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Vivah yog | कब होगा विवाह - कुंडली में विवाह योग | विवाह में बाधक ग्रह | विवाह में देरी कारण और निवारण | शीघ्र विवाह के उपाय | meri shaadi kab hogi

हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है विवाह। सामान्यत: सभी लोगों का विवाह हो जाता है, कुछ लोगों का जल्दी विवाह होता है तो कुछ लोगों की शादी में विलंब होता है। यदि किसी अविवाहित लड़के या लड़की की सभी परिस्थितियां बहुत अच्छी हैं और फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है तो ऐसा संभव है कि उनकी कुंडली में कोई ग्रह बाधा हो।
कुंडली में विवाह योग के कारक :-
जब बृहस्पति पंचम पर दृष्टि डालता है तो यह जातक की कुंडली में विवाह का एक प्रबल योग बनाता है। बृहस्पति का भाग्य स्थान या फिर लग्न में बैठना और महादशा में बृहस्पति होना भी विवाह का कारक है। यदि वर्ष कुंडली में बृहस्पति पंचमेश होकर एकादश स्थान में बैठता है तब उस साल जातक का विवाह होने की बहुत ज्यादा संभावनाएं बनती हैं। विवाह के कारक ग्रहों में बृहस्पति के साथ शुक्र, चंद्रमा एवं बुद्ध भी योगकारी माने जाते हैं। जब इन ग्रहों की दृष्टि भी पंचम पर पड़ रही हो तो वह समय भी विवाह की परिस्थितियां बनाता है। इतना ही नहीं यदि पंचमेश या सप्तमेश का एक साथ दशाओं में चलना भी विवाह के लिये सहायक होता है।सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है। सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है। कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है। यदि सप्तम भाव में सम राशि है। सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है। सप्तमेश बली है। सप्तम में कोई ग्रह नही है। किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है। दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है। जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।

कुंडली में विवाह योग के बाधक ग्रह:-
विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है, पूर्व जन्म में किए गए पाप एवं पुण्य कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है और उन्हीं के अनुरूप वैवाहिक जीवन दुखमय या सुखमय होता है।
कुंडली में विवाह का विचार मुखयतः सप्तम भाव से ही किया जाता है। इस भाव से विवाह के अलावा वैवाहिक या दाम्पत्य जीवन के सुख-दुख, जीवन साथी अर्थात पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार किया जाता है। यदि कोई भाव, उसका स्वामी तथा उसका कारक पाप ग्रहों के मध्य में स्थित हों, प्रबल पापी ग्रहों से युक्त हों, निर्बल हों, शुभग्रह न उनसे युत हों न उन्हें देखते हों, इन तीनों से नवम, चतुर्थ, अष्टम, पंचम तथा द्वादश स्थानों में पाप ग्रह हों, भाव नवांश, भावेश नवांश तथा भाव कारक नवांश के स्वामी भी शत्रु राशि में, नीच राशि में अस्त अथवा युद्ध में पराजित हों तो उस भाव से संबंधित वस्तुओं की हानि होती है।
बृहस्पति की दृष्टि पंचम पर पड़ने से उस समय विवाह के योग बन जाते हैं लेकिन यदि उसी समय एकादश स्थान में राहू बैठा हो वह नकारात्मक योग भी बनाता है जिससे बने बनाए रिश्ते भी बिगड़ जाते हैं और बनता हुआ काम अटक जाता है। इसका सीधा सा कारण है आपके विवाह के योगकारी ग्रहों पर पाप ग्रहों की दृष्टि। पंचम स्थान पर यदि अशुभ ग्रहों यानि कि शनि, राहू और केतू की दृष्टि पड़ती है तो यह विवाह में बाधक योग बना देती है। सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है। सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है। सप्तमेश नीच राशि में है। सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है। चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों। शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों। शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों। शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो। शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों। पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों। सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो|
क्या सप्तम भाव में शनि विवाह के लिए शुभ नहीं ?
सप्तम भाव लन्म कुण्डली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य व विवाह-कारक माना गया है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति व दृष्टि संबंध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है।
सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है। इस भाव में शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है। इस भाव में शनि स्थित होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से देरी से होती है।
सप्तम भाव में शनि अगर नीच राशि मे हो तो तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़‍ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे अधिक बड़ा होता है। शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है।

शनि जिस कन्या की कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है। शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्ठम में और सप्तमेश कमजोर अथवा पाप पीड़‍ित होता है,उनके विवाह में भी काफी बाधाएँ आती हैं।

शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है, यह एक ग्रहण योग भी है। इस प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं। जन्मपत्रिका में शनि-राहु की युति होने पर या सप्तमेश शुक्र अगर कमजोर हो तो विवाह अति विलम्ब से होता है। जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण देरी हो उन्हें हरितालिका व्रत करना चाहिए या जन्म कुण्डली के अनुसार उपाय करना लाभदायक रहता है।

चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है। सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं। नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी 30 वर्ष की आयु के बाद ही करनी चाहिए क्योंकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है।

जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में,उनके साथ भी यही स्थिति होती है। इनकी शादी असफल होने की प्रबल संभावना रहती है। जिनकी कुण्डली में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है या लग्न कमजोर होने पर शादी बहुत विलम्ब से होती है। ऐसी स्थिति बनती है कि वह शादी नहीं करते।

विवाह प्रतिबंधक वाली कुण्डलियों में सप्तम स्थान, सप्तमेश व सप्तम के कारक (स्त्री की कुण्डली में गुरु, पुरुष की कुण्डली में शुक्र) की अवस्थाओं को देखना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही सप्तम भाव, सप्तमेश व सप्तम के कारक ग्रह की किन अन्य ग्रहों से युति, दृष्टि अथवा स्थानाधिप संबंध आदि हैं, उनका भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।किंतु इतने से ही ये फलादेश करना कि अमुक व्यक्ति की शादी नहीं होगी, कहना युक्ति संगत नहीं। नवमांश चक्र में सप्तम, सप्तमेश व उसके कारक की स्थिति पर भी नज़र डाल कर फलादेश कहना उपयुक्त पद्धति है।

सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
यदि नवमांश कुण्डली में भी सप्तमेश प्रताड़ित हो तो विवाह का न होना पूर्णरूप से निश्चित हो जाता है।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
यदि लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
सप्तम स्थान विवाह का पूर्ण प्रतिनिधिकर्ता भाव है। यदि इस स्थान पर नैसर्गिक पापी व क्रूर ग्रहों की पूर्ण दृष्टियां हों साथ ही सप्तम भाव में पापी या क्रूर ग्रह अथवा बलहीन शुभ ग्रह बैठे हों साथ ही शुक्र, गुरु भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहे हों तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीवन भर जाया हीन यानि पत्नी रहित ही रहता है।
सप्तम भाव में मंगल की बैठकी अथवा मंगल की दृष्टि, राहु या केतु की पूर्ण दृष्टि या युति, शनि की दृष्टि अथवा युति, क्षीण चन्द्र, पापी या क्रूर ग्रह के साथ युति करता हुआ बुध तथा सूर्य की बैठकी हों तो इन स्थितियों में विवाह की संभावना नगण्य होती है।

जातक की कुण्डली में मौजूद निम्नलिखित विशेष योग उसे पूरी तरह पत्नी या पति रहित बनाते हैं:—
शुक्र व सूर्य यदि नवम, सप्तम व पंचम स्थाम में हों
चन्द्रमा से सप्तम में मंगल व शनि, शुक्र के साथ हों
शुक्र व बुध सप्तम भाव में हों
शुक्र से सप्तम स्थान में पापग्रह हो या पापग्रह से युक्त शुक्र हो किंतु अंतिम रूप से विवाह का बिल्कुल न होना या विवाह का देर से होना इस पर निर्भर है कि उपरोक्त ग्रहों के बलाबल कैसे हैं। यदि सप्तमेश नीचस्तंगत, शत्रु गृही या शत्रु ग्रहों से दृष्ट हो तो ऐसे में विवाह तो होगा लेकिन विवाह की परिस्थितियां कठिनाई वाली होती हैं। सप्तमेश या सप्तम भाव स्थित ग्रह यदि पीड़ित हो विवाह में विलंब होना स्वाभाविक है। किंतु ये नहीं कहा जा सकता कि विवाह होगा ही नहीं।
(उत्तर कालामृत) वैवाहिक जीवन के अशुभ योग यदि सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ, अष्टम या द्वादश भावस्थ हो और नीच या अस्त हो, तो जातक या जातका के विवाह में बाधा आती है। यदि षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश सप्तम भाव में विराजमान हो, उस पर किसी ग्रह की शुभ दृष्टि न हो या किसी ग्रह से उसका शुभ योग न हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो, सप्तमेश पर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो तथा द्वादश भाव में भी क्रूर ग्रह हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तमेश व कारक शुक्र बलवान हो, तो जातक को वियोग दुख भोगना पड़ता है।
यदि शुक्र सप्तमेश हो (मेष या वृश्चिक लग्न) और पाप ग्रहों के साथ अथवा उनसे दृष्ट हो, या शुक्र नीच व शत्रु नवांश का या षष्ठांश में हो, तो जातक स्त्री कठोर चित्त वाली, कुमार्गगामिनी और कुलटा होती है। फलतः उसका वैवाहिक जीवन नारकीय हो जाता है।यदि शनि सप्तमेश हो, पाप ग्रहों क साथ व नीच नवांश में हो अथवा नीच राशिस्थ हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो जीवन साथी के दुष्ट स्वभाव के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है। राहु अथवा केतु सप्तम भाव में हो व उसकी क्रूर ग्रहों से युति बनती हो या उस पर पाप दृष्टि हो, तो वैवाहिक जीवन अक्सर तनावपूर्ण रहता है।
यदि सप्तमेश निर्बल हो और भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तथा कारक शुक्र कमजोर हो, तो जीवन साथी की निम्न सोच के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय रहता है। सूर्य लग्न में व स्वगृही शनि सप्तम भाव में विराजमान हो, तो विवाह में बाधा आती आती है या विवाह विलंब से होता है। सप्तमेश वक्री हो व शनि की दृष्टि सप्तमेश व सप्तम भाव पर पड़ती हो, तो विवाह में विलंब होता है। सप्तम भाव व सप्तमेश पाप कर्तरी योग में हो, तो विवाह में बाधा आती है।
यदि शुक्र शत्रुराशि में स्थित हो और सप्तमेश निर्बल हो, तो विवाह विलंब से होता है। शनि सूर्य या चंद्र से युत या दृष्ट हो, लग्न या सप्तम भाव में स्थित हो, सप्तमेश कमजोर हो, तो विवाह में बाधा आती है। शुक्र कर्क या सिंह राशि में स्थित होकर सूर्य और चंद्र के मध्य हो और शनि की दृष्टि शुक्र पर हो, तो विवाह नहीं होता है। शनि की सूर्य या चंद्र पर दृष्टि हो, शुक्र शनि की राशि या नक्षत्र में में हो और लग्नेश तथा सप्तमेश निर्बल हों, तो विवाह में बाधा निश्चित रूप से आती है।
वैवाहिक जीवन में क्लेश सप्तम भाव, सप्तमेश और द्वितीय भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव वैवाहिक जीवन में क्लेश उत्पन्न करता है। लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश की कारक शुक्र, राहु, केतु या मंगल से दृष्टि या युति के फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन में क्लेश पैदा होता है। यदि जातक व जातका का कुंडली मिलान (अष्टकूट) सही न हो, तो दाम्पत्य जीवन में वैचारिक मतभेद रहता है। यदि जातक व जातका की राशियों में षडाष्टक भकूट दोष हो, तो दोनों के जीवन में शत्रुता, विवाद, कलह अक्सर होते रहते हैं। यदि जातक व जातका के मध्य द्विर्द्वादश भकूट दोष हो, तो खर्चे व दोनों परिवारों में वैमनस्यता आती है जिसके फलस्वरूप दोनों के मध्य क्लेश रहता है। यदि पति-पत्नी के ग्रहों में मित्रता न हो, तो दोनों के बीच वैचारिक मतभेद रहता है। जैसे यदि ज्ञान, धर्म, रीति-रिवाज, परंपराओं, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के कारक गुरु तथा सौंदर्य, भौतिकता और ऐंद्रिय सुख के कारक शुक्र के जातक और जातका की मानसिकता, सोच और जीवन शैली बिल्कुल विपरीत होती है। पति-पत्नी के गुणों (अर्थात स्वभाव) में मिलान सही न होने पर आपसी तनाव की संभावना बनती है।
सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये भावी वर-वधू की कुण्डली में गुरु पाप प्रभाव से मुक्त होना चाहिए. गुरु दाम्पत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह भी है. अगर कुण्डली में गुरु पीडित हों तो सर्वप्रथम तो विवाह में विलम्ब होगा, तथा उसके बाद संतान प्राप्ति में भी परेशानियां आती है.गुरु किसी पापी ग्रह के प्रभाव से दूषित हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है. जब गुरु पर पाप प्रभाव हों तथा गुरु पापी ग्रह की राशि में भी स्थित हों तो निश्चित रुप से दाम्पत्य जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें आने की संभावनाएं बनती है.
शुक्र विवाह का कारक ग्रह है. वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये शुक्र का कुण्डली में सुस्थिर होना आवश्यक होता है. जब पति-पत्नी दोनों की ही कुण्डली में शुक्र पूर्ण रुप से पाप प्रभाव से मुक्त हो तब ही विवाह के बाद संबन्धों में सुख की संभावनाएं बनती है. इसके साथ-साथ शुक्र का पूर्ण बली व शुभ होना भी जरूरी होता है. शुक्र को वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह कहा जाता है. कुण्डली में शुक्र का किसी भी अशुभ स्थिति में होना पति अथवा पत्नी में से किसी के जीवन साथी के अलावा अन्यत्र संबन्धों की ओर झुकाव होने की संभावनाएं बनाता है. इसलिये शुक्र की शुभ स्थिति दाम्पत्य जीवन के सुख को प्रभावित करती है. कुण्डली में शुक्र जब त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु क्षेत्र में बैठा हों, अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तब दाम्पत्य जीवन के लिये अशुभ योग बनता है. यहां तक की ऎसे योग के कारण पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. इसके अलावा शुक्र, मंगल का संबन्ध व्यक्ति की अत्यधिक रुचि वैवाहिक सम्बन्धों में होने की सम्भावनाएं बनाती है. यह योग इन संबन्धों में व्यक्ति के हिंसक प्रवृ्ति अपनाने का भी संकेत करता है. विवाह के समय कुण्डलियों की जांच करते समय शुक्र का भी गहराई से अध्ययन करना चाहिए.
मंगल की जांच किये बिना विवाह के पक्ष से कुण्डलियों का अध्ययन पूरा ही नहीं होता है. भावी वर-वधू की कुण्डलियों का विश्लेषण करते समय सबसे पहले कुण्डली में मंगल की स्थिति पर विचार किया जाता है. मंगल किन भावों में स्थित है, कौन से ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा है तथा किन ग्रहों से युति संबन्ध में है. इन सभी बातों की बारीकी से जांच की जाती है.
मंगल से मांगलिक योग का निर्माण होता है वैवाहिक जीवन में मांगलिक योग को इतना अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि जो लोग ज्योतिष शास्त्र में विश्वास नहीं करते है. अथवा जिन्हें विवाह से पूर्व कुण्डलियों की जांच करना अनुकुल नहीं लगता है वे भी यह जान लेना चाहते है कि वर-वधू की कुण्डलियों में मांगलिक योग बन रहा है या नहीं. विवाह के बाद सभी दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना करते है. जबकि मांगलिक योग से इन इसमें कमी होती है. जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति मांगलिक होता है. परन्तु मंगल का इन भावों में स्थित होने के अलावा भी मंगल के कारण वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाएं बनती है.
कुण्डली में मांगलिक योग बनता है. परन्तु कुण्डली के अन्य योगों से इस योग की अशुभता में कमी हो रही होती है. ऎसे में अपूर्ण जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ प्रभाव को लेकर भयभीत होते रहते है. तथा बेवजह की बातों को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम भी बनाये रखते है. जो सही नहीं है. विवाह के बाद एक नये जीवन में प्रवेश करते समय मन में दाम्पत्य जीवन को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रखना चाहिए.

कुंडली में शीघ्र विवाह योग बनाने के उपाय:-
यदि उसकी कुंडली में ग्रहों की दशा अनुकूल नहीं है तो उसे क्या करना चाहिये। इसके लिये जातक कुछ सामान्य उपाय कर सकते हैं। मसलन यदि देवताओं का गुरु ग्रह बृहस्पति की दशा आपकी कुंडली के अनुसार कमजोर चल रही है और आपके विवाह में अड़चने आ रही हैं तो आपको बृहस्पति को प्रसन्न करना चाहिये। इसके लिये हर गुरुवार इनकी पूजा करें और पीले रंग की वस्तुएं इन्हें अर्पित करें। गुरुवार के दिन पीले रंग के परिधान धारण करें तो बहुत अच्छा रहेगा। कमजोर ग्रहों को रत्न पहनने से भी काफी शक्ति मिलती है। बृहस्पति को शक्तिशाली करने के लिये आप पुखराज, जरकन या हीरे की अंगूठी पहन सकते हैं। भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करना भी काफी लाभकारी होता है। अगर और भी बेहतर और त्वरित परिणाम चाहते हैं तो ज्योतिषाचार्य को अपनी जन्म कुंडली दिखाएं और विवाह में बाधक ग्रह या दोष का पता लगाकर उसका निवारण करें।


विवाह में देरी के योग -
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।

चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।

महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।

मेरी शादी कब होगी ? meri shadi kab hogi | When will I get married ?

विवाह का समय:- 
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।

कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।

सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।अविवाहित युवाओं की कुंडली में गुरु ग्रह से संबंधित बाधा हो तो भी विवाह में विलंब होता है। गुरु ग्रह को शादी का कारक ग्रह माना जाता है। इसके अलावा जिन लोगों की कुंडली मंगली होती है उनका विवाह या तो जल्दी हो जाता है या काफी विलंब से होता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह अशुभ स्थिति में है तो उसे बृहस्पति ग्रह को मनाने के लिए ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।

शीघ्र विवाह एवं विवाह में रुकावट दूर करने के उपाय
बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना जाता है इनकी पूजा से विवाह के मार्ग में आ रही सभी अड़चनें स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं। इनकी पूजा के लिए गुरुवार का विशेष महत्व है। गुरुवार को बृहस्पति देव को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग की वस्तुएं चढ़ानी चाहिए। पीले रंग की वस्तुएं जैसे हल्दी, पीला फल, पीले रंग का वस्त्र, पीले फूल, केला, चने की दाल आदि इसी तरह की वस्तुएं गुरु ग्रह को चढ़ानी चाहिए।
साथ ही शीघ्र विवाह की इच्छा रखने वाले युवाओं को गुरुवार के दिन व्रत रखना चाहिए। इस व्रत में खाने में पीले रंग का खाना ही खाएं, जैसे चने की दाल, पीले फल, केले खाने चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को पीले रंग के वस्त्र ही पहनने चाहिए। हालांकि इस व्रत के कई कठोर नियम भी हैं। ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रों स: मंत्र का पांच माला प्रति गुरुवार जप करें। गुरु ग्रह की पूजा के अतिरिक्त शिव-पार्वती का पूजन करने से भी विवाह की मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं। इसके लिए प्रतिदिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, बिल्व पत्र, अक्षत, कुमकुम आदि चढ़ाकर विधिवत पूजन करें।

विवाह योग्य लोगों को प्रत्येक गुरूवार को नहाने वाले पानी में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करना चाहिए|केसर का भी प्रयोग करना चाहिए|
यदि ऐसे लोग गुरूवार को गाय को भोग अर्थात दो आटे के पेड़े पर थोड़ी हल्दी लगाकर थोडा गुड तथा चने की गीली दाल का भोग देना चाहिए|
भूलकर भी बजुर्गों का अपमान न करें|बजुर्ग व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए|
यह प्रयोग शुकल पक्ष के प्रथम गुरूवार से करना चाहिए|गुरूवार की शाम को पांच प्रकार की मिठाई के साथ हरी इलाइची का जोड़ा तथा शुद्ध घी के दीपक के साथ जल अर्पित करना चाहिए|यह लगातार तीन गुरूवार करना चाहिए|
गुरूवार को केले के वृक्ष के समक्ष गुरु के १०८ नामों के उच्चारण के साथ शुद्ध घी का दीपक तथा जल अर्पित करना चाहिए|
अब यहाँ आपको ऐसा उपाय बताया जा रहा है जिसका प्रयोग करने से विवाह में कोई भी रूकावट नही आएगी|जिस समय का योग आपकी कुंडली में है,तो विवाह उसी समय होगा|इसके लिए मंगलवार को प्रातः सूर्योदय काल में एक सुखा नारियल लें|३०० ग्राम बूरा यानि पीसी शक्कर तथा ११ रूपए का पंचमेवा मिला लें|नारियल मैं इतना बड़ा छेद करें,जिसमे आपकी ऊँगली जा सके|उसमे पीसी शक्कर व पंचमेवा मिलाकर भर दें,और किसी पीपल के नीचे थोडा गद्दा कर दबा दें|जो शक्कर बच जाये उसे गद्दे के ऊपर ही डालकर एक पत्थर रख दें|जिससे कोई जानवर उसे निकाल न सके|ऐसा आप सात मंगलवार को करें|किसी भी कन्या के लिए इसे लगातार सात मंगलवार करना नामुमकिन है तो अस्वस्थ दिनों में न कर के उसके बाद शुद्ध होने पर पुन:आरम्भ कर सकती है|इस प्रयोग में यह सावधानी रखनी है की सोमवार की रात्रि से मंगलवार प्रयोग होने तक जल नहीं पीना है और किसी से भी बात नहीं करनी है|सात मंगल होने के बाद आप स्वयं ही चमत्कार देखेंगे|
यदि किसी कन्या की पत्रिका में मंगली योग होने के कारण विवाह में बाधा आ रही है तो व कन्या मंगल चंडिका स्त्रोत का मंगलवार तथा शनिवार को सुंदर काण्ड का पाठ करे|इससे भी विवाह बाधा दूर होती है|
शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रात:स्नान करने के बाद किसी बहते जल में प्रवाहित कर दें|यह प्रयोग भी चमत्कारी है|
शीघ्र विवाह के लिए सोमवार को १२०० ग्राम चने की दाल व सवा लीटर कच्चा दूध दान करें|जब तक विवाह न हो ,तब तक यह प्रयोग करते रहना है|इस प्रयोग में आपका विवाह होना आवशयक है|
यदि वह कन्या जब किसी अन्य कन्या के विवाह में जाये और यदि वहन पर कन्या को मेहँदी लग रहे हो तो अविवाहित कन्या कुछ मेहँदी उस कन्या के हाथ से लगवा ले तो विवाह का मार्ग प्रशस्त होता है|
यदि कन्या सफेद खरगोश को पाले तथा अपने हाथ से उसे भोजन के रूप में कुछ दे|यदि विवाह में बुध रूकावट दे रहा हो तो खरगोश को हरी घास खिलाएं|
कन्या के विवाह की चर्चा करने उसके घर के लोग जब भी किसी के यहाँ जायें तो कन्या खुले बालों से,लाल वस्त्र धारण कर हँसते हुए उन्हें कोई मिष्ठान खिला कर विदा करे|विवाह की चर्चा सफल होगी|
पूर्णिमा को वट वृक्ष की १०८ परिक्रमा देने से भी विवाह बाधा दूर होती है|गुरूवार को वाट,पीपल,केले के वृक्ष पर जल अर्पित करने से विवाह बाधा दूर होती है|
यदि किसी लड़के या लड़की की कुंडली में सूर्य की वजह से विवाह होने में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में सूर्य को जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊँ सूर्याय: नम:।
कुंडली में मंगल के कारण विवाह में विलंब होने पर चांदी का चौकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें। विवाह शीघ्र होगा।
सूर्य की बाधा होने पर विवाह प्रस्ताव के जाते समय थोड़ा गुड़ खाकर और पानी पीकर जाना चाहिए। साथ ही लड़के या लड़की की माता को गुड़ खाना छोड़ देना चाहिए।
यदि किसी लड़के या लड़की की कुंडली में सूर्य की वजह से विवाह होने में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में सूर्य को जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊँ सूर्याय: नम:।
तांबे का एक चौकोर टुकड़ा जमीन में दबा दें, इससे सूर्य की बाधा समाप्त हो जाएगी। शीघ्र विवाह होगा।
प्रति शनिवार को शिवजी पर काले तिल चढ़ाएं, इससे शनि की बाधा समाप्त हो जाएगी और शादी शीघ्र होगी।
शनिवार को बहते पानी में नारियल बहाएं, इससे राहू की बाधा दूर होगी।

यदि किसी लड़के या लड़की की कुंडली में सूर्य की वजह से विवाह होने में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में सूर्य को जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊँ सूर्याय: नम:।
कुंडली में मंगल के कारण विवाह में विलंब होने पर चांदी का चौकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें। विवाह शीघ्र होगा।
सूर्य की बाधा होने पर विवाह प्रस्ताव के जाते समय थोड़ा गुड़ खाकर और पानी पीकर जाना चाहिए। साथ ही लड़के या लड़की की माता को गुड़ खाना छोड़ देना चाहिए।
यदि किसी लड़के या लड़की की कुंडली में सूर्य की वजह से विवाह होने में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में सूर्य को जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊँ सूर्याय: नम:।
कुंडली में मंगल के कारण विवाह में विलंब होने पर चांदी का चौकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें। विवाह शीघ्र होगा।
तांबे का एक चौकोर टुकड़ा जमीन में दबा दें, इससे सूर्य की बाधा समाप्त हो जाएगी। शीघ्र विवाह होगा।
प्रति शनिवार को शिवजी पर काले तिल चढ़ाएं, इससे शनि की बाधा समाप्त हो जाएगी और शादी शीघ्र होगी।
शनिवार को बहते पानी में नारियल बहाएं, इससे राहू की बाधा दूर होगी।
तांबे का एक चौकोर टुकड़ा जमीन में दबा दें, इससे सूर्य की बाधा समाप्त हो जाएगी। शीघ्र विवाह होगा।
प्रति शनिवार को शिवजी पर काले तिल चढ़ाएं, इससे शनि की बाधा समाप्त हो जाएगी और शादी शीघ्र होगी।
एक तरफ से सिकी हुईं आठ मीठी रोटियां भूरे कुत्ते को खिलाएं।
शनिवार को बहते पानी में नारियल बहाएं, इससे राहू की बाधा दूर होगी।
शनिवार को काले कपड़े में साबुत उड़द, लोहा, काला तिल और साबुन बांधकर दान करें।
काले घोड़े की नाल का छल्ला सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली (मीडिल फिंगर) में पहनें।
लड़की की शादी के लिए परेशान हैं तो ये टोटका करें—
यदि किसी कन्या का विवाह यदि सही समय पर न हो तो माता-पिता का चिंतित होना जरुरी है। वर्तमान समय में यह एक आम समस्या हो गई है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी लड़की की शादी जल्दी किसी अच्छे घर में हो जाएं तो नीचे लिखा टोटका करने से आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।
ये करें उपाय/टोटका—
शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार को सात केले, सात गौ ग्राम गुड़ और एक नारियल लेकर किसी नदी या सरोवर पर जाएं। अब कन्या को वस्त्र सहित नदी के जल में स्नान कराकर उसके ऊपर से जटा वाला नारियल ऊसारकर नदी में प्रवाहित कर दें। इसके बाद थोड़ा गुड़ व एक केला चंद्रदेव के नाम पर व इतनी ही सामग्री सूर्यदेव के नाम पर नदी के किनारे रखकर उन्हें प्रणाम कर लें। थोड़े से गुड़ को प्रसाद के रूप में कन्या स्वयं खाएं और शेष सामग्री को गाय को खिला दें। इस टोटके से कन्या का विवाह शीघ्र ही हो जाएगा।

कुम्हार अपने चाक को जिस डंडे से घुमाता है, उसे किसी तरह किसी को बिना बताए प्राप्त कर लें। इसके बाद घर के किसी कोने को रंग-रोगन कर साफ कर लें। इस स्थान पर उस डंडे को लंहगा-चुनरी व सुहाग का अन्य सामग्री से सजाकर दुल्हन का स्वरूप देकर एक कोने में खड़ करके गुड़ और चावलों से इसकी पूजा करें।
इस टोटके से लड़के का विवाह शीघ्र ही हो जाता है। यदि चालीस दिनों में इच्छा पूरी न हो तो फिर यही प्रक्रिया दोहराएं(डंडा प्राप्त करने से लेकर पूजा तक)। यह प्रक्रिया सात बार कर सकते हैं।

कुंवारी कन्या के विवाह हेतु अनुभूत/अचूक उपाय/टोटके :—
१. यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें ! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें ! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी !
२. प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे ! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेगी

शादी विवाह में विघ्न न पडने देने के लिये टोटका
शादी वाले दिन से एक दिन पहले एक ईंट के ऊपर कोयले से “बाधायें” लिखकर ईंट को उल्टा करके किसी सुरक्षित स्थान पर रख दीजिये,और शादी के बाद उस ईंट को उठाकर किसी पानी वाले स्थान पर डाल कर ऊपर से कुछ खाने का सामान डाल दीजिये,शादी विवाह के समय में बाधायें नहीं आयेंगी।

विवाह बाधा निवारणार्थ मंगल चंडिका प्रयोग विधि -

प्रथम :- मंत्र और स्त्रोत्र प्रयोग

यह प्रयोग मंगली लोगो को मंगल की वजह से उनके विवाह, काम-धंधे में आ रही रूकावटो को दूर कर देता है
मंत्र:-
— ॐ ह्रीं श्रीं कलीम सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ||

—देवी भगवत के अनुसार अन्य मंत्र :-

—ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके हूँ हूँ फट् स्वाहा )

दोनों में से कोई भी मन्त्र जप सकते है

ध्यान :-

देवी षोडश वर्षीया शास्वत्सुस्थिर योवनाम| सर्वरूप गुणाढ्यं च कोमलांगी मनोहराम|
स्वेत चम्पक वऱॅणाभाम चन्द्र कोटि सम्प्रभाम| वन्हिशुद्धाशुका धानां रत्न भूषण भूषिताम|
बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिका माल्य भूषितं| बिम्बोष्ठिं सुदतीं शुद्धां शरत पद्म निभाननाम|
ईशदहास्य प्रसन्नास्यां सुनिलोत्पल लोचनाम| जगद धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्य सम्पत्प्रदाम|
संसार सागरेघोरे पोत रूपां वरां भजे|

स्त्रोत्र:—–
||शंकर उवाच||

रक्ष रक्ष जगन मातर देवी मंगल चण्डिके | हारिके विपदां राशे: हर्ष मंगल कारिके ||
हर्ष मंगल दक्षे च हर्ष मंगल चण्डिके | शुभ मंगल दक्षे च शुभ मंगल चण्डिके ||
मंगले मंगलार्हे च सर्व मंगल मंगले | सतां मंगलदे देवी सर्वेषां मंग्लालये ||
पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट दैवते | पूज्य मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम ||
मंगलाधिष्ठात्रिदेवी मंगलानां च मंगले | संसार मंगलाधारे मोक्ष मंगलदायिनी ||
सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम | प्रति मंगलवारे च पूज्य च मंगलप्रदे ||
स्त्रोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मंगल चंडीकाम | प्रति मंगलवारे च पूजां कृत्वा गत: शिव: ||
देव्याश्च मंगल स्त्रोत्रम यं श्रुणोति समाहित: | तन्मंगलं भवेत्श्चान्न भवेत् तद मंगलं ||

विधि विधान :—–
मंगलवार को संध्या समय पर स्नान करके पवित्र होकर एक पंचमुखी दीपक जलाकर माँ मंगल चंडिका की पूजा श्रधा भक्ति पूर्वक करे/ माँ को एक नारियल और खीर का भोग लगाये | उपरोक्त दोनों में से किसी एक मंत्र का मन ही मन १०८ बार जप करे तथा स्त्रोत्र का ११ बार उच्च स्वर से श्रद्धा पूर्वक प्रेम सहित पाठ करे | ऐसा आठ मंगलवार को करे | आठवे मंगलवार को किसी भी सुहागिन स्त्री को लाल ब्लाउज, लाल रिब्बन, लाल चूड़ी, कुमकुम, लाल सिंदूर, पान-सुपारी, हल्दी, स्वादिष्ट फल, फूल आदि देकर संतुष्ट करे | अगर कुंवारी कन्या या पुरुष इस प्रयोग को कर रहे है तो वो अंजुली भर कर चने भी सुहागिन स्त्री को दे , ऐसा करने से उनका मंगल दोष शांत हो जायेगा | इस प्रयोग में व्रत रहने की आवश्यकता नहीं है अगर आप शाम को न कर सके तो सुबह कर सकते है |
यह अनुभूत प्रयोग है और आठ सप्ताह में ही चमत्कारिक रूप से शादी-विवाह की समस्या, धन की समस्या, व्यापार की समस्या, गृह-कलेश, विद्या प्राप्ति आदि में चमत्कारिक रूप से लाभ होता है |

2. जिस कन्या का विवाह न हो पा रहा हों, वह भगवती पार्वती के चित्र या मूर्ति के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाकर प्रतिदिन निम्न मंत्र का 11 माला जाप 10 दिनों तक करें- हे गौरि शंकरार्द्धागि यथा शंकरप्रिया। तथा मां कुरू कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।
3. जिन लडकों का विवाह नहीं होता है, उन्हें निम्नलिखित मंत्र का नित्य 11 माला जप करना चाहिए- ओम् क्लीं पत्नी मनोरम देहि मनोवृत्तानुसारिणीम। तारणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भावाम ||
4. विवाह योग्य लडके और लडकियां प्रत्येक गुरूवार को स्नान के जल में एक चुटकी पिसी हल्दी डालकर स्नान करें। गुरूवार के दिन आटे के दो पेडों पर थोडी-सी हल्दी लगाकर, थोडी गुड और चने की दाल गाय को खिलाएं। इससे विवाह का योग शीघ्र बनता है।
6. बृहस्पतिवार को केले के वृक्ष के समक्ष गुरूदेव बृहस्पति के 108 नामों के उच्चारण के साथ शुद्ध घी का दीपक जलाकर, जल अर्पित करें।

7. यदि किसी कन्या की कुंडली में मंगली योग होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा है तो वह मंगलवार को “मंगल चंडिका स्तोत्र” का तथा शनिवार को “सुंदरकांड” का पाठ करें।

8. किसी भी शुक्लपक्ष की प्रथमा तिथि को प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर राम-सीता के संयुक्त चित्र का षोडशोपचार पूजन कर अग्रलिखित चौपाई का 108 जाप करे। यह उपाय 40 दिन किया जाता है। कन्या को उसके अस्वस्थ दिनों की छूट है। जब तक वह पुन: शुद्ध न हो जाए, तब तक यह प्रयोग न करें। अशुद्ध तथा शुद्ध होने के बाद के दिनों को मिलाकर ही दिनों की गिनती करनी चाहिए। कुल 40 दिनों में कहीं न कहीं रिश्ता अवश्य हो जाएगा।
चौपाई इस प्रकार है-

“सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पुरहि मनकामना तुम्हारी।|

9. जो कन्या पार्वती देवी की पूजा करके उनके सामने प्रतिदिन निम्नलिखित मंत्र का एक माला जप करती है, उसका विवाह शीघ्र हो जाता है

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवं पतिं मे कुरू ते नम:।।

प्रेम विवाह में सफलता प्राप्ति हेतु ये करें उपाय/टोटका
यदि आपको प्रेम विवाह में अडचने आ रही हैं तो :
शुक्ल पक्ष के गुरूवार से शुरू करके विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ती या फोटो के आगे “ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमः” मंत्र का रोज़ तीन माला जाप स्फटिक माला पर करें ! इसे शुक्ल पक्ष के गुरूवार से ही शुरू करें ! तीन महीने तक हर गुरूवार को मंदिर में प्रशाद चढांए और विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करें !


जिस किसी कन्या के विवाह में बाधा हो उन्हें किसी योग्य ब्रह्मण से अपने घर में माँ मंगला गौरी की प्राण प्रतिष्ठा करा कर उनकी नियमित अराधना करना चाइये और नित्य प्रात: स्नान आदि से निर्वित्त हो कर मंगला गौरी स्तोत्र का नियमित पाठ करना चमत्कारिक लाभ देने वाला होता है

श्रावण मास के पहले दिन अपने घर के पूजन स्थल पर शिव व गौरी की प्रतिमा को स्थापित करे।

पूरे मॉस नियमित रूप से शिव व गौरी का पंचोपचार पूजन तथा कुछ भोग अर्पित करें। तत्पश्चात पुष्प – बिल्वपत्र अर्पित करें व निम्न मंत्र की एक माला का जप करें।

मंत्र –
हे गौरी शंकर अर्धागिंनी यथा त्वं शंकर प्रिया
तथा माम कुरू कल्याणी कान्त कान्ता सुदुर्लभम् ।।

इस उपाय को पूरी श्रृद्धा के साथ करने से विवाह में बाधाएं नहीं आती और शीघ्र विवाह हो जाता है।
इसी के साथ यदि कोई भी कन्या गोस्वामी तुलसीदास कृत पार्वती मांगल्य का पाठ करती है तो भी विवाह बाधा दूर हो कर एक उच्च वर की प्राप्ति होती है |
लोक परम्परा अनुसार बृहस्पति गृह के निमित्त गुरूवार को कुछ दान करना भी विवाह बाधा को दूर करता है |कन्या को पीले वस्त्र का प्रयोग व एक पुखराज धारण करना तथा गुरूवार को कदली (केले) के वृक्ष में जल अर्पण करें। केले के वृक्ष के नीचे 210 माला (21000 जप) करें।
केले के पेड़ की अराधना करना बृहस्पति व्रत कथा का निष्ठापरक पाठ करना विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना शीघ्र लाभ दिलाता है |
बृहस्पति के वेदोक्त मंत्र का जप 76000+7600 दशांश सहित करें।

पुराणोक्त मंत्र जप 76000+7600 दशांश सहित करें, कार्य शीघ्र आतिशिघ्र होगा ।
सूर्यास्त के समय गुरु का दान पीला वस्त्र सवा मीटर, चना दाल 1250 ग्राम, स्वर्ण 1 ग्राम दान,कड़ी हल्दी की गांठ, एक जोड़ा जनेऊ, कोई भी धार्मिक पुस्तक मंदिर में या ब्राह्मण को दें।

श्रीराम स्तुति (श्रीरामचंद्र कृपाल भजमन) का नित्य पाठ कर आरती करें।
इसी प्रकार दुर्गा शप्तशती में माँ को प्रसन्न कर हर प्रकार के कार्य सिद्धि के उपाय व मंत्र बताये गए है, जिन्हें भली बहती जान कर करने से कोई भी उसका लाभ ले सकता है | ऐसे में माँ भगवती दुर्गा के

कात्यायनी स्वरुप की पूजा 21 दिन कर निम्न मंत्रों का जप करें |
“”‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्य धीश्वरी। नंद गोप सुतं देवी पतिं मे कुरुते नम:।””””

शास्त्रों में वर्णित कात्यायनी देवी का अनुष्ठान बड़ा ही उपयोगी व सिद्धिप्रद होता है।इस मंत्र का अनुष्ठान नियम व श्रद्धापूर्वक करने से कन्या के विवाह में आनी वाली समस्या या विघ्न शीघ्र ही दूर हो जाता है व कन्या का विवाह सकुशल संपन्न हो जाता है।

जप की विधि:—- यह जप सूखे केले के पत्ते की आसनी पर बैठकर कमलगट्टे की माला से किया जाता है। जप के समय सरसो तेल का दीपक जलते रहना चाहिए। जिसको अनुष्ठान करना हो उसे पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 21 दिन तक 41 हजार जप का पुरश्चरण करना चाहिए।यदि किसी कन्या के विवाह में मंगल दोष बाधक बन रहा है तो उसके अभिभावकों को चहिये के 41 दिन नियमित मंगल चन्द्रिका स्तोत्र का पाठ कर |
इस प्रकार इन कुछ अनुभूत उपाय कर कोई भी कन्या या उनके अभिभावक कन्या के विवाह में आ रही बाधा का निवारण कर सकते है |

ग्रहों के दोष निवारण/शांति के सामान्य उपाय/टोटके—
अपनी राशि अनुसार करें पूजन—
जिनका विवाह होने वाला है, वह जातक क्या करें या किस देवी-देवता का पूजन करें, ताकि उनके गृहस्थ जीवन में सुख, शांति व वैभव बना रहे। आइए जा‍नते हैं : –
मेष- इस राशि वाले जातक भगवान गणेशजी के दर्शन करें एवं ‘गं गणपतये नम:’ की 9 माला करें।
वृषभ- इस राशि वाले जातक कन्या का पूजन करें एवं दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
मिथुन- इस राशि वाले जातक शि‍वशक्ति की आराधना करें।
कर्क- इस राशि वाले जातक गुरु के दर्शन करें एवं शिवाष्टक या शिव चालीसा करें।
सिंह- इस राशि वाले जातक प्रात: सूर्य दर्शन करें एवं आदित्यह्रदयस्तोत्रम का पाठ करें।
कन्या- इस राशि वाले जातक माताजी (दुर्गा) के दर्शन करें एव गणेश चालीसा करें।
तुला- इस राशि वाले जातक राधाकृष्ण के दर्शन करें एवं कृष्णाष्टक या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ की माला करें।
वृश्चिक- इस राशि वाले जातक शिवजी के दर्शन करें एवं शिव के द्वादश नाम का उच्चारण करें (बारह ज्योतिर्लिंग का नाम उच्चारण करें)।
धनु- इस राशि वाले जातक दत्त भगवान के दर्शन करें एवं गुरु का पाठ करें।
मकर- इस राशि वाले जातक हनुमानजी के दर्शन करें एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।
कुंभ- इस राशि वाले जातक राम-सीता के दर्शन करें एवं रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें।
मीन- इस राशि वाले जातक श्री गणेश या सांईं बाबा के दर्शन करें एवं ‘बृं बृहस्पते नम:’ की 9 माला करें।

—सूर्य के उपाय—-

दान—
गाय का दान अगर बछड़े समेत
गुड़, सोना, तांबा और गेहूं
सूर्य से सम्बन्धित रत्न का दान
दान के विषय में शास्त्र कहता है कि दान का फल उत्तम तभी होता है जब यह शुभ समय में सुपात्र को दिया जाए। सूर्य से सम्बन्धित वस्तुओं का दान रविवार के दिन दोपहर में ४० से ५० वर्ष के व्यक्ति को देना चाहिए. सूर्य ग्रह की शांति के लिए रविवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गेहुं और गुड़ मिलाकर खिलाना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को गुड़ का खीर खिलाने से भी सूर्य ग्रह के विपरीत प्रभाव में कमी आती है. अगर आपकी कुण्डली में सूर्य कमज़ोर है तो आपको अपने पिता एवं अन्य बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं. प्रात: उठकर सूर्य नमस्कार करने से भी सूर्य की विपरीत दशा से आपको राहत मिल सकती है.
सूर्य को बली बनाने के लिए व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्योदय के समय उठकर लाल पुष्प वाले पौधों एवं वृक्षों को जल से सींचना चाहिए।
रात्रि में ताँबे के पात्र में जल भरकर सिरहाने रख दें तथा दूसरे दिन प्रातःकाल उसे पीना चाहिए।
ताँबे का कड़ा दाहिने हाथ में धारण किया जा सकता है।
लाल गाय को रविवार के दिन दोपहर के समय दोनों हाथों में गेहूँ भरकर खिलाने चाहिए। गेहूँ को जमीन पर नहीं डालना चाहिए।
किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य पर जाते समय घर से मीठी वस्तु खाकर निकलना चाहिए।
हाथ में मोली (कलावा) छः बार लपेटकर बाँधना चाहिए।
लाल चन्दन को घिसकर स्नान के जल में डालना चाहिए।
सूर्य के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु रविवार का दिन, सूर्य के नक्षत्र (कृत्तिका, उत्तरा-फाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा) तथा सूर्य की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
—-क्या न करें—
आपका सूर्य कमज़ोर अथवा नीच का होकर आपको परेशान कर रहा है अथवा किसी कारण सूर्य की दशा सही नहीं चल रही है तो आपको गेहूं और गुड़ का सेवन नहीं करना चाहिए. इसके अलावा आपको इस समय तांबा धारण नहीं करना चाहिए अन्यथा इससे सम्बन्धित क्षेत्र में आपको और भी परेशानी महसूस हो सकती है.
—चन्द्रमा के उपाय—

—दान—-
चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्र, चांदी, चावल, भात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.कुछ मुख्य बिन्दु निम्न है-
व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।
सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
—क्या न करें—-
ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. स्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिए.
—मंगल के उपाय—-

पीड़ित व्यक्ति को लाल रंग का बैल दान करना चाहिए. लाल रंग का वस्त्र, सोना, तांबा, मसूर दाल, बताशा, मीठी रोटी का दान देना चाहिए. मंगल से सम्बन्धित रत्न दान देने से भी पीड़ित मंगल के दुष्प्रभाव में कमी आती है. मंगल ग्रह की दशा में सुधार हेतु दान देने के लिए मंगलवार का दिन और दोपहर का समय सबसे उपयुक्त होता है. जिनका मंगल पीड़ित है उन्हें मंगलवार के दिन व्रत करना चाहिए और ब्राह्मण अथवा किसी गरीब व्यक्ति को भर पेट भोजन कराना चाहिए. मंगल पीड़ित व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 10 से 15 मिनट ध्यान करना उत्तम रहता है. मंगल पीड़ित व्यक्ति में धैर्य की कमी होती है अत: धैर्य बनाये रखने का अभ्यास करना चाहिए एवं छोटे भाई बहनों का ख्याल रखना चाहिए.
लाल कपड़े में सौंफ बाँधकर अपने शयनकक्ष में रखनी चाहिए।
ऐसा व्यक्ति जब भी अपना घर बनवाये तो उसे घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाना चाहिए।
बन्धुजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी मंगल शुभ बनता है।
लाल वस्त्र ले कर उसमें दो मुठ्ठी मसूर की दाल बाँधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करनी चाहिए।
मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर ले कर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।
बंदरों को गुड़ और चने खिलाने चाहिए।
अपने घर में लाल पुष्प वाले पौधे या वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
मंगल के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, मंगल के नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

—क्या न करें—-
आपका मंगल अगर पीड़ित है तो आपको अपने क्रोध नहीं करना चाहिए. अपने आप पर नियंत्रण नहीं खोना चाहिए. किसी भी चीज़ में जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए और भौतिकता में लिप्त नहीं होना चाहिए
—बुध के उपाय—-

बुध की शांति के लिए स्वर्ण का दान करना चाहिए. हरा वस्त्र, हरी सब्जी, मूंग का दाल एवं हरे रंग के वस्तुओं का दान उत्तम कहा जाता है. हरे रंग की चूड़ी और वस्त्र का दान किन्नरो को देना भी इस ग्रह दशा में श्रेष्ठ होता है. बुध ग्रह से सम्बन्धित वस्तुओं का दान भी ग्रह की पीड़ा में कमी ला सकती है. इन वस्तुओं के दान के लिए ज्योतिषशास्त्र में बुधवार के दिन दोपहर का समय उपयुक्त माना गया है.बुध की दशा में सुधार हेतु बुधवार के दिन व्रत रखना चाहिए. गाय को हरी घास और हरी पत्तियां खिलानी चाहिए. ब्राह्मणों को दूध में पकाकर खीर भोजन करना चाहिए. बुध की दशा में सुधार के लिए विष्णु सहस्रनाम का जाप भी कल्याणकारी कहा गया है. रविवार को छोड़कर अन्य दिन नियमित तुलसी में जल देने से बुध की दशा में सुधार होता है. अनाथों एवं गरीब छात्रों की सहायता करने से बुध ग्रह से पीड़ित व्यक्तियों को लाभ मिलता है. मौसी, बहन, चाची बेटी के प्रति अच्छा व्यवहार बुध ग्रह की दशा से पीड़ित व्यक्ति के लिए कल्याणकारी होता है.
अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए तथा निरन्तर उसकी देखभाल करनी चाहिए। बुधवार के दिन तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए।
बुधवार के दिन हरे रंग की चूड़ियाँ हिजड़े को दान करनी चाहिए।
हरी सब्जियाँ एवं हरा चारा गाय को खिलाना चाहिए।
बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में मूँग के लड्डुओं का भोग लगाएँ तथा बच्चों को बाँटें।
घर में खंडित एवं फटी हुई धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ नहीं रखने चाहिए।
अपने घर में कंटीले पौधे, झाड़ियाँ एवं वृक्ष नहीं लगाने चाहिए। फलदार पौधे लगाने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
बुध के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु बुधवार का दिन, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती) तथा बुध की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
—बृहस्पति के उपाय—-

बृहस्पति के उपाय हेतु जिन वस्तुओं का दान करना चाहिए उनमें चीनी, केला, पीला वस्त्र, केशर, नमक, मिठाईयां, हल्दी, पीला फूल और भोजन उत्तम कहा गया है. इस ग्रह की शांति के लए बृहस्पति से सम्बन्धित रत्न का दान करना भी श्रेष्ठ होता है. दान करते समय आपको ध्यान रखना चाहिए कि दिन बृहस्पतिवार हो और सुबह का समय हो. दान किसी ब्राह्मण, गुरू अथवा पुरोहित को देना विशेष फलदायक होता है.बृहस्पतिवार के दिन व्रत रखना चाहिए. कमज़ोर बृहस्पति वाले व्यक्तियों को केला और पीले रंग की मिठाईयां गरीबों, पंक्षियों विशेषकर कौओं को देना चाहिए. ब्राह्मणों एवं गरीबों को दही चावल खिलाना चाहिए. रविवार और बृहस्पतिवार को छोड़कर अन्य सभी दिन पीपल के जड़ को जल से सिंचना चाहिए. गुरू, पुरोहित और शिक्षकों में बृहस्पति का निवास होता है अत: इनकी सेवा से भी बृहस्पति के दुष्प्रभाव में कमी आती है. केला का सेवन और सोने वाले कमड़े में केला रखने से बृहस्पति से पीड़ित व्यक्तियों की कठिनाई बढ़ जाती है अत: इनसे बचना चाहिए।
ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए।
सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।
ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर निःशुल्क सेवा करनी चाहिए।
किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए।
ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए।
गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए।
गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए।
गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
—-शुक्र के उपाय—

शुक्र ग्रहों में सबसे चमकीला है और प्रेम का प्रतीक है. इस ग्रह के पीड़ित होने पर आपको ग्रह शांति हेतु सफेद रंग का घोड़ा दान देना चाहिए. रंगीन वस्त्र, रेशमी कपड़े, घी, सुगंध, चीनी, खाद्य तेल, चंदन, कपूर का दान शुक्र ग्रह की विपरीत दशा में सुधार लाता है. शुक्र से सम्बन्धित रत्न का दान भी लाभप्रद होता है. इन वस्तुओं का दान शुक्रवार के दिन संध्या काल में किसी युवती को देना उत्तम रहता है.शुक्र ग्रह से सम्बन्धित क्षेत्र में आपको परेशानी आ रही है तो इसके लिए आप शुक्रवार के दिन व्रत रखें. मिठाईयां एवं खीर कौओं और गरीबों को दें. ब्राह्मणों एवं गरीबों को घी भात खिलाएं. अपने भोजन में से एक हिस्सा निकालकर गाय को खिलाएं. शुक्र से सम्बन्धित वस्तुओं जैसे सुगंध, घी और सुगंधित तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए. वस्त्रों के चुनाव में अधिक विचार नहीं करें.
काली चींटियों को चीनी खिलानी चाहिए।
शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना चाहिए।
किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय १० वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
अपने घर में सफेद पत्थर लगवाना चाहिए।
किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
—-शनि के उपाय—

जिनकी कुण्डली में शनि कमज़ोर हैं या शनि पीड़ित है उन्हें काली गाय का दान करना चाहिए. काला वस्त्र, उड़द दाल, काला तिल, चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, लोहा, खेती योग्य भूमि, बर्तन व अनाज का दान करना चाहिए. शनि से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है. शनि ग्रह की शांति के लिए दान देते समय ध्यान रखें कि संध्या काल हो और शनिवार का दिन हो तथा दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति ग़रीब और वृद्ध हो.शनि के कोप से बचने हेतु व्यक्ति को शनिवार के दिन एवं शुक्रवार के दिन व्रत रखना चाहिए. लोहे के बर्तन में दही चावल और नमक मिलाकर भिखारियों और कौओं को देना चाहिए. रोटी पर नमक और सरसों तेल लगाकर कौआ को देना चाहिए. तिल और चावल पकाकर ब्राह्मण को खिलाना चाहिए. अपने भोजन में से कौए के लिए एक हिस्सा निकालकर उसे दें. शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति के लिए हनुमान चालीसा का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र का जाप एवं शनिस्तोत्रम का पाठ भी बहुत लाभदायक होता है. शनि ग्रह के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु गरीब, वृद्ध एवं कर्मचारियो के प्रति अच्छा व्यवहार रखें. मोर पंख धारण करने से भी शनि के दुष्प्रभाव में कमी आती है.
शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।
शनिवार के दिन बाल एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए।
भड्डरी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।
भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।
किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।
घर में काला पत्थर लगवाना चाहिए।
शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ फल देता है।
—-क्या न करें—
जो व्यक्ति शनि ग्रह से पीड़ित हैं उन्हें गरीबों, वृद्धों एवं नौकरों के प्रति अपमान जनक व्यवहार नहीं करना चाहिए. नमक और नमकीन पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए, सरसों तेल से बनें पदार्थ, तिल और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए. शनिवार के दिन सेविंग नहीं करना चाहिए और जमीन पर नहीं सोना चाहिए.शनि से पीड़ित व्यक्ति के लिए काले घोड़े की नाल और नाव की कांटी से बनी अंगूठी भी काफी लाभप्रद होती है परंतु इसे किसी अच्छे पंडित से सलाह और पूजा के पश्चात ही धारण करना चाहिए. साढ़े साती से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी शनि का यह उपाय लाभप्रद है. शनि का यह उपाय शनि की सभी दशा में कारगर और लाभप्रद है.
—राहु के उपाय—

अपनी शक्ति के अनुसार संध्या को काले-नीले फूल, गोमेद, नारियल, मूली, सरसों, नीलम, कोयले, खोटे सिक्के, नीला वस्त्र किसी कोढ़ी को दान में देना चाहिए। राहु की शांति के लिए लोहे के हथियार, नीला वस्त्र, कम्बल, लोहे की चादर, तिल, सरसों तेल, विद्युत उपकरण, नारियल एवं मूली दान करना चाहिए. सफाई कर्मियों को लाल अनाज देने से भी राहु की शांति होती है. राहु से पीड़ित व्यक्ति को इस ग्रह से सम्बन्धित रत्न का दान करना चाहिए. राहु से पीड़ित व्यक्ति को शनिवार का व्रत करना चाहिए इससे राहु ग्रह का दुष्प्रभाव कम होता है. मीठी रोटी कौए को दें और ब्राह्मणों अथवा गरीबों को चावल और मांसहार करायें. राहु की दशा होने पर कुष्ट से पीड़ित व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए. गरीब व्यक्ति की कन्या की शादी करनी चाहिए. राहु की दशा से आप पीड़ित हैं तो अपने सिरहाने जौ रखकर सोयें और सुबह उनका दान कर दें इससे राहु की दशा शांत होगी.
ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।
जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नही करना चाहिए।
यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
झुठी कसम नही खानी चाहिए।
राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
—-क्या न करें—
मदिरा और तम्बाकू के सेवन से राहु की दशा में विपरीत परिणाम मिलता है अत: इनसे दूरी बनाये रखना चाहिए. आप राहु की दशा से परेशान हैं तो संयुक्त परिवार से अलग होकर अपना जीवन यापन करें.
—–केतु के उपाय—-

किसी युवा व्यक्ति को केतु कपिला गाय, दुरंगा, कंबल, लहसुनिया, लोहा, तिल, तेल, सप्तधान्य शस्त्र, बकरा, नारियल, उड़द आदि का दान करने से केतु ग्रह की शांति होती है। ज्योतिषशास्त्र इसे अशुभ ग्रह मानता है अत: जिनकी कुण्डली में केतु की दशा चलती है उसे अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं. इसकी दशा होने पर शांति हेतु जो उपाय आप कर सकते हैं उनमें दान का स्थान प्रथम है. ज्योतिषशास्त्र कहता है केतु से पीड़ित व्यक्ति को बकरे का दान करना चाहिए. कम्बल, लोहे के बने हथियार, तिल, भूरे रंग की वस्तु केतु की दशा में दान करने से केतु का दुष्प्रभाव कम होता है. गाय की बछिया, केतु से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है. अगर केतु की दशा का फल संतान को भुगतना पड़ रहा है तो मंदिर में कम्बल का दान करना चाहिए. केतु की दशा को शांत करने के लिए व्रत भी काफी लाभप्रद होता है. शनिवार एवं मंगलवार के दिन व्रत रखने से केतु की दशा शांत होती है. कुत्ते को आहार दें एवं ब्राह्मणों को भात खिलायें इससे भी केतु की दशा शांत होगी. किसी को अपने मन की बात नहीं बताएं एवं बुजुर्गों एवं संतों की सेवा करें यह केतु की दशा में राहत प्रदान करता है।

विवाह तिथि निर्धारण का सर्वाधिक अचूक ज्योतिषीय नियम 

भारतीय ज्योतिष विद्या में किसी घटना के समय निर्धारण की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि गणनाकर्ता उलझ कर रह जाता है। पाराशरी, जैमिनी, कृष्णमूर्ति और सामुद्रिक पद्धतियों में काल निर्धारण की भिन्न-भिन्न तकनीकें प्रचलन में हैं। विवाह तिथि संबंधी गणना में इतने सैद्धांतिक विचलन देखे गए हैं कि किसी ज्योतिषी को जातक की विवाह तिथि बताने में नियमों के जाल में उलझना पड़ जाता है। यहां 25 व्यक्तियों की जन्म कुंडलियों में उनकी विवाह तिथियों, जो पहले से ज्ञात हैं, में ज्योतिषीय नियमों को लागू कर देखा जा रहा है कि विवाह तिथि निर्धारण का कौन सा ज्योतिषीय नियम सर्वाधिक अचूक फलदायी है। विवाह तिथि निर्धारण के निम्नलिखित नियम प्रमुख रूप से प्रचलन में हैं।
1.(अ) जातक की जन्म कुंडली के लग्न या लग्नेश और सप्तम भाव या सप्तमेश पर गोचर शनि दृष्टि डाले। (ब) गोचरस्थ गुरु पंचम भाव या पंचमेश और नवम भाव या नवमेश या शुक्र पर दृष्टि डाले। (स) विवाह तिथि को गोचरस्थ गुरु का ग्रह स्पष्ट अंशों में जन्म कुंडली के सप्तमेश के ग्रह स्पष्ट के अंश के तुल्य या 6 अंश के अंतर्गत होना चाहिए।

2(अ) गोचरस्थ गुरु वर/वधू की जन्म कुंडली के शुक्र, सप्तम भाव या सप्तमेश से संबंध बनाए। (ब) वर/वधू की जन्म कुंडली के सप्तम भाव मध्य की नवांश राशि से गोचरस्थ गुरु प्रथम, पंचम, सप्तम या नवम भाव से गुजरे अर्थात इनमें से किसी के साथ गोचर गुरु का दृष्टि या युति संबंध हो।

3 (अ) लग्नेश और सप्तमेश अथवा चंद्र लग्नेश और अष्टमेश अथवा चंद्र और सप्तमेश अथवा लग्नेश और सप्तमेश तथा शुक्र के राशि व अंश को जोड़ें (राशि संख्या 12 से अधिक होने पर 12 घटाएं)। इस योग वाले ग्रह स्पष्ट के तुल्य राशि अंशों से गोचरस्थ गुरु युति करे या उन पर दृष्टि डाले तब विवाह होता है।

4 (अ) नवांश कुंडली का सप्तमेश गोचर में इसी कुंडली के सप्तम भाव से संबंध स्थापित करे, तो विवाह होता है। (ब) नवांश कुंडली में शुक्र या सप्तमेश जिस राशि में हो उससे पहले या 7वें भाव से गुरु गोचरस्थ हो। (स) नवांश कुंडली का लग्नेश जन्म कुंडली की जिस राशि में हो उस राशि से गोचर गुरु या गोचर राहु या गोचर चंद्र गुजरे या उस पर दृष्टि डाले तो विवाह होता है। (द)जातक की जन्म कुंडली के सप्तमेश के द्वारा अधिष्ठित नवांश राशि के स्वामी की दशा में विवाह होता है। (इ) जन्म कुंडली का सप्तमेश जन्म कुंडली की जिस राशि में हो या नवांश कुंडली की जिस राशि में हो उन दोनों के स्वामी ग्रहों में जो बली ग्रह हो उसकी दशा/अंतर्दशा में उस बली ग्रह से संबंध बनाने वाले जन्म कुंडली के ग्रह की दशा/अंतर्दशा में जब गोचर गुरु सप्तमेश स्थित राशि में से भ्रमण करता हो तब विवाह होता है।

5. जन्म कुंडली का सप्तमेश गोचर में जन्म कुंडली के एकादश भाव से गुजरे या उस पर दृष्टि डाले, तो विवाह होता है। यदि सप्तमेश सूर्य अथवा चंद्र हो, तो यह नियम लागू नहीं होता।

6 (अ) जन्म कुंडली के सप्तमेश की दशा में लाभेश की अंतर्दशा होने पर विवाह होता है। (2) जन्म कुंडली के लाभेश की दशा में सप्तमेश की अंतर्दशा होने पर विवाह होता है। (ब) सप्तम भाव से या सप्तमेश से संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा/अंतर्दशा में विवाह होता है। (स) सप्तमेश या शुक्र के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा/अंतर्दशा में विवाह होता है। (द) जन्म कुंडली के लग्नेश या सप्तमेश या शुक्र गोचर में सप्तम भाव या सप्तमेश से पहले, तीसरे, पांचवें, नौवें या 11वें भाव से गुजरे तो विवाह होता है।

7(अ) विवाह के दिन जन्म कुंडली के सप्तमेश की प्रत्यंतर्दशा होती है। (ब) विवाह के दिन सप्तमेश की उच्च या नीच राशि के स्वामी की प्रत्यंतर्दशा होती है। यदि विवाह समय की दशा स्वामी राहु या केतु हो, तो राहु को शनि के समान एवं केतु को मंगल के समान मानें। राहु को कन्या राशि का स्वामी और केतु को मीन राशि का स्वामी मानें। राहु की उच्च राशि मिथुन एवं केतु की धनु है।

8(अ) विवाह के समय जन्म कुंडली के पंचमेश, सप्तमेश, नवमेश या लग्नेश गोचर में परस्पर संबंध स्थापित करता है। (ब)गोचर में विचरण करने वाले अधिकांश ग्रह सप्तम भाव या सप्तमेश या लग्न या लग्नेश के आस-पास होते हैं।

9. विवाह की तिथि के 40 दिन के भीतर जन्म कुंडली के सप्तमेश का गोचर में दृष्टि या युति संबंध लग्नेश, नवमेश और एकादशेश में से किसी एक के साथ अवश्य होगा।

10.जन्म कुंडली के शुक्र और चंद्र में से षडबल में जो बली हो उसकी दशा में या उससे संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा में जब गोचर गुरु उससे (बली शुक्र या चंद्र से) संबंध बनाए तब विवाह होता है।

11.जन्म कुंडली का सप्तमेश शुक्र से युत हो, तो सप्तमेश की दशा/अंतर्दशा में विवाह होता है। (2)जन्म कुंडली का द्वितीयेश जिस राशि में हो उसके स्वामी ग्र्रह की दशा/अंतर्दशा में विवाह होता है। (3)सप्तम भाव या सप्तमेश से संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा/अंतर्दशा में विवाह होता है।

12.जन्म कुंडली का सप्तमेश जिस राशि व अंश में हो, गोचर का गुरु उसके त्रिकोण (1, 5, 9) या सप्तम भाव से उसी अंश से गुजरे, तो विवाह होता है। 13. संपूर्ण भचक्र 3600 में विभाजित है। इसमें 27 नक्षत्र स्थित हैं। प्रत्येक नक्षत्र 360/27=13°20श् के भीतर स्थित है। इस प्रकार अश्विनी नक्षत्र 00 से 13°20श् तक, भरणी नक्षत्र 13°20श् से 26°40श् तक विस्तारित है, इसी प्रकार आगे समझें। अंतिम नक्षत्र 346°40श् से 360°0श् तक सीमित है। विवाह तिथि निर्धारण के लिए जातक के लग्न की राशि और अंश को अंशों में परिवर्तित कर लें। यह अंश किस नक्षत्र के अंतर्गत स्थित है यह देखें। 9 से अधिक की स्थिति में 9 या 18 घटा दें। जो संख्या बचे वह 9 से कम हो। उसे छक्थ् मानें। लग्न अंश को 3°20श् के अधिकतम गुणज से घटाएं। 3020‘ का गुणज ठत्टड है। घटाने से बचा अंश गोचर वर्ष मान ;ळटडद्ध है। गोचर वर्ष मान को दिन में बदलें। 1° =108 दिन, 1 कला =1.8 दिन, 1 विकला=0.03 दिन तथा स्टड त्र ठत्टड ़ ळटड (लग्न अंश) विवाह तिथि निम्न सूत्र से तय करें: क्ण्व्ण्डण् त्र क्ण्व्ण्ठ ़2ग्त्टड ़ स्टड ग् छक्थ् ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ;1द्ध या ;0ध्18ध्27 वर्षद्ध क्ण्व्ण्डण् त्र क्ण्व्ण्ठ ़2ग्त्टड ़ ळटड ग् छक्थ़्ठत्टडण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ;2द्ध या क्ण्व्ण्डण् त्र क्ण्व्ण्ठ ़2ग्त्टड ़ ळटड ग् छक्थ्ण्ण्ण्ण्........ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ;3द्ध 14.(अ) महिला के लिए सूत्र = गुरु का शोध्यपिंड ग गुरु के भिन्नाष्टक में गुरु से 7वें भाव के अष्टकवर्ग का अंक 12 (1) जो शेष बचे उस संख्या की राशि में जब गोचर का गुरु होगा, तो विवाह होगा। (2) 12 के स्थान पर 27 का भाग दिया जाए, तो जो शेष बचे उस नक्षत्र से या उससे पहले, पांचवें, नौवें नक्षत्र से गुरु गोचर करे, तो विवाह होता है। (ब)पुरुष के लिए: उपर्युक्त सूत्र में गुरु के स्थान पर वर की कुंडली के शुक्र ग्रह को प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। शेष गणना ऊपर वर्णित नियमों के अनुसार ही हो। विवाह तिथि निर्धारण की उपर्युक्त सभी विधियों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब जन्म कुंडली में अविवाह योग न हो। कुछ प्रसिद्ध अविवाह योग इस प्रकार हैं: (1)सप्तमेश अष्टम भाव में व अष्टमेश सप्तम भाव में स्थित हो। (2)सप्तमेश वक्री होकर अष्टमस्थ हो। (3)जन्म कुंडली में शनि वक्री हो, नवांश कुंडली में मंगल लग्नगत हो और दशमांश कुंडली में शुक्र षष्ठस्थ हो, तो विवाह नहीं होता। (4)सप्तम भाव पर गुरु व शनि का प्रभाव एक साथ हो। (5)सप्तमेश या सप्तम भाव पर पृथककारी ग्रह सूर्य और राहु का प्रभाव एक साथ हो। (6)सप्तम भाव/सप्तमेश कालसर्प योग से पीड़ित हो या 5 अंश से कम अथवा 25 अंश से अधिक ग्रह स्पष्ट वाले राहु/केतु से संबंध बनाता हो। जातक की जन्म कुंडली में अविवाह योग न हो, तो विवाह तिथि के निर्धारण के लिए उपर्युक्त नियम लागू किए जा सकते हैं।

ऊपर वर्णित नियम के अनुसार 25 जन्म कुंडलियों में सारे विवाह तिथि निर्धारण नियमों को लागू किया गया, तो उनमें कौन-कौन से नियम कितने प्रतिशत कारगर साबित हुए यह निम्न सारणी से स्पष्ट है।

विवाह तिथि 25 जन्मांको में से प्रतिशत निर्धारण का कितने जन्मांको में नियम क्रमांक नियम लागू हुआ 1 (अ) (1) 13 में नियम लागू हुआ 52 (2) 13 में नियम लागू हुआ 52 (3) 10 में नियम लागू हुआ 40 (4) 12 में नियम लागू हुआ 48 (ब) (1) 6 में नियम लागू हुआ 24 (2) 12 में नियम लागू हुआ 48 (3) 5 में नियम लागू हुआ 20 (4) 13 में नियम लागू हुआ 52 (5) 11 में नियम लागू हुआ 44 (स) 16 में नियम लागू हुआ 64 2 (अ) (1) 7 में नियम लागू हुआ 28 (2) 10 में नियम लागू हुआ 40 (3) 12 में नियम लागू हुआ 48 (ब) 6 में नियम लागू हुआ 24 3 (अ) 5 में नियम लागू हुआ 20 (ब) 8 में नियम लागू हुआ 32 (स) 4 में नियम लागू हुआ 16 (द) 5 में नियम लागू हुआ 20 4 (अ) 8 में नियम लागू हुआ 32 (ब) (1) 3 में नियम लागू हुआ 12 (2) 1 में नियम लागू हुआ 4 (स) (1) 1 में नियम लागू हुआ 4 (2) 5 में नियम लागू हुआ 20 (3) 1 में नियम लागू हुआ 4 (द) 4 में नियम लागू हुआ 20 (इ) (1) 7 में नियम लागू हुआ 28 (2) 5 में नियम लागू हुआ 20 5 (1) 1 में नियम लागू हुआ 4 (2) 3 में नियम लागू हुआ 12 6 (अ) (1) 0 में नियम लागू हुआ 0 (2) 3 में नियम लागू हुआ 12 (ब) (1) 14 में नियम लागू हुआ 56 (2) 18 में नियम लागू हुआ 72 (स) (1) 4 में नियम लागू हुआ 16 (2) 7 में नियम लागू हुआ 28 (द) (1) 14 में नियम लागू हुआ 56 (2) 15 में नियम लागू हुआ 60 (3) 3 में नियम लागू हुआ 12 7 (अ) 2 में नियम लागू हुआ 8 (ब) 4 में नियम लागू हुआ 16 8 (अ) 7 में नियम लागू हुआ 28 (ब) (1) 13 में नियम लागू हुआ 52 (2) 13 में नियम लागू हुआ 52 9 (1,2,3) 22 में नियम लागू हुआ 88 10 (1) 3 में नियम लागू हुआ 12 (2) 1 में नियम लागू हुआ 4 11 (1) 5 में नियम लागू हुआ 20 (2) 4 में नियम लागू हुआ 16 (3) 5 में नियम लागू हुआ 20 12 14 में नियम लागू हुआ 56 13 0 में नियम लागू हुआ 0 14 (1) 17 में नियम लागू हुआ 68 (2) 20 में नियम लागू हुआ 80 उपर्युक्त तालिका में

प्रदर्शित आंकड़ों का अवलोकन किया जाए कि किस नियम के लागू होने का प्रतिशत सर्वाधिक है। यह गणना निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है। विवाह तिथि निर्धारण में नियमों के: क्रम की तालिका क्र. प्रतिशत नियम का क्रमांक सटीक नियमों का क्रम 1 100 2 96 3 92 4 88 9 1 5 84 6 80 14(2) 2 7 76 8 72 6ब(2) 3 9 68 14(1) 4 10 64 1 स 5 11 60 6 द (2) 6 12 56 6ब (1), 6 द, 12 7 13 52 1 अ(1), 1अ(2), 8 1ब(4), 8ब(1), 8ब(2) 14 48 1अ(4), 1ब(2), 2अ(3) 9 15 44 1ब(5) 10 16 40 1अ(3), 2अ(2) 11 17 36 18 32 3ब, 4अ 12 19 28 2अ(1), 4इ(1), 6स(2), 8अ 13 20 24 1ब(1), 2ब 14 21 20 1ब(3), 3अ, 3द, 4स(2), 4इ(2) 15 11(1), 11(3), 4द 22 16 3स, 4द, 6स(1), 7ब, 11(2) 16 23 12 4ब(1), 5(2), 6अ(2), 6द(3) 10(1) 17 24 8 7अ 18 25 4 4ब(2), 4स(1), 4स(3) 5(1), 10(2) 19 26 0 6अ(1), 13 1. नियम 1 के अनुसार (अ) गोचर शनि ने (1) लग्न/लग्नेश को प्रभावित किया 18 जन्मांग में त्र72ः (2) सप्तम/सप्तमेश ष् ष् 15 जन्मांग में त्र60ः (3) लग्न/लग्नेश/सप्तम/सप्तमेशष् ष् 22 जन्मांग में त्र88ः (ब) गोचर गुरु (1) पंचम भाव/पंचमेश ष् ष् 16 जन्मांग में त्र64ः (2) नवम भाव/नवमेश ष् ष् 15 जन्मांग में त्र60ः (3) शुक्र ष् ष् 11 जन्मांग में त्र44ः (4) पंचम भाव/पंचमेश/ नवम भाव/नवमेश/शुक्र ष् ष् 19 जन्मांग में त्र76ः (स) गोचर शनि का लग्न/लग्नेश/सप्तम भाव/सप्तमेश पर एवं गोचर गुरु का पंचम भाव /पंचमेश/नवम भाव/नवमेश और शुक्र का कम से कम एक पर प्रभाव 25 में से 24 जन्म कुंडलियों पर है अर्थात 96ः है। शनि और गुरु के गोचर का प्रभाव देखें। (1) गोचर शनि का जन्म कुंडली के लग्न या लग्नेश पर प्रभाव 72ः तथा सप्तम या सप्तमेश पर 60ः है किंतु लग्न/लग्नेश/सप्तम भाव/सप्तमेश चारों में से किसी एक या अधिक पर प्रभाव 88ः है। इससे स्पष्ट है कि गोचर शनि का संबंध जन्म कुंडली के इन चारों तथ्यों में से किसी एक या अधिक पर प्रभाव होना चाहिए न कि लग्न/लग्नेश और सप्तम भाव/सप्तमेश पर अलग से प्रभाव हो। इसी प्रकार गोचर गुरु का जन्म कुंडली के पंचम भाव या पंचमेश/नवम भाव या नवमेश या शुक्र में से किसी एक या अधिक पर प्रभाव होने से 76ः विवाह हो जाते हैं। लेकिन गोचर शनि एवं गुरु के संयुक्त प्रभाव को लें तो 25 में से 24 विवाह अर्थात 96ः विवाह होते हैं। अतः विवाह निर्धारण में गोचर शनि का जन्म कुंडली के लग्न/लग्नेश/सप्तम भाव/सप्तमेश तथा गोचर गुरु का पंचम भाव/पंचमेश/नवम भाव/नवमेश / शुक्र इन 9 में से किसी एक या अधिक पर गोचर शनि या गुरु का प्रभाव पड़ने से विवाह होगा। गोचर शनि एवं गुरु के तत्संबंधी भाव/भावेशों पर पृथक-पृथक प्रभाव पड़ना आवश्यक नहीं है। केवल गोचर शनि का लग्न/लग्नेश तथा सप्तम भाव/सप्तमेश दोनों पर प्रभाव 48ः है तथा केवल गोचर गुरु का पंचम भाव/पंचमेश, नवम भाव/नवमेश तथा शुक्र तीनों पर प्रभाव 56ः है और शनि तथा गुरु का पृथक-पृथक संयुक्त प्रभाव 68ः है। अतः दोनों ग्रहों का पृथक-पृथक प्रभाव विचारणीय है। 2. नियम 6 (ब) की दोनों उपकंडिकाओं को सम्मिलित किया जाए तो सप्तम भाव या सप्तमेश में से एक या दोनों से संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा/अंतर्दशा में विवाह होने के आंकड़े 84ः है। अतः सप्तम भाव या सप्तमेश में से किसी एक से भी संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा विवाह कराने में सक्षम है। 3. नियम 6 (द) के अनुसार जन्म कुंडली के लग्नेश या सप्तमेश या शुक्र में से कोई एक या अधिक ग्रह गोचर में सप्तम भाव या सप्तमेश में से एक या दोनों में से भाव 1, 3, 5, 9 या 11 में से एक या अधिक भावों से गुजरे, तो विवाह होने की संभावना 88ः होती है। 4. नियम 8(ब) के अनुसार सप्तम भाव या सप्तमेश या लग्न या लग्नेश में से किसी एक या अधिक के आसपास गोचर में विचरण करने वाले अधिकतम ग्रह हों, तो विवाह की संभावना 100ः होती है। अतः लग्न/लग्नेश और सप्तम/सप्तमेश पृथक-पृथक न लें। चारों में से किसी एक तथ्य के आसपास गोचर के अधिकतम ग्रह होने चाहिए। 5. अधिकतम विवाह गोचर के वक्री शनि की स्थिति में हुए हैं। 6. नियम 12 के अनुसार अधिकतम मामलों में गोचर गुरु का 60 के भीतर होने वाला नियम लागू नहीं हो पा रहा है, जबकि अन्य शर्तें सप्तम/सप्तमेश से गोचर गुरु का भाव 1, 5 या 9 से विचरण करने की शर्त पूरी हो रही है। 7. नियम 14 (2) में प्रयुक्त सूत्र के अनुसार शेष बची संख्या में निर्दिष्ट नक्षत्र (अभीष्ट नक्षत्र) से नक्षत्र 1, 5, 9 में गोचर गुरु के आने से विवाह होने का उल्लेख है। व्यवहार में वक्री गुरु की गोचर स्थिति में पिछली राशि के प्रारंभिक नक्षत्र में गुरु के संचरण से विवाह हो रहे हैं। 25 में से कुछ जन्म कुंडलियों में सूत्र के अभीष्ट नक्षत्र संख्या के नक्षत्र से 7वें नक्षत्र के गुरु के गोचरस्थ होने से विवाह हो रहे हैं जबकि नियम नक्षत्र 1, 5, 9 से गुरु के गोचरस्थ होने का है। कुछ जन्म कुंडलियों में गोचरस्थ गुरु अभीष्ट नक्षत्र से एक या दो नक्षत्र पहले स्थित होकर विवाह करा रहा है किंतु ऐसे सभी मामलों में विवाह के दिन से कुछ दिन पहले ही वक्री गुरु मार्गी हुआ है। कुछ जन्म कुंडलियों में अभीष्ट नक्षत्र के पीछे के नक्षत्र 1, 5, 9 से गुरु के गोचरस्थ होने से विवाह हो रहे हैं जबकि नियम में अभीष्ट नक्षत्र से आगे के या पीछे के नक्षत्रों को लिए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अतः अभीष्ट नक्षत्र संख्या से आगे या पीछे के क्रम 1, 5, 9वें के नक्षत्र में गुरु के गोचरस्थ होने से विवाह होने की पुष्टि होती है। उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि किसी जातक की जन्म कुंडली से विवाह तिथि का निर्धारण निम्नलिखित क्रम से करना चाहिए। जन्म कुंडली में अविवाह योग न होने की स्थिति में: 1. सर्वप्रथम नियम(1) लगाकर विवाह की संभावना तलाशंे। 2. दूसरे क्रम में नियम 14 के अनुसार विवाह की तिथि और समय का पता करें। नियम 14(2) अधिक उपयुक्त है। शेष बचे अंक के तुल्य नक्षत्र के क्रम 1, 5, 9 व 7 के आगे और पीछे के नक्षत्रों को देखें। 3. तीसरे क्रम में नियम 6 ब (2) के अनुसार जन्म कुंडली का सप्तमेश नोट करें। सप्तमेश से संबंध बनाने वाले अन्य ग्रहों को तलाशें और उन्हें षड्बल के क्रम में रखें। शेष ग्रहों की दशा/अंतर्दशा का समयांतराल ज्ञात करें। यही समयांतराल विवाह निर्धारण की तिथि को इंगित करेगा। इसी क्रम में नियम 6 ब (1) के अनुसार जन्म कुंडली के सप्तम भाव से संबंध बनाने वाले सभी ग्रहों को संसूचित करें। इन ग्रहों की दशा/अंतर्दशा के समयांतराल का विश्लेषण करें, इससे विवाह की तिथि और समय का निर्धारण होगा। नियम 6 द (1) व (2) के अनुसार लग्नेश या सप्तमेश का गोचर भ्रमण जन्म कुंडली के सप्तम भाव/सप्तमेश से भाव 1, 3, 5, 9, 11 से हो ऐसे समय का चयन करें। यह समय उपर्युक्त नियमों के परिपालन में सहायक होगा। 4. चैथे क्रम में नियम 8 एवं 9 का विश्लेषण कर घटना की पुष्टि करें। 5. पांचवें क्रम में नियम 2 अ (3) एवं नियम 12 के आधार पर विवाह की तिथि तय करें। इस प्रकार अधिकतम प्रतिशत प्राप्त करने वाले प्रथम 10 नियम से विवाह तिथि सटीक होने की संभावना बढ़ जाती है। शेष नियमों को उतरते प्रतिशत के क्रम में परिकलित विवाह तिथि के पुष्टीकरण हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।


विवाह सम्बन्धित कुछ उपयोगी बातें:-
1. विवाह मे आशौच आदि की सभावना हो तो 10 दिनो पहले नान्दी मुख श्राद्ध करना चाहिये नान्दी मुख श्राध्द के बाद विवाह सम्पन्न आशौच होने पर भी वर-वघु को और करना चाहिये. नान्दी मुख श्राद्ध के बाद विवाह संमाप्ति आशौच होने पर वर-वधू को ओर उनके माता-पिता को आशौच नहीं होता |
2. “कुष्माण्ड सूक्त” के अनुसार नान्दी् श्राध्द के पहले भी विवाह के लिए सामग्री तैयार होने पर आशौच प्राप्ति हो तो प्रायश्चित करके विवाह कार्यक्रम होता है. प्रायश्चित के लिए हबन, गोदान और पञ्चगव्य प्राशन करें.
3. विवाह के समय हवन में पू्र्व अथवा मध्य में या अन्त में कन्या यदि रजस्वला हो जाने पर कन्या को स्नान करा कर “युञ्जान“इस मंत्र से हवन करके अवशिष्ट कर्म करना चाहिये
4. वधु या वर के माता को रजोदर्शन की संभावना हो तो नान्दी श्राद्ध दस दिनो के पुर्व कर लेना चाहिये. नान्दी श्राद्ध के बाद रजोदर्शनजन्य दोष नहीं होता.
5. नान्दी श्राद्ध के पहले रजोदर्शन होने पर “श्रीशांति” करके विवाह करना चाहिये.
6. वर या वधू की माता के रजस्वला अथवा सन्तान प्राप्ति होने पर “श्रीशांति” करके विवाह हो सकता है
7. विवाह में आशौच की संभावना हो तो, आशौच के पूर्व अन्न का संकल्प कर देना चाहिये. फिर उस संकल्पित अन्न का दोनों पक्षों के मनुष्य भोजन कर सकते हैं.उसमें कोई दोष नहीं होता है. परिवेषण असगोत्र के मनुष्य को करना चाहिये.
8. विवाह में वर-वधू को “ग्रन्थिबन्धन” कन्यादान के पूर्व शास्त्र विहित है. कन्यादान के बाद नहीं. कन्यादाता को अपनी स्त्री के साथ ग्रन्थिबन्धन कन्यादान के पूर्व होना चाहिये.
9. दो कन्या का विवाह एक समय हो सकता है परन्तु एक साथ नहीं. लेकिन एक कन्या का वैवाहिक कृर्त्य समाप्त होने पर द्वार-भेद और आचार्य भेद से भी हो सकता है.
10. एक समय में दो शुभ क्रम करना उत्तम नहीं है. उसमें भी कन्या के विवाह के अनन्तर पुत्र का ववाह हो सकता है. परन्तु पुत्र विवाह के अनन्तर पुत्री का विवाह छ: महिने तक नहीं हो सकता.
11. एक वर्ष में सहोदर (जुड़वा) भाई अथवा बहनों का विवाह शुभ नहीं है. वर्ष भेद में और संकट में कर सकतें हैं.
12. समान गोत्र और समान प्रवर वाली कन्या के साथ विवाह निषिध्द है.
13. विवाह के पश्चात एक वर्ष तक पिण्डदान, मृक्तिका स्नान, तिलतर्पण, तीर्थयात्रा,मुण्डन, प्रेतानुगमन आदि नहीं करना चाहिये.
14. विवाह में छिंक का दोष नहीं होता है.
15. वैवाहिक कार्यक्रम में स्पर्शास्पर्श का दोष नहीं होता.
16. वैवाहिक कार्यक्रम में चतुर्थ, द्वादश, चन्द्रमा ग्राहय है.
17. विवाह में छट, अष्टमी, दशमी तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा रिक्ता आदि तिथि निषिध्द है .
18. विवाह के दिन या पहले दिन अपने-अपने घरों में कन्या के पिता और वर के पिता को स्त्री,कन्या-पुत्र सहित मंगल स्नानकरना चाहिये. और शुध्द नवीन वस्त्र -तिलक-आभूषण आदि से विभूषित होकर गणेश मातृका पूजन (नान्दी श्राद्ध) करना चाहिये.
19. श्रेष्ठ दिन में सौलह या बारह या दस या आठ हाथ के परिमाण का मण्डप चारौं द्वार सहित बनाकर उसमें एक हाथ की चौकौर हवन-वेदी पूर्व को नीची करती हुई बनावें उसे हल्दी, गुलाल, गोघुम तथा चूने आदि से सुशोभित करें. हवन-वेदी के चारों ओर काठ की चार खुंठी निम्नप्रकार से रोपे, उन्हीं के बाहर सूत लपेटे कन्या, सिंह और तुला राशियां संक्राति में तो ईशान कोण में प्रथम वृश्चक, धनु, और मकर ये राशियां संक्राति में तो वायव्य कोण में प्रथम मीन, मेष और कुम्भ ये राशियां संक्रांति में तो नऋर्त्य कोण में प्रथम. वृष, मिथुन और कर्क ये राशियां संक्राति में तो अग्निकोण में प्रथम.एक काठ में पाटे के उपर गणेश, षोडशमातृका, नवग्रह आदि स्थापन करें. ईशान कोण में कलश स्थापन करें.
20. कन्या पिता / अभिभावक स्नान करके शुध्द नवीन वस्त्र पबन कर उत्तराभिमुख होकर आसन पर बैठे तथा वर पूर्वाभिमुख बैठें.
21. कुण्डली मिलान - वैवाहिक सम्बन्धों ती अनुकूलता के परिक्षण के लिए ऋषि-मुनियों ने अनेक ग्रन्थ की रचना की,जिनमें वशिष्ठ,नारद,गर्ग आदि की सन्हीताएं,मुहुर्तमार्तण्ड,मुहुर्तचिन्तामणि और कुण्डलियों में वर्ण,वश्य,तारा,योनि,राशि,गण,भकूट एवं नाडी़ आदि अष्टकूट दोष अर्थात् आठ प्रकार के दोषों का परिहार अत्यन्त आवश्यक है.वर-कन्या की राशियों अथवा नवमांशेशों की मैक्त्री तथा राशियों नवमांशेशियों की एकता द्वारा नाडी़ दोष के अलावा शेष सभी दोषों का परिहार हो जाता है.इन सभी दोषों में नाडी़ दोष प्रमुख है,जिसके परिहार के लिए आवश्यक है कि वर-कन्या की राशि एक ओर नक्षत्र भिन्न-भिन्न हो अथवा नक्षत्र एक ओर राशियां भिन्न हो.
22. कितने गुण मिलने चाहिए - शास्त्रानुसार वर-कन्या के विवाह के लिए 36 गुणों में से कम से कम सा़ढ़े सोलह गुण अवश्य मिलने चाहिए, लेकिन उपरोक्त नाडी़ दोष का परिहार बहुत जरुरी है. अगर नाडी़ दोष का परीहार ना हो, तो अठाईस गुणों के मिलने पर भी शास्त्र विवाह की अनुमति नहीं देते हैं. बहुत आवश्यक हो, तो सोलह से कम गुणों और अष्टकूट दोषों के अपरिहार की स्थिति में भी कुछ उपायों से शान्ति करके विवाह किया जा सकता है. इस स्थिति में कन्या का नाम बदल कर मिलान को अनुकूल बनाना अशास्त्रीय है.
23. क्या होता मांगलिक दोष - शास्त्रानुसार कुज या मंगल दोष दाम्पत्य जीवन के लिए विशेष रुप से अनिष्टकारी माना गया है. अगर कन्या की जन्म-कुण्डली में मंगल ग्रह लग्न, चन्द्र अथवा शुक्र से 1, 2, 12, 4, 7 आठवें भाव में विराजमान हो, तो वर की आयु को खतरा होता है. वर की जन्म-कुण्डली में यही स्थिति होने पर कन्या की आयु को खतरा होता है. मंगल की यह स्थिति पति-पत्नी के बीच वाद-विवाद और कलह का कारण भी बनती है. जन्म-कुण्डली में वृहस्पति एवं मंगल की युति अथवा मंगल एवं चन्द्र की युति से मंगल दोष समाप्त हो जाता है. इसके अतिरिक्त कुछ विशेष भावों में भी मंगल की स्थिति के कुज दोष का कुफल लगभग समाप्त हो जाता है. यह अत्यन्त आवश्यक है कि कुजदोषी वर का विवाह कुजदोषी कन्या से ही किया जाए, इससे दोनों के कुजदोष समाप्त हो जाते हैं और उनका दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है.
24. कन्या ग्रहण के विषय में मनु ने कहा है कि वह कन्या अधिक अंग वाली, वाचाल, पिंगल, वर्णवाली रोगिणी नहीं होनी चाहिए।
विवाह में सपिण्ड, विचार, गोत्र, प्रवर विचार करना चाहिए। विवाह में स्त्रियों के लिए गुरुबल तथा पुरुषों के लिए रविबल देख लेना चाहिए। कन्या एवं वर को चन्द्रबल श्रेष्ठ अर्थात् चौथा, आठवां, बारहवां, चन्द्रमा नहीं लेना चाहिए। गुरु तथा रवि भी चौथे, आठवें एवं बारहवें नहीं लेने चाहिए।
25. विवाह में मास ग्रहण के लिए व्यास ने कहा है कि माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष, ज्येष्ठ, अषाढ़ महिनों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है।
रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मूल, स्वाति, मृगशिरा, मघा, अनुराधा, हस्त ये नक्षत्र विवाह में शुभ हैं। विवाह में सौरमास ग्रहण करना चाहिए। जैसे ज्योतिषशास्त्र में कहा है–
सौरो मासो विवाहादौ यज्ञादौ सावनः स्मतः।
आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते।।
बृहस्पति, शुक्र, बुद्ध और सोम इन वारों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है। विवाह में चतुर्दशी, नवमी इन तिथियों को त्याग देना चाहिए।
इस प्रकार आपको भी धार्मिक रीति से ही विवाह संस्कार को पूर्ण करना चाहिये।
26. क्यों नहीं करना चाहिए एक ही गौत्र में विवाह - विवाह में गौत्र का बड़ा महत्व है। पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए।
विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान ‘गौत्र” कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। आगे चलकर गौत्र का संबंध धार्मिक परंपरा से जुड़ गया और विवाह करते समय इसका उपयोग किया जाने लगा।
ऋषियों की संख्या लाख-करोड़ होने के कारण गौत्रों की संख्या भी लाख-करोड़ मानी जाती है, परंतु सामान्यत: आठ ऋषियों के नाम पर मूल आठ गौत्र ऋषि माने जाते हैं, जिनके वंश के पुरुषों के नाम पर अन्य गौत्र बनाए गए। ‘महाभारत” के शांतिपर्व (297/17-18) मेंमूल चार गौत्र बताए गए हैं- अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु, जबकि जैन ग्रंथों में 7 गौत्रों का उल्लेख है- कश्यप, गौतम, वत्स्य, कुत्स, कौशिक, मंडव्य और वशिष्ठ। इनमें हर एक के अलग-अलग भेद बताए गए हैं- जैसे कौशिक-कौशिक कात्यायन, दर्भ कात्यायन, वल्कलिन, पाक्षिण, लोधाक्ष, लोहितायन (दिव्यावदन-331-12,14) विवाह निश्चित करते समय गौत्र के साथ-साथ प्रवर का भी ख्याल रखना जरूरी है। प्रवर भी प्राचीन ऋषियों के नाम है तथापि अंतर यह है कि गौत्र का संबंध रक्त से है, जबकि प्रवर से आध्यात्मिक संबंध है। प्रवर की गणना गौत्रों के अंतर्गत की जाने से जाति से संगौत्र बहिर्विवाहकी धारणा प्रवरों के लिए भी लागू होने लगी।
ब्राह्मणों के विवाह में गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है। पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। वर-वधू का एक वर्ष होतेहुए भी उनके भिन्ना-भिन्ना गौत्र और प्रवर होना आवश्यक है (मनुस्मृति- 3/5)। मत्स्यपुराण (4/2) में ब्राह्मण के साथ संगौत्रीय शतरूपा के विवाह पर आश्चर्य और खेद प्रकट किया गया है। गौतमधर्म सूत्र (4/2) में भी असमान प्रवर विवाह का निर्देश दिया गया है। (असमान प्रवरैर्विगत) आपस्तम्ब धर्मसूत्र कहता है- ‘संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत्” (समान गौत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए)।
असमान गौत्रीय के साथ विवाह न करने पर भूल पुरुष के ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाने तथा चांडाल पुत्र-पुत्री के उत्पन्ना होने की बात कही गई। अपर्राक कहता है कि जान-बूझकर संगौत्रीय कन्या से विवाह करने वाला जातिच्युत हो जाता है, जबकि बोधायन का मत है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से भी संगौत्रीय कन्या से विवाह करता है, तो उसे उस कन्या का मातृत्वत् पालन करना चाहिए (संगौत्रचेदमत्योपयच्छते मातृपयेनां विमृयात्)।
गौत्र जन्मना प्राप्त नहीं होता, इसलिए विवाह के पश्चात कन्या का गौत्र बदल जाता है और उसके लिए उसके पति का गौत्र लागू हो जाता है।

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