६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता हो। इसके साथ ही समस्त प्रकार की दैवीय एवं महाशक्तियाँ उसके अधीन हो। आजतक पृथ्वी पर कोई भी योद्धा अथवा कोई अवतार इस स्तर का नहीं हुआ है। इसका एक कारण ये भी है कि अभी तक २४ अतिमहारथी एक काल में तो क्या पूरे कल्प में भी नहीं हुए हैं। केवल त्रिदेवों (ब्रम्हा, विष्णु एवं रूद्र) एवं आदिशक्ति को ही इतना शक्तिशाली समझा जाता है।

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