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Vrishabh Lagna/वृषभ लग्न






Vrishabh Lagna/वृषभ लग्न  किसीभी राशि से जुड़े चिन्ह उस राशि विशेष के सम्बन्ध में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी लिए होते हैं । वृष राशि का चिन्ह बैल है । बैल स्वभाव से शांत रहता है, बहुत अधिक पारिश्रमी और वीर्यवान होता है! आमतौर पर वो शांत ही रहता है, किन्तु एक बार यदि उसे क्रोध आ जाये वह उग्र रूप धारण कर लेता है । वृष राशि के जातक में ये सभी गुण सहज ही प्रकट होते हैं! इस राशि के स्वामी शुक्र देवता होते हैं । शुक्र एक सौम्य ग्रह हैं । अतः वृष राशि (Vrish Rashi) भी सौम्य राशि की श्रेणी में आती है।पृथ्वी तत्त्व राशि होने व् स्थिर स्वभाव की राशि होने से इस राशि के जातकों में ठहराव देखने को मिलता है ।ये लोग जल्दबाजी पसंद नहीं करते हैं । वृष राशि (Vrish rashi ) के जातकों को क्रोध अपेक्षाकृत कम ही आता है , परन्तु एक बार आ जाये तो ये बैल की भांति ही व्यवहार कर सकते हैं और आसानी से शांत नहीं होते । वॄष राशि का विस्तार राशि चक्र के 30 अंश से 60 अंश के बीच पाया जाता है ।

वृषभ लग्न
वृषभ लग्न के नक्षत्र एवं विशेषताएं 

वृष राशि (Vrish Rashi) कॄत्तिका नक्षत्र के तीन चरण,रोहिणी के चारों चरण, और मॄगसिरा के प्रथम दो चरण से बनती है । वॄष राशि का विस्तार राशि चक्र के 30 अंश से 60 अंश के बीच पाया जाता है ।

लग्न स्वामी : शुक्र

तत्व: पृथ्वी

जाति:

लिंग: स्त्री

अराध्य/इष्ट : माँ दुर्गा

 कृत्तिका (द्वितीय,तृतीय,चतुर्थ चरण), रोहिणी तथा, मृगशीर्ष (प्रथम,द्वितीय चरण) के  संयोग से वृषभ  राशि बनती है.


 लग्न स्वामी : शुक्र
 लग्न तत्व: पृथ्वी 
 लग्न चिन्ह : वृषभ(बैल)
 लग्न स्वरुप: स्थिर
 लग्न स्वभाव: सौम्य
 लग्न उदय: दक्षिण
 लग्न प्रकृति: वात प्रकृति 
 जीवन रत्न: हीरा
 अराध्य:भगवान् विष्णु, श्री लक्ष्मी 
 लग्न  धातु: 
 अनुकूल रंग:हरा,हल्का नीला,श्वेत 
 लग्न जाति: वैश्य
 शुभ दिन: शुक्रवार,शनिवार  
 शुभ अंक: 6
 जातक विशेषता: दयालु
 मित्र लग्न : मकर, कन्या  
 शत्रु लग्न : तुला , धनु
 लग्न लिंग: स्त्री


लग्न स्वामी शुक्र होने के कारण वृषभ लग्न के जातक प्रायः गौरवर्ण एवं दिखने में आकर्षक और सुंदर  होते हैं. शारीरिक रूप से पुष्ट, मस्त चाल एवं मज़बूत कद काठी के स्वामी होते हैं. वृषभ लग्न के जातक स्वाभिमानी एवं स्वछन्द विचारो वाले होते हैं . शीतल स्वभाव इनकी विशेषता कही जा सकती है.

स्वाभाव से दयालु एवं सहनशील वृषभ लग्न के जातकों की वाणी में प्रायः मधुरता रहती है. आकर्षक व्यक्तित्व होने के कारण आप सामने वाले को तुरंत हे प्रभावित कर लेते हैं. स्वास्थ्य भी प्रायः अच्छा रहता है तथा मानसिक रूप से भी  वृषभ लग्न के जातक संतुष्ट रहते हैं.



आप एक  परिश्रमी जातक हैं . शारीरिक परिश्रम से आप कभी भी नहीं घबराते और इसी अपूर्व  क्षमता के बल पर जीवन में उन्नति करते हैं.  शुक्र  एक ऐश्वर्यशाली एवं विलासपूर्ण ग्रह है और वृषभ लग्न का स्वामी होने के कारण  आपको भी सुख, ऐश्वर्य एवं वैभव प्रदान करता है. आप अपनी योग्यता और परिश्रम के कारण ही किसी उच्च पद या समाज में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करते हैं. अपने सद्गुणों के कारण आप अपने से बड़ो के प्रिय होते हैं.

इस लग्न के जातक अपनी शोध प्रवृत्ति के कारण नित नवीन खोज में लगे रहते हैं. अड़ियल स्वभाव के कारण जो ठान लेते हैं उसे पूरा कर के सांस लेते हैं. शासन करने की क्षमता वृषभ लग्न के जातकों में जन्मजात होती है परन्तु संतान की ओर से परः दुखी रहते हैं.

वृषभ लग्न के जातक साहसी एवं पराक्रमी होने के साथ साथ सहनशील एवं शांति प्रिय होते हैं. आकर्षक व्यक्तित्व के साथ वाक्पटुता के कारण आप अपने जीवन में सांसारिक कार्यों को सिद्ध करने में सफल होते हैं. विद्वान् पुरुष होने के कारण वृषभ लग्न के जातकों को  विभिन्न कलाओं, संगीत एवं साहित्य का उचित ज्ञान भी रहता है. यदि इन क्षेत्रों में आप कार्य करे तो सफलता शीघ्र ही अर्जित करेंगे.

वृषभ लग्न के जातकों को हर समय कुछ न कुछ करते रहने की धुन सवार रहती है. खाली बैठना आपको कटाई पसंद नहीं है. निरंतर कोई न कोई योजना बनाकर उसे कार्यरूप देने का प्रयास आप करते रहते हैं. यदि कोई भूलवश अनुचित कार्य आपसे हो जाये तो घंटों पछताना आपका स्वभाव है.

वृषभ लग्न के जातक विचारों से सात्विक, कश्मशील एवं परोपकारी होते हैं. बहुमुखी प्रतिभा के धनि , प्रबल इच्छाशक्ति और धैर्यवान होने के कारण आपकी उन्नति प्रायः धीमी गति से होती है. भूमि प्रधान तत्व होने के कारन वृषभ राशि के जातक मशीनरी या भूमि सम्बन्धी कारोबार में विशेष रूचि रखते हैं.

सावधानी: तुला और धनु लग्न के जातकों से हानि का खतरा. 
वृष लग्न के जातक का व्यक्तित्व और विशेषताएँ। Vrish Lagn jatak – Taurus Ascendent

वृष राशि का स्वामी शुक्र होने से ऐसे जातक को विलासी जीवन सहज ही आकर्षित करता है । ऐसे जातक प्रस्सन रहना चाहते हैं व् दूसरों को भी प्रस्सन रखना पसंद करते हैं । भोजन के शौकीन ऐसे जातक आदर सत्कार में किसी प्रकार की कमी नहीं रखना चाहते हैं । बार बार परिवर्तन से इन्हें चिढ होती है ।

वृष लग्न के नक्षत्र: Taurus Lagna Nakshatra

वृष लग्न के लिए शुभ/कारक ग्रह – Shubh Grah / Karak grah Vrish Lagn -Taurus Ascendent

ध्यान देने योग्य है की यदि कुंडली के कारक ग्रह भी तीन, छह, आठ, बारहवे भाव या नीच राशि में स्थित हो जाएँ तो अशुभ हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में ये ग्रह अशुभ ग्रहों की तरह रिजल्ट देते हैं । आपको ये भी बताते चलें की अशुभ या मारक ग्रह भी यदि छठे, आठवें या बारहवें भाव के मालिक हों और छह, आठ या बारह भाव में या इनमे से किसी एक में भी स्थित हो जाएँ तो वे विपरीत राजयोग का निर्माण करते हैं । ऐसी स्थिति में ये ग्रह अच्छे फल प्रदान करने के लिए बाध्य हो जाते हैं । यहां ध्यान देने योग्य है की विपरीत राजयोग केवल तभी बनेगा यदि लग्नेश बलि हो । यदि लग्नेश तीसरे छठे , आठवें या बारहवें भाव में अथवा नीच राशि में स्थित हो तो विपरीत राजयोग नहीं बनेगा ।

शुक्र ग्रह : Shukra grah

शुक्र वृष लग्न की कुंडली में छठे घर का मालिक भी है , परन्तु लग्नेश होने से कुंडली का शुभ ग्रह बनता है । अतः वृष लग्न की कुंडली में कारक ग्रह माना जाता है ।

बुध ग्रह : Budh Grah

बुध दुसरे व् पांचवें घर का स्वामी है, अतः इस लग्न कुंडली में कारक ग्रह है ।

शनि ग्रह : Shani Grah

शनि नवें व् दसवें घर के स्वामी होने से इस लग्न कुंडली में अति योग कारक ग्रह होते हैं ।

सूर्य ग्रह: Surya Grah

सूर्य चतुर्थ का स्वामी है व् लग्नेश का अति शत्रु है अतः सम ग्रह है ।

वृष लग्न के लिए अशुभ/मारक ग्रह – Ashubh Grah / Marak grah Vrish Lagn – Taurus Ascendant

चंद्र ग्रह : Chander grah

चंद्र तीसरे घर का स्वामी है , अतः मारक है ।

मंगल ग्रह: Mangal grah

सातवें व् बारहवें घर का स्वामी होने से वृष लग्न कुंडली में मारक ग्रह बनता है ।

गुरु ग्रह: Guru grah

गुरु आठवें , ग्यारहवें का स्वामी है । अतः मारक है ।

किसी भी निर्णय पैर पहुँचने से पहले ग्रह किस स्थान में स्थित है व् किसके साथ है ,किस राशि में है , कौन इसे देखता है ,ये किसे देख रहा है आदि तथ्य देखना न भूलें । आप सभी का जीवन सुखी व् मंगलमय हो ।

. वृष लग्‍न की कुंडली में मन का कारक ग्रह चंद्रमा तृतीय भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास इत्यादि का प्रतिनिधित्‍व करता है. इसलिए वृष लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सभी कार्य ही होते है. जन्‍मकुंडली एवम दशाकाल में चंद्र के शुभ रहने पर उपरोक्त वर्णित संदर्भों में जातक को शुभ फ़ल मिलकर वृष लग्‍न के जातक का मन प्रसन्न रहता है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्र के कमजोर अथवा पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्त संदर्भों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और जातक को मानसिक क्लेश की प्राप्ति होती है.

प्रकाश पुंज सूर्य वॄष लग्न में चतुर्थ भाव का स्‍वामी हो कर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जातक अपने नाम यश और कीर्ति के लिये चतुर्थ भाव के संदर्भों का उपयोग करता हैं. वॄष लग्न के जातकों का अपने नाम यश, कीर्ति प्रसिद्धि के लिए इनका सर्वाधिक ध्‍यान उपरोक्त वर्णित संदर्भों में लगा होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के शुभ और बलवान रहने से जातक की कीर्ति यश फ़ैलकर बडे शुभकारी फ़ल प्राप्त होते हैं और सूर्य के कमजोर और पाप प्रभाव में रहने पर से उपरोक्त वर्णित संदर्भों में कमी से इनकी यश कीर्ति में कमी होती है.

सप्‍तम और द्वादश भाव का स्‍वामी वृष लग्‍न में मंगल होता है. सप्तमेश होने के नाते यह जातक के घर गृहस्‍थी सहित लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि का कारक होता है और द्वादशेश होने के नाते यह खर्च का प्रतिनिधित्‍व करता है. जाहिर है इस लग्‍न के जातकों के घर गृहस्‍थी (सप्तम भाव) के वातावरण में खर्च (द्वादश भाव) की अहम भूमिका होती है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल के बलवान एवम शुभ प्रभाव में रहने पर वृष लग्‍न वाले जातक की खर्च शक्ति की योग्यता बढने से से घर गृहस्‍थी के कार्य कार्यान्वित करने में सुख और सहजता प्राप्त होती है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल कमजोर हो अथवा पाप प्रभाव में हो तो जातक की खर्च शक्ति की कमी के कारण घर गृहस्‍थी का वातावरण कष्‍टमय हो जाता है. 

शुक्र प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के कारण यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. तथा षष्ठेष होने के कारण जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी जैसे सभी प्रकार के संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. इन दोनों ही भावों का वृष लग्‍न के जातक के स्‍वास्‍थ्‍य और आत्‍म विश्‍वास से अति गहन संबंध होता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में शुक्र के शुभ प्रभाव व बलवान होने पर हर प्रकार से शरीर व स्वास्थ्य का लाभ होता है एवम वर्णित संदर्भों में शुभ फ़ल मिलकर जातक का आत्मविश्वास बढा हुआ होता है. इसके विपरीत जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के कमजोर या पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्‍त वर्णित विषयों में परेशानी पैदा होकर इनके स्‍वास्‍थ्‍य मे परेशानी एवम आत्‍म विश्‍वास में कमजोरी बनी रहती है. 

बुध द्वितीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के कुल, कुटुंब, विद्या, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल बुध के शुभ प्रभाव में रहने पर वॄष लग्न के जातकों को उपरोक्त वर्णित विषयों में सहजता और शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. जबकि इसके विपरीत बुध कमजोर या पाप प्रभावगत हो तो , उपरोक्त वर्णित संदर्भों में न्यूनता औए कठिनाईयो का सामना करना पडता है.

बृहस्‍पति अष्‍टम भाव का स्‍वामी होकर व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एव शुभ प्रभाव में रहने पर उपरोक्त वर्णित विषयों में शुभ फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत पाप प्रभाव एवम कमजोर वॄहस्पति के कारण इन फ़लों के विपरीत फ़ल प्राप्त होते हैं. 

शनि नवम और दशम जैसे दो महत्वपूर्ण भावों का स्‍वामी होता है. यह नवमेश होने के नाते जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. एवम दशमेश होने के नाते यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे संदर्भों का प्रतिनिधी होता है. ये दोनों ही भाव वॄष लग्न के जातकों के धार्मिक, राजनैतिक सामाजिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. जन्मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान व शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त वर्णित विषयों एवम मुख्यत भाग्य और कर्म से संबंधित अत्यधिक शुभ व सकारात्मक फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत कमजोर व पाप प्रभाव में होने पर इन विषयों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु पंचम स्थान का स्वामी होकर पंचमेश बनता है और एक अत्यधिक महत्वपूर्ण त्रिकोण का स्वामी बनता है. और जीवन के अति महत्वपूर्ण विषयों जैसे बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली अथवा अपने दशाकाल में बलवान और शुभ प्रभाव गत राहु उपरोक्त विषयों में अत्यधिक शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत राहु इन विषयों में न्य़ुनता देकर अशुभ फ़ल ही अधिक देता है.

केतु एकादश भाव का स्वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि भावों का प्रतिनिधि होता है. जनम्कुंडली मे अथवा अपने दशाकाल में बलवान व शुभ प्रभाव गत राहु अत्यंत शुभ फ़ल देकर सभी तरह से आमदनी बनाये रखता है वहीं कमजोर एवम अशुभ प्रभाव गत केतु उपरोक्त फ़लों में कमी करके अशुभ फ़ल प्रदान करता है.


Vrishabh Lagna/वृषभ लग्न
Mithun Lagna/ मिथुन लग्न
Kark Lagna/कर्क लग्न
Simha Lagna/सिंह लग्न
Kanya Lagna/कन्या लग्न
Tula Lagna/तुला लग्न
Vrishchik Lagna/वृश्चिक लग्न
Dhanu Lagna/ धनु लग्न
Makar Lagna/मकर लग्न
Kumbh Lagna/कुम्भ लग्न
Meen Lagna/मीन लग्न

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